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विदुर

  • व्यासके द्वारा अम्बिकाकी दासीके गर्भसे उत्पन्न ( आदि० १ । १४—१६ ) ।
  • अणिमामाण्डव्यके शापसे धर्मराजने ही शूद्रयोनिमें विदुर होकर जन्म लिया था ( आदि० ६३ । १३—१७; आदि० १०५ । २२ ) ।
  • ये राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डुके भाई थे ( आदि० १०५ । २२ ) ।
  • भीष्मद्वारा इनका संवर्धन एवं पालन-पोषण ( आदि० १०८ । १७—१८ ) ।
  • इनकी धर्मनिष्ठा तथा अध्ययन ( आदि० १०८ । १९—२२ ) ।
  • शूद्राके गर्भसे ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न होनेके कारण इनको राज्यकी प्राप्ति नहीं हुई ( आदि० १०८ । २३ ) ।
  • इनको पाण्डुद्वारा धनकी भेंट ( आदि० ११३ । २ ) ।
  • राजा देवकके घरमें स्थित तथा ब्राह्मणद्वारा शूद्राके गर्भसे उत्पन्न हुई कन्याके साथ भीष्मद्वारा इनका विवाह ( आदि० ११३ । १२—१३ ) ।
  • दुर्योधनके जन्मकालमें होनेवाले अमङ्गलोंको देखकर उसे त्याग देनेके लिये इनकी धृतराष्ट्रको सलाह ( आदि० ११५ । २४—४० ) ।
  • इनके द्वारा आत्माके कल्याणके लिये सम्पूर्ण जगत्को त्याग देनेका उपदेश ( आदि० ११४ । २९ ) ।
  • पाण्डुका राजोचित ढंगसे अस्थि-संस्कार करनेके लिये इनको धृतराष्ट्रका आदेश ( आदि० १२६ । १—३ ) ।
  • इनके द्वारा पाण्डुका अस्थिदाह तथा उनके लिये जलाञ्जलि-दान ( आदि० १२६ । २०—२८ ) ।
  • भीमसेनके नागलोकमें जानेपर चिन्तित हुई कुन्तीको इनका आश्वासन ( आदि० १२८ । १७—१८ ) ।
  • इनके द्वारा राजकुमारोंके अस्त्रकौशल-प्रदर्शनके समय धृतराष्ट्रसे इनकी कलाओंका वर्णन ( आदि० १३३ । २५ ) ।
  • पाण्डवोंको लाक्षागृहमें सावधान रहने एवं कौरवोंके कुचक्रसे बचनेके लिये इनका सांकेतिक भाषामें युधिष्ठिरको संकेत ( आदि० १४४ । १९—२६ ) ।
  • इनका लाक्षागृहमें सुरंग बनानेके लिये पाण्डवोंके पास खननकका भेजना ( आदि० १४६ । १ ) ।
  • पाण्डवोंको गङ्गा पार उतारनेके लिये नाविक भेजना ( आदि० १४८ । २ ) ।
  • लाक्षागृहमें पाण्डवोंकी मृत्युके समाचारसे दुखी हुए भीष्मका इनके द्वारा उनके जीवित रहनेका रहस्य बतलाकर आश्वासन ( आदि० १४९ । १८ के बाद ) ।
  • द्रुपद-नगरसे पाण्डवोंको बुलाने एवं उनका आधा राज्य दे देनेके सम्बन्धमें धृतराष्ट्रके प्रति कहे हुए द्रोण तथा भीष्मके वचनोंका इनके द्वारा समर्थन ( आदि० २०४ । १—३० ) ।
  • धृतराष्ट्रके आदेशसे द्रुपद-नगरमें जाकर इनका पाण्डवोंको हस्तिनापुरमें ले आना ( आदि० २०५ । ४ से २०६ । ११ तक ) ।
  • द्रुपद-नगरमें इनका कुन्तीको आश्वासन देना ( आदि० २०६ । १ के बाद ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें गये थे ( सभा० ३३ । ५ ) ।
  • वहाँ इन्हें धनके व्यय करनेका कार्य सौंपा गया था ( सभा० ३५ । ९ ) ।
  • इनके द्वारा कौरवोंकी पाण्डवोंके साथ द्यूतक्रीड़ाका विरोध ( सभा० ४९ । ५४ ) ।
  • इनकी धृतराष्ट्रसे बातचीत ( सभा० ५० अध्याय ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप ( सभा० ५८ । ५—१६ ) ।
  • द्यूतक्रीड़ाके अवसरपर धृतराष्ट्रको इनकी चेतावनी देना ( सभा० ६२ अध्याय ) ।
  • इनका आत्माके उद्धारके लिये समस्त भूमण्डलको त्याग देनेका उपदेश ( सभा० ६२ । १९ ) ।
  • इनके द्वारा द्यूतक्रीड़ाके प्रस्तावका घोर विरोध ( सभा० ६३ अध्याय ) ।
  • जुएके अवसरपर दुर्योधनको इनकी फटकार और इनका उसे चेतावनी देना ( सभा० ६४ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीको सभाभवनमें पकड़कर लानेके सम्बन्धमें दुर्योधनके आदेश देनेपर इनका पुनः दुर्योधनको फटकारना और कट वचनकी तीव्र निन्दा ( सभा० ६६ अध्याय ) ।
  • इनका प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको द्रौपदीके प्रश्नका उत्तर देनेके लिये प्रेरित करना ( सभा० ६८ । ५९—८८ ) ।
  • इनकी धृतराष्ट्र-पुत्रोंको चेतावनी ( सभा० ७१ । १६-१९ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरसे कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव ( सभा० ७८ । ५-६ ) ।
  • पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेके लिये इनका उपदेश ( सभा० ७८ । २१-२३ ) ।
  • प्रजा-जनोंके शोकके विषयमें इनके द्वारा धृतराष्ट्रके प्रश्नोंका उत्तर ( सभा० ८० । ३५ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना ( वन० ४ । १४-१७ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनका त्याग ( वन० ४ । ३१ ) ।
  • इनका काम्यकवनमें जाकर पाण्डवोंसे मिलना और उन्हें धर्म-युक्त सलाह देना ( वन० ५ । २१-२९ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रको क्षमादान ( वन० ६ । २१-२४ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रको किर्मीरवधकी कथा सुनाना ( वन० ११ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रको नीतिपूर्ण उपदेश ( विदुरनीति ) ( उद्योग० ३३ । १३ से ४० अध्याय तक ) ; कुमार सनत्सुजातसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये इनकी प्रार्थना ( उद्योग० ४१ । १०-१२ ) ।
  • इनके द्वारा दमकी महिमाका वर्णन ( उद्योग० ६३ । १९-२४ ) ।
  • कौटुम्बिक कलह और लोभसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिके लिये समझाना ( उद्योग० ६४ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी बात माननेके लिये समझाना ( उद्योग० ८० अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा अपने घरपर श्रीकृष्णका आतिथ्य-सत्कार ( उद्योग० ८९ । २३-२४ ) ।
  • श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें भोजन कराना ( उद्योग० ९१ । ३८-३९ ) ।
  • धृतराष्ट्र-पुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवभामें जानेका अनुचित्य बतलाना ( उद्योग० ९२ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे दुर्योधनको बुलाना ( उद्योग० १२१ । ६ ) ।
  • धृतराष्ट्रकी आज्ञासे दुर्योधनको बुलाना ( उद्योग० १२१ । १६ ) ।
  • दुर्योधन आदिकी श्रीकृष्णको कैद करनेके दुःसाहसकी बात बताकर इनका धृतराष्ट्रको चेतावनी ( उद्योग० १३० । १८ से २२ के बाद तक ) ।
  • दुर्योधनको समझाना ( उद्योग० १३० । ५१-५३ ) ।
  • युद्धके भावी परिणामपर विचार करके इनका कुन्तीसे अपना दुःख प्रकट करना ( उद्योग० १४४ । २-९ ) ।
  • शोकाकुल धृतराष्ट्रको आश्वासन देना ( शल्य० १ । ५५ ) ।
  • इनके द्वारा राजमहिलाओके साथ हस्तिनापुर लौटे हुए युयुत्सुकी प्रशंसा ( शल्य० २९ । ९९-१०० ) ।
  • कालकी प्रबलता बताकर धृतराष्ट्रको समझाना ( स्त्री० २ अध्याय ) ।
  • शरीरकी अनित्यता बताकर धृतराष्ट्रका शोक निवारण करना ( स्त्री० ३ अध्याय ) ।
  • दुःसमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन करना एवं उससे छूटनेका उपाय बताना ( स्त्री० ४ अध्याय ) ।
  • गहन वनके दृष्टान्तसे संसारके भयंकर स्वरूपका वर्णन करना ( स्त्री० ५ अध्याय ) ।
  • संसाररूपी वनके रूपकका इनके द्वारा स्पष्टीकरण ( स्त्री० ६ अध्याय ) ।
  • संसारचक्रका वर्णन करना तथा रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना ( स्त्री० ७ अध्याय ) ।
  • शोक-निवारणके लिये धृतराष्ट्रको उपदेश देना ( स्त्री० ९ । १० ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा मन्त्रणा आदि कार्योंपर इनकी नियुक्ति ( शान्ति० ४१ । १० ) ।
  • युधिष्ठिरके प्रश्नके उत्तरमें इनका विविध धर्मोंका प्रख्यापन ( शान्ति० १६० । ५-९ ) ।
  • भीष्मके दाहसंस्कारके लिये इनका युधिष्ठिरके साथ जाना ( अनु० १६० । ९-१० ) ।
  • इन्होंने भीष्मकी चिताके निर्माणमें योग दिया और रेशमी वस्त्रों तथा मालाओंसे आच्छादित करके उनके शवको चितापर सुलाया ( अनु० १६८ । ११-१२ ) ।
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनका इन्द्रप्रस्थसे हस्तिनापुरमें आकर इनसे मिलना ( आश्व० ५२ । ३१ ) ।
  • बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये ( आश्व० ६० । ३४ ) ।
  • बलराम और श्रीकृष्णके हस्तिनापुरमें आनेपर राजा धृतराष्ट्र तथा महामना विदुरजीने खड़े हो आगे बढ़कर उनका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ( आश्व० ६६ । ५ ) ।
  • जब पाण्डवलोग हिमालयसे धन लेकर हस्तिनापुरके समीप आ गये, उस समय विदुरजीने पाण्डवोंका प्रिय करनेकी इच्छासे देवमन्दिरोंमें विविध प्रकारसे पूजा करनेकी आज्ञा दी ( आश्व० ७० । १४-१९ ) ।
  • पाण्डवोंके नगरमें आकर धृतराष्ट्र और गान्धारी-से मिलनेके बाद विदुरजीका भी समादर किया ( आश्व० ७१ । ५-७ ) ।
  • विदुरजी सदा राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें लगे रहते थे ( आश्रम० १ । १२ ) ।
  • अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर बहुत प्रसन्न रहते थे ( आश्रम० २ । २६-२९ ) ।
  • धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरके मिलनका करुण-दृश्य देखकर विदुर आदि रो पड़ते थे ( आश्रम० ५ । ७६ ) ।
  • युधिष्ठिरने विदुर आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेका निश्चय किया ( आश्रम० ४ । २०-२१ ) ।
  • युधिष्ठिरने विदुरसे सभी आवश्यक बातोंका उपदेश कर दिया था ( आश्रम० ७ । २९ ) ।
  • विदुरजीके वनमें चले जानेपर मुझे कौन कर्तव्यका उपदेश देगा—यह युधिष्ठिरकी चिन्ता ( आश्रम० ८ । २ ) ।
  • धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना ( आश्रम० ११ । १-५ ) ।
  • राजा युधिष्ठिरका विदुरजीके द्वारा धृत-राष्ट्रको धन देनेकी स्वीकृति कहलाना ( आश्रम० १२ । १०-१३ ) ।
  • विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिर-
  • का उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना ( आश्व० १३ अध्याय ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रके साथ वनको प्रस्थान ( आश्रम० १५ । ८ ) ।
  • वनके मार्गमें धृतराष्ट्र आदिको और विदुरका उनके लिये कुशकी शय्या बिछाना ( आश्रम० १६ । १६-२० ) ।
  • विदुरकी सम्मतिसे युधिष्ठिरका पवित्र तीर्थों तथा नदियोंके पावन तटपर निवास ( आश्रम० १९ । १ ) ।
  • कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर धर्म और अर्थके ज्ञाता, उत्तम बुद्धि वाले विदुरजी वल्कल और चीर वस्त्र धारण किये गान्धारी तथा धृतराष्ट्रकी सेवा करने लगे । वे मनको वशमें करके अपने दुर्बल शरीरसे घोर तपस्यामें मग्न रहते थे ( आश्रम० १९ । १८ ) ।
  • वनमें युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे विदुरजीका पता पूछा ( आश्रम० २६ । १५ ) ।
  • धृतराष्ट्रने उत्तर दिया—विदुर सकुशल हैं । वे बड़ी कठोर तपस्यामें लगे हैं । निरन्तर उपवास करते और वायु पीकर रहते हैं; इसलिये अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं । उनके सारे शरीरमें व्याप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती हैं । इस सूने वनमें ब्राह्मणोंको कभी-कभी कहीं उनके दर्शन हो जाया करते हैं ( आश्रम० २६ । १६-१७ ) ।
  • इसी समय मुखमें पत्थरका टुकड़ा लिये जटाधारी कृशकाय विदुरजी दूरसे दिखायी दिये । उनके सारे शरीरमें मैल जमी हुई थी । वे दिगम्बर थे । वनमें उड़ती हुई धूलिसे नहा गये थे । उस आश्रमकी ओर देखकर वे सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े ( आश्रम० २६ । १८-१९ ) ।
  • राजा युधिष्ठिर अकेले ही उनके पीछे-पीछे दौड़े । वे कभी दिखायी देते और कभी अदृश्य हो जाते थे । जब वे घोर वनमें प्रवेश करने लगे; तब राजा युधिष्ठिरने अपना परिचय देकर उन्हें पुकारा; विदुरजी वनके भीतर एकान्त प्रदेशमें किसी वृक्षका सहारा लेकर खड़े हो गये । उनके शरीरका ढाँचामात्र रह गया था । इतनेहीसे उनके जीवित रहनेकी सूचना मिलती थी । युधिष्ठिर उन्हें पहचानकर अपना नाम बताकर उनके आगे खड़े हो गये । महात्मा विदुर युधिष्ठिरकी ओर एकटक देखने लगे । वे अपनी देहकी उनकी इन्द्रियोंमें स्थापित करके प्राणोंमें और इन्द्रियोंको उनकी इन्द्रियोंमें स्थापित करके उनके भीतर समा गये । तेजसे प्रज्वलित होते हुए विदुरने योगबलका आश्रय लेकर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश किया । उनका शरीर पूर्ववत् वृक्षके सहारे खड़ा था । आँखें अब भी उसी तरह निर्निमेष थीं, परंतु अब उनके शरीरमें चेतना नहीं रह गयी थी । युधिष्ठिरने विदुरके शरीरका दाह-संस्कार करनेका विचार किया; परंतु आकाशवाणीने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया । साथ ही यह बताया कि विदुरजीको सांतानिक नामक लोककी प्राप्ति होगी ( आश्रम० २६ । २०-२३ ) ।
  • व्यामजीद्वारा धर्म, विदुर और युधिष्ठिरकी एकताका प्रतिपादन ( आश्रम० २६ । १६-२२ ) ।
  • विदुरने स्वर्गमें जाकर धर्मके स्वरूपमें प्रवेश किया ( स्वर्गा० ५ । २२ ) ।

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