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विभाण्डक

  • एक प्राचीन ऋषि, जो शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीको देखने आये थे ( शान्ति० ४७ । १९ ) ।
  • कश्यप कुलमें उत्पन्न एक ऋषि, जो इन्द्रकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ७ । १८ दा० पाठ ) ।
  • ये मृगशृङ्गके पिता थे ( वन० ११० । २३ ) ।
  • इनका अन्तःकरण तपस्यासे पवित्र हो गया था । ये प्रजापतिके समान तपस्वी और अमोघवीर्य महात्मा थे । इनका रूप-सौन्दर्य महात्माओंके समान था । ये बहुत बड़े सरोवरमें प्रविष्ट होकर तपस्या करते रहे । इन्होंने दीर्घकालतक महान् क्लेश सहन किया था ( वन० ११० । ३३-३४ ) ।
  • एक दिन जलमें स्नान करते समय उर्वशी अप्सराको देखकर इनका वीर्य स्खलित हो गया । उसी समय प्याससे व्याकुल होकर एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी । इससे उसके गर्भमें रह गया । उसीके पेटसे महर्षि ऋष्यशृङ्गका जन्म हुआ ( वन० ११० । ३५-४५ ) ।
  • विभाण्डक मुनिके नेत्र हरे-पीले रंगके थे । सिर्फे लेकर पैरोंके नखोंतक रोमावलियोंसे भरे हुए थे । ये स्वाध्यायशील, सदाचारी और समाधिनिष्ठ महर्षि थे । एक दिन जब ये बाहरसे आश्रमपर आये तो अपने पुत्रको चिन्तामग्न देखकर उससे पूछने लगे—'बेटा ! बताओ, आज यहाँ कौन आया था ( वन० १११ । २०-३० ) ।
  • ऋष्यशृङ्गने पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारी-रूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन किया ( वन० ११२ अध्याय ) ।
  • विभाण्डकनें अपने पुत्रको बताया कि इस प्रकार अद्भुत रूप धारण करके राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं तथा ऋषि-मुनियोंकी तपस्यामें सदा विघ्न डालनेकी चेष्टा करते रहते हैं । अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं । इस प्रकार पुत्रको उससे मिलने-जुलनेके लिये मना करके मुनि स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे । तीन दिनतक खोजनेपर भी जब वे उसका पता न पा सके, तब आश्रमपर लौट आये ( वन० ११३ । १-५ ) ।
  • तदनन्तर जब वे फल लानेके लिये वनमें गये,
  • तब वह वेश्या उनके पुत्रको लुभाकर अपने साथ ले गयी और राजा लोमपादने उन्हें अपने अन्तःपुरमें ठहराया । आश्रमपर लौटनेपर अपने पुत्रको न देखकर विभाण्डक मुनि अत्यन्त कुपित हो उठे । इन्हें सन्देह हुआ । तब वे चम्पा नगरीकी मार्गमें इनका बड़ा सत्कार हुआ । वैभव इनके पुत्र ऋष्यशृङ्गका ही वताया गया । राजाने यहाँ पहुँचकर इन्होंने अपने पुत्र और पुत्रवधूको देखा । इससे इनका क्रोध शान्त हो गया और इन्होंने राजा लोमपादपर बड़ी कृपा की । शान्तिके गर्भसे पुत्र उत्पन्न हो जानेके बाद ऋष्यशृङ्गको वनमें ही आ जानेकी आज्ञा देकर ये आश्रमको लौट गये ( वन० ११३ । ६-२१ ) ।
  • अहरय देवतासे इनका प्रश्न करना ( शान्ति० २२२ अ० १० दा० पाठ, पृष्ठ ४९९, कालम १ ) ।
  • सनत्कुमारजीसे प्रश्न ( शान्ति० २२२ दा० पाठ, पृष्ठ ४९९, कालम २ ) ।

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