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विभीषण

  • (१) एक यक्ष, जो कुबेरकी सभामें उपस्थित होकर उनकी सेवा करते हैं ( सभा० १० । १७ ) ।
  • (२) राक्षसराज लङ्काधिपति विभीषण, जो कुबेरकी सभामें रहकर अपने भाई धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं ( सभा० १० । ३१ ) ।
  • ये विश्श्रवा मुनिके पुत्र, रावण और कुम्भकर्णके भाई थे । इनकी माताका नाम मालिनी था । इनके द्वारा युधिष्ठिरको अनेक प्रकारकी बहुमूल्य वस्तुओंकी भेंट ( सभा० ३१ । ७ के बाद दा० पाठ ) ।
  • सहदेवने इनके पास घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा था ( सभा० ३१ । ७२ के बाद दा० पाठ और ७३ वाँ श्लोक, पृष्ठ ७५९ ) ।
  • इनकी आज्ञामें घटोत्कचका इनके दरबारमें उपस्थित होना ( सभा० ३१ । ७३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७६० ) ।
  • राक्षसराज विभीषणका महल अपना उज्ज्वल आभास फैलाकर कैलाशके समान पड़ता था । उसका फाटक तपाये हुए सोने-से तैयार किया गया था । चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित था । उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे । भाँति-भाँतिके रत्न उस भवनकी शोभा बढ़ाते थे । सोने, चाँदी और स्फटिक मणिके खम्भे नेत्र और मनको अपनी ओर खींच लेते थे । उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे । सुनहले रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा होती थी । विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णिमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी देता था । वहाँ कानोंमें मृदङ्गकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ती थी । वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसकी लयपर गीत गाया जा रहा था । सैकड़ों वाद्यके साथ दिव्य दुन्दुभियाँ मधुर घोष गूँज रहा था । महात्मा विभीषण सोनेके सिंहासनपर बैठे थे । वह सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था । उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे । दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणकी विचित्र शोभा हो रही थी । उनका रूप दिव्य था । वे दिव्य माला, दिव्य वस्त्र और दिव्य गन्धसे विभूषित थे । उनके समीप अनेक सचिव बैठे थे । बहुत-से सुन्दर यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मधुरयुक्त वाणीद्वारा राजा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन करते थे । दो सुन्दर नारियाँ उन्हें चँवर और व्यजन डुला रही थीं । राक्षसराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे । इनके अङ्गोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी । वे धर्मनिष्ठ थे और मन-ही-मन इक्ष्वाकु वंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रका स्मरण करते थे । घटोत्कचने दोनों हाथ जोड़कर इन्हें प्रणाम किया ( सभा० ३१ । ७३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७६१ ) ।
  • घटोत्कचके मुखसे युधिष्ठिर आदिका पूर्ण परिचय सुनकर विभीषणने प्रसन्नतापूर्वक सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग, बहुमूल्य आभूषण, सुन्दर मूँगे, भाँति-भाँतिके मणि, रत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहें, हजारों जलपात्र, चाँदीके बर्तन, चौदह सुवर्णमय ताड़, सुवर्णमय कमलपुष्प, मणिजटित शिविकाएँ, बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए पुष्प, श्वेत, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल शंखावर्त शङ्ख, श्रेष्ठ चन्दन तथा और भी भाँति-भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ भेंट किये ( सभा० ३१ । ७३ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७६२-७६४ ) ।
  • ये राक्षसराज रावणके छोटे भाई थे ( वन० २७५ । १२ ) ।
  • इनकी माता महर्षि विश्श्रवा थे और माताका नाम मालिनी था ( वन० २७५ । १८ ) ।
  • इनका श्रीरामकी शरणमें जाना ( वन० २८३ । ४६ ) ।
  • श्रीरामने इन्हें लङ्काका राजा, लक्ष्मणका सखा और अपना सचिव बनाया ( वन० २८३ । ४९ ) ।
  • इनका प्रहस्तके साथ युद्ध ( वन० २८५ । १४ ) ।
  • इनके द्वारा प्रहस्तका वध ( वन० २८६ । ४ ) ।
  • इनका कुबेरका भेजा हुआ अस्त्र श्रीरामको देना ( वन० २८९ । ९-११ ) ।
  • श्री रामद्वारा लङ्काका राज्य पाना ( वन० २९१ । ५ ) ।
  • अयोध्याके राज्यपर अभिषिक्त होनेके बाद श्रीरामचन्द्रजीने पुलस्त्यकुलनन्दन विभीषणको अपने घर लौटनेकी आज्ञा दी और कर्तव्यकी शिक्षा दे इन्हें बड़े दुः खसे बिदा किया ( वन० २९१ । ६७-६८ ) ।

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