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विराट

  • मत्स्यदेशके शत्रुदमन नरेश, जो मरुद्गणोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । ८२ ) ।
  • ये अपने पुत्र उत्तर एवं शङ्खके साथ द्रौपदीके स्वयंवरमें पधारे थे ( आदि० १८५ । ८ ) ।
  • राजसूय-दिग्विजयके समय सहदेवद्वारा इनकी पराजय ( सभा० ३१ । २ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें पधारे थे ( सभा० ४४ । २० ) ।
  • इन्होंने राजा युधिष्ठिरको सुवर्ण-मालाओंसे विभूषित दो हजार मतवाले हाथी उपहारके रूपमें दिये ( सभा० ५२ । २६ ) ।
  • युधिष्ठिरको विशेष अधिकार देकर अपने यहाँ ससम्मान रहनेकी व्यवस्था करना ( विराट० ७ । १६-१७ ) ।
  • इनका भीमसेनको अपने यहाँ पाकशालाध्यक्ष बनाना ( विराट० ८ । ११-१२ ) ।
  • इनकी प्यारी रानीका नाम सुदेष्णा था ( विराट० ९ । ६ ) ।
  • सहदेवको अपने यहाँ गोशालाध्यक्षके पदपर रखना ( विराट० १० । १५ ) ।
  • बृहन्नला नामधारी अर्जुनने नपुंसकत्वकी परीक्षा कराकर उन्हें अन्तःपुरमें स्थापित करना ( विराट० ११ । १०-११ ) ।
  • इनकी पुत्रीका नाम उत्तरा था, जिसे अर्जुनने गीत, वाद्य एवं नृत्यकलाकी शिक्षा दी थी ( विराट० ११ । १२-१३ ) ।
  • नकुलको अश्वशालाध्यक्षके पदपर नियुक्त करना ( विराट० १२ । ९ ) ।
  • द्रौपदीके उलाहना देने और फटकारनेपर उसे उत्तर देना ( विराट० १६ । १५ ) ।
  • विराटकी पहली रानी कोशल-देशकी राजकुमारी सुरथा थी । वे श्वेतकी माता थीं । उनके मरनेपर राजाने सूतपुत्री कैकेयकुमारी सुदेष्णासे विवाह किया । सुदेष्णाके ज्येष्ठ पुत्रका नाम शङ्ख था और छोटेका उत्तर । इन दोनोंसे छोटी एक उत्तरा नामकी कन्या थी ( विराट० १६ । ५१ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ १८४३ ) ।
  • कहीं-कहीं इनके दस भाइयोंका उल्लेख मिलता है ( विराट० १६ । ५१ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ १८४४ ) ।
  • उपकीचकोंको द्रौपदीको जलानेकी अनुमति दे देना ( विराट० २३ । ८ ) ।
  • कीचक तथा उपकीचकोंके दाह-संस्कारके लिये आदेश देना ( विराट० २४ । ६-७ ) ।
  • सुदेष्णाद्वारा द्रौपदीको राजमहलसे निकल जानेके लिये संदेश कहलाना ( विराट० २४ । ९-१० ) ।
  • इनके भाइयोंके नाम शतानीक और मदिराक्ष थे । शतानीकका दूसरा नाम सूर्यदत्त था । मदिराक्षको 'चित्रालक्ष' भी कहा जाता था । ये दोनों महारथी थे ( विराट० ३१ । ११-१२, १५, २०, २४; विराट० ३२ । १९ ) ।
  • इनके सुदेष्णासे उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्रका नाम शङ्ख था ( विराट० ३१ । १६ ) ।
  • गोहरणके समय पाण्डवों तथा अपनी सेनाके साथ युद्धके लिये प्रस्थान ( विराट० ३१ । २२ ) ।
  • गोहरणके समय सुशर्माके साथ इनका द्वन्द्व-युद्ध ( विराट० ३२ । २३-३० ) ।
  • सुशर्माद्वारा इनका जीते-जी पकड़ा जाना ( विराट० ३३ । ७-८ ) ।
  • सुशर्माके रथसे कूदकर उसकी गदा ले उसीकी ओर इनका दौड़ना ( विराट० ३३ । ४२ ) ।
  • युद्धसे छुटकारा पानेपर पाण्डवोंका इनके द्वारा सम्मान ( विराट० ३४ । ४-१३ ) ।
  • नगरमें विजय-घोषणाके लिये दूत भेजना ( विराट० ३४ । १७ ) ।
  • इनकी उत्तरके लिये चिन्ता ( विराट० ३८ । १०-१४ ) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार ( विराट० ४८ । ४३ ) ।
  • युधिष्ठिरसे इनकी क्षमा-प्रार्थना ( विराट० ४८ । ४२ ) ।
  • उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना ( विराट० ४८ । ६८-७६ ) ।
  • पाण्डवोंका सत्कार तथा अर्जुनके साथ उत्तराका विवाह करनेके लिये युधिष्ठिरके सामने इनका प्रस्ताव ( विराट० ५१ । ३२-३४ ) ।
  • ये अपनी सेनाके साथ युधिष्ठिरकी सहायताके लिये आये ( उद्योग० १९ । १२ ) ।
  • युधिष्ठिरकी सेनाके सात प्रमुख सेनापतियोंमें एक ये भी थे ( उद्योग० १९७ । १७-१८ ) ।
  • दुर्योधन युधिष्ठिरका संदेशका उत्तर देना ( उद्योग० १९३ । ४१ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें भगदत्तके साथ इनका द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ४५ । ४५-५१ ) ।
  • भीष्मपर आक्रमण ( भीष्म० ७३ । ९ ) ।
  • द्रोणाचार्यके मारे जानेपर इनका पलायन ( भीष्म० ८३ । २३-२४ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ इनका द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ११० । १६; भीष्म० १११ । २२-२७ ) ।
  • जयद्रथके साथ द्वन्द्व-युद्ध ( भीष्म० ११६ । ४२-४४ ) ।
  • धृतराष्ट्र द्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । ७ ) ।
  • इनके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । १४ ) ।
  • विन्द-अनुविन्दके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । २०-२१; द्रोण० ५५ । ४-६ ) ।
  • शल्यके साथ युद्धमें मूर्च्छित होना ( द्रोण० १२७ । ३४ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इनका वध ( द्रोण० १८२ । ४३ ) ।
  • इनके मारे जानेकी चर्चा ( कर्ण० ६ । ६ ) ।
  • इनके शवका दाह-संस्कार ( स्त्री० २६ । ३३ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इनका श्राद्ध सम्पन्न होना ( शान्ति० ४४ । १५ ) ।
  • स्वर्गमें जाकर ये मरुद्गणोंमें मिल गये ( स्वर्ग० ५ । १५ ) ।

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