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विशाख

  • (१) कुमार कार्तिकेयके तीन छोटे भाइयोंमेंसे एक, शेष दोके नाम शाख और नैगमेय हैं ( आदि० ६६ । २४ ) ।
  • जब कुमार कार्तिकेयको वर प्रदान करनेके लिये भगवान् शिवकी ओर चले, उस समय शिव, पार्वती, अग्नि और स्कन्द—ये चारों एक ही समय सोचने लगे—'क्या यह मेरा पुत्र मेरे पास आयेगा?' उनके मनोभावको समझकर कुमार स्कन्दने योगबलसे अपने चार स्वरूप बना लिये। एक तो कुमार स्कन्द स्वयं ही थे। दूसरे शाख, तीसरे विशाख और चौथे नैगमेय हुए। स्कन्द शिवके, शाख अग्निके, विशाख पार्वतीके और नैगमेय गङ्गाजीके समीप गये। इस तरह इनके द्वारा इन सबको पिता-माताका गौरव प्राप्त हुआ। इन चारोंके रूप एक-से हैं। ये सब एक ही माता-पितासे सम्बन्ध रखनेके कारण परस्पर भाई हैं और एक ही स्वरूपसे प्रकट होनेके कारण परस्पर अभिन्न भी हैं ( शल्य० ४४ । ४४—४७ ) ।
  • (२) कुमारका दूसरा रूप। एक समय इन्द्रने कुमार स्कन्दपर वज्रका प्रहार किया। उस वज्रने उनकी दायीं पसलीपर गहरी चोट पहुँचायी। इस चोटसे उनके शरीरसे एक नूतन रूप प्रकट हुआ, जिसकी युवावस्था थी। उसने सुवर्णमय कवच धारण कर रखा था और कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे। वज्रके प्रविष्ट होनेसे उसकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये वह विशाख नामसे प्रसिद्ध हुआ ( वन० २२७ । १५—१७ ) ।
  • (३) एक ऋषि, जो इन्द्रसभामें रहकर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं ( सभा० ७ । १४ ) ।

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