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विश्वकर्मा ( त्वष्टा )

  • देवताओंके शिल्पी । आठवें वसु प्रभासके पुत्र । बृहस्पतिकी ब्रह्मवादिनी बहिन, जो योगमें तत्पर हो सम्पूर्ण जगत्में अनासक्तभावसे विचरती रहीं, इनकी माता थी ( आदि० ६६ । २६-२८ ) ।
  • इन्द्रप्रस्थ नगरके निर्माणके लिये इन्हीं को इन्द्रका आदेश तथा इनके द्वारा उस नगरका निर्माण ( आदि० २०६ । १५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ५९३-५९४ ) ।
  • ब्रह्माजीके आदेशसे इनके द्वारा तिलोत्तमाका निर्माण ( आदि० २१० । ११-१८ ) ।
  • ये एक महर्षिके रूपमें इन्द्रकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । १४ ) ।
  • इन्होंने यमसभाका निर्माण किया है ( सभा० ८ । १४ ) ।
  • इन्होंने वरुणसभाको जलके भीतर रहकर बनाया है ( सभा० ९ । १२ ) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें रहकर उनकी सेवा करते हैं ( सभा० ११ । ३१ ) ।
  • इन्होंने ब्रह्माजीके वनमें यज्ञ किया था ( वन० ११४ । १७ ) ।
  • इनके द्वारा ही पुष्पक विमानका निर्माण हुआ है ( वन० १६१ । ३७ ) ।
  • नल नामक वानर इनका पुत्र था ( वन० २८३ । ४१ ) ।
  • अर्जुनके रथका ध्वज क्या था, विश्वकर्माकी बनायी हुई दिव्य माया थी ( विराट० ५९ । २७ ) ।
  • इन्द्रके प्रति द्रोहबुद्धि होनेसे इन्होंने तीन शिरवाले एक पुत्रको उत्पन्न किया, जिसका नाम था विश्वरूप ( उद्योग० ९ । ३-४ ) ।
  • विश्वरूपके मारे जानेपर इन्द्रसे बदला लेनेके लिये इन्होंने वृत्रासुरको उत्पन्न किया ( उद्योग० ९ । ४५-४८ ) ।
  • इन्होंने इन्द्रके लिये विजयनामक धनुष बनाया था ( कर्ण० ३१ । ४२ ) ।
  • त्रिपुरदाहके समय भगवान् शिवके लिये दिव्य रथका निर्माण इन्होंने ही किया था ( कर्ण० ३४ । १६-१७ ) ।
  • ( विशेष देखिये त्वष्टा )

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