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विश्वामित्र

  • (१) एक तपस्वी महर्षि, जिन्होंने अपनी तपस्यासे इन्द्रको संतप्त कर दिया था ( आदि० ७१ । २० ) ।
  • इन्होंने मतङ्ग ऋषिका यश कराया तथा महर्षि वसिष्ठका उनके प्यारे पुत्रोंसे सदाके लिये वियोग करा दिया और क्षत्रिय होकर भी ये तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये । अपने शौच-स्नानकी सुविधाके लिये इनके द्वारा कौशिकी नदीका निर्माण किया गया और इन्हींके द्वारा त्रिशङ्कुको स्वर्गलाभ हुआ ( आदि० ७१ । २७—२९ ) ।
  • इन्होंने मेनकाके गर्भसे शकुन्तलाको जन्म दिया ( आदि० ७२ । १—९ ) ।
  • ये अर्जुनके जन्म-समयमें पधारे थे ( आदि० १२१ । ५५ ) ।
  • ये कान्यकुब्ज देशके अधिपति कुशिककुमार महाराज गाधिके पुत्र थे ( आदि० १०४ । ३—४ ) ।
  • वसिष्ठके आश्रमपर इनका आगमन ( आदि० १०४ । ६ ) ।
  • नन्दिनी ( धेनु ) के प्रतापसे मुनिवर वसिष्ठद्वारा इनका भव्य स्वागत ( आदि० १०४ । ८—१२ ) ।
  • नन्दिनीके लिये इनकी वसिष्ठसे याचना ( आदि० १०४ । १६ ) ।
  • इनके द्वारा वसिष्ठकी कामधेनुका अपहरण ( आदि० १०४ । २२ ) ।
  • नन्दिनीद्वारा इनकी समस्त सेनाओंकी पराजय ( आदि० १०४ । ३३—४३ ) ।
  • इनके द्वारा वसिष्ठपर विभिन्न अस्त्रोंका प्रहार ( आदि० १०४ । ४३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) ।
  • वसिष्ठके ब्रह्मतेजसे पराजित होकर इनके द्वारा क्षात्रबलको धिक्कार ( आदि० १०४ । ४४—४५ ) ।
  • उम्र तपस्याके बलसे इनको ब्राह्मणत्वका लाभ ( आदि० १०४ । ४८ ) ।
  • इनकी प्रेरणासे शाल्मलि कल्पमाषादके शरीरमें किङ्कर नामक राक्षसका आवेश ( आदि० १०५ । २९ ) ।
  • इनकी प्रेरणासे राक्षसभावपन्न कल्पमाषादद्वारा वसिष्ठके समस्त पुत्रोंका संहार ( आदि० १०५ । ४१ ) ।
  • ये कौशिकीके तटपर ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए ( वन० ८७ । १३ ) ।
  • इन्होंने उत्पलवनमें अपने पुत्रके साथ यज्ञ किया ( वन० ८७ । १५ ) ।
  • कान्यकुब्ज देशमें इनके नाम सोमपान किया । वहाँ ये क्षत्रियत्वसे ऊपर उठ गये और अपनेको ब्राह्मण घोषित किया ( वन० ८७ । १७ ) ।
  • इन्होंने कौशिकीके तटपर तपस्या की थी ( वन० ११० । २० ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दके तेरह संस्कार सम्पन्न हुए ( वन० २२६ । १३ ) ।
  • इनको ऋषि-पत्नियोंको निरपराध घोषित करना ( वन० २२६ । १६ ) ।
  • ये वसिष्ठरूपधारी धर्मका भोजन सिरपर रखकर सौ वर्षों तक उनकी प्रतीक्षा में खड़े रहे ( उद्योग० १०६ । ८—२१ ) ।
  • इन्होंने गाल्वके हठसे गुरु-दक्षिणामें उनसे आठ सौ श्यामकर्ण घोड़े माँगे ( उद्योग० १०६ । २० ) ।
  • गाल्वसे गुरु-दक्षिणाके लिये तकाजा किया ( उद्योग० ११३ । २०—२१ ) ।
  • गाल्वको छः सौ घोड़े और माधवीको गुरुदक्षिणारूपमें ग्रहण करना ( उद्योग० ११५ । १७ ) ।
  • माधवीके गर्भसे अष्टक नामक पुत्रकी प्राप्ति ( उद्योग० ११५ । १८ ) ।
  • इनका द्रोणाचार्यके पास आकर युद्ध बंद करनेको कहना ( द्रोण० ११० । ३५—४० ) ।
  • इनकी ब्राह्मणत्व-प्राप्तिकी कथाका वर्णन ( शल्य० ४० । १२—२० ) ।
  • इनके द्वारा सरस्वती नदीको शाप ( शल्य० ४२ । २८—२९ ) ।
  • इनके जन्मका प्रसङ्ग ( शान्ति० ४२ । ३० ) ।
  • भूखसे व्याकुल होकर इनका एक चाण्डालके घरमें कुत्तेकी जाँघकी चोरीके लिये घूमना ( शान्ति० १४१ । ४३ ) ।
  • चाण्डालके साथ संवाद ( शान्ति० १४१ । ४५—९१ ) ।
  • मांस पकाकर देवताओं और पितरोंको संतुष्ट करनेपर उन्हींकी कृपासे इन्हें पवित्र भोजनकी प्राप्ति ( शान्ति० १४१ । ९९ ) ।
  • ये उत्तर दिशाके ऋषि हैं ( शान्ति० २०८ । ३२—३४ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इनके प्रभावका वर्णन ( अनु० ३ अध्याय ) ।
  • इनके जन्मकी कथा तथा इनके पुत्रोंके नाम ( अनु० ४ अध्याय ) ।
  • शिव-महिमाके विषयमें इनका युधिष्ठिरसे अपना अनुभव बताना ( अनु० १८ । १६ ) ।
  • ये शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मको देखनेके लिये गये थे ( अनु० २६ । ५ ) ।
  • तृणादमिसे प्रतिग्रहके दोष बताना ( अनु० ९३ । १३ ) ।
  • अरुन्धतीसे अपनी दुर्बलताका कारण बताना ( अनु० ९३ । ६३ ) ।
  • यातुधानीसे अपने नामका अभिप्राय बताना ( अनु० ९३ । ९२ ) ।
  • मृणालकी चोरीके विषयमें शपथ खाना ( अनु० ९३ । १२४—१२६ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शपथ खाना ( अनु० ९४ । ३३ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन ( अनु० १३५ । ३५—३७ ) ।
  • साम्बके पेटसे कृष्ण-अन्धकवंशविनाशक मूसल पैदा होनेका शाप देनेवाले ऋषियोंमें ये भी थे ( मौसल० १ । १५—२१ ) ।
  • ( २ ) कुरुक्षेत्रकी तीर्थोंके अन्तर्गत स्थित एक तीर्थ, जहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है ( वन० ८३ । १३९ ) ।

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