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विश्वावसु

  • (१) गन्धर्वराज । इनके द्वारा मेनकाके गर्भसे प्रमदराकी उत्पत्तिकी कथा ( आदि० ८ । ६—१३ ) ।
  • ये देवगन्धर्व है । इनके पिताका नाम कश्यप और माताका प्राधा है ( आदि० ६५ । ४० ) ।
  • ये अर्जुनके जन्म-समयमें पधारे थे ( आदि० १२२ । ५२ ) ।
  • इन्होंने सोमसे चाक्षुषी विद्या सीखी और स्वयं चित्ररथको सिखायी ( आदि० १६९ । ४३ ) ।
  • ये द्रौपदीका स्वयंवर देखने आये थे ( आदि० १८६ । ७ ) ।
  • ये इन्द्रसभामें रहकर देवराजकी उपासना करते हैं ( सभा० ७ । २२ ) ।
  • कुबेर सभामें उपस्थित हो धनाध्यक्ष कुबेरकी सेवा करते हैं ( सभा० १० । २५ ) ।
  • इनका मन्दगिनी नामक दासीमें श्लोक-गान ( वन० १० । १८ ) ।
  • ये शापवश कनका नामक राक्षस हो गये थे और भगवान् श्रीरामद्वारा इनका उद्धार हुआ था ( वन० २७९ । ३१—४३ ) ।
  • राजा दिलीपके यज्ञमें ये वीणा बजाया करते थे ( द्रोण० ६१ । ७; शांति० २९ । ७५—७६ ) ।
  • महर्षि याज्ञवल्क्यसे चौबीस प्रश्न करना और उनका समाधान हो जानेपर स्वर्ग लौट जाना ( शांति० ३१८ । २४—८४ ) ।
  • (२) जमदग्निके पाँच पुत्रोंमेंसे एक । इनके चार भाइयोंके नाम हैं—रुमण्वानू, सुषेण, वसु और परशुराम । पिताकी मातृवधसम्बन्धी आज्ञा न माननेसे इन्हें पिताद्वारा शाप प्राप्त हुआ ( वन० ११६ । १०—१२ ) ।
  • परशुराम-द्वारा इनका शापसे उद्धार हुआ ( वन० ११६ । १७ ) ।

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