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विष्णु

  • (१) ये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे श्रीकृष्णरूपसे अवतीर्ण हुए ( आदि० ६३ । ९९—१०० ) ।
  • नारद आदित्योंमें सबसे कनिष्ठ; किंतु गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ ( आदि० ६५ । १६ ) ।
  • इन्होंने वरदानमें दुर्वासाको दर्शन दिया ( वन० ८२ । ७५ ) ।
  • देवताओंद्वारा इनका स्तवन ( वन० १०२ । २०—२६ ) ।
  • इनका समुद्र सोखनेके लिये अगस्त्यके पास देवताओंको भेजना ( वन० १०३ । ११ ) ।
  • ये कृतयुगमें श्वेत, त्रेतामें लाल, द्वापरमें पीत तथा कलियुगमें कृष्ण वर्णके हो जाते हैं ( वन० १११ । १७—३४ ) ।
  • उत्तङ्कद्वारा इनकी स्तुति ( वन० २७१ । १४—२४ ) ।
  • इन्होंने वराह रूप धारण किया था; वह सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा था ( वन० २७२ । ५१—५५ ) ।
  • इन्होंने नृसिंह-अवतारका वर्णन ( वन० २७२ । ५६— ६१ ) ।
  • इनके वामन अवतारका वर्णन ( वन० २७२ । ६२—७० ) ।
  • ये ही यदुकुलमें श्रीकृष्णरूपसे अवतीर्ण हुए; इनकी महिमाका वर्णन ( वन० २७२ । ७१— ७७ ) ।
  • देवताओंद्वारा इनकी स्तुति ( उद्योग० १० । ६—८ ) ।
  • सुमुख नागकी रक्षाके लिये गरुडका गर्व नाश करना ( उद्योग० १०५ । १९—३२ ) ।
  • क्षीरसागरके उत्तर तटपर इनके निवास-स्थान, स्वरूप और महिमा आदिका वर्णन ( भीष्म० ८ । १५—१८ ) ।
  • ब्रह्माद्वारा इनका स्तवन ( भीष्म० ६५ । ४०—७५ ) ।
  • त्रिपुर-दाहके समय भगवान् शिवने इन्हें अपना बाण बनाया ( द्रोण० २०२ । ७७; कर्ण० ३४ । ४९ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको चक्र, विक्रम और संक्रम नामक तीन पार्षदोंका दान ( शल्य० ४५ । ३० ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको वैजयन्ती माला और दो निर्मल वस्त्रका दान ( शल्य० ४४ । ४९ ) ।
  • इनका पृथ्वीको आश्वासन ( स्त्री० ८ । १५—२९ ) ।
  • इन्होंने एक मानस पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम विरजा था ( शांति० ५९ । ८७—८८ ) ।
  • इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद ( शांति० ६५ वाँ अध्याय ) ।
  • भगवान् शिवने इन्हें दण्ड नामक अस्त्र समर्पित किया और इन्होंने उसे अङ्गिराको दिया ( शांति० १२२ । ३६—३७ ) ।
  • भगवान् रुद्रद्वारा इन्हें खड्गकी प्राप्ति हुई और इन्होंने उसे मरीचिको प्रदान किया ( शांति० १६६ । ६६ ) ।
  • इनका वराह अवतार धारण करके देवताओंके दुःखका नाश करना ( शांति० २०९ । १६—३० ) ।
  • नारदको आश्वासन देना ( शांति० २०९ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ४९५७ ) ।
  • वामनरूपसे इन्होंने तीन पगोंमें ही पृथ्वीको नाप लिया था ( शांति० २२७ । ७—८ ) ।
  • प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजाका विशेष माहात्म्य ( अनु० १०९ वाँ अध्याय ) ।
  • इन्द्रको धर्मोपदेश ( अनु० १२६ । ११— १२ ) ।
  • इनके द्वारा धर्मके माहात्म्यका वर्णन ( अनु० १२७ । १—४ ) ।
  • इनके सहस्र नामोंका वर्णन ( अनु० १४९ वाँ अध्याय ) ।
  • ( विशेष देखिये नारायण ) ।
  • (२) भानु ( मनु ) अग्निके तीसरे पुत्र । इनका दूसरा नाम 'धृतिमान्' है । ये अङ्गिरागोत्रिय माने गये हैं । दर्श-पौर्णमास नामक यज्ञोंमें इन्हींमें हविष्यका समर्पण होता है ( वन० २२१ । १२ ) ।

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