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विष्णुयशा

  • युगान्तके समय कालकी प्रेरणासे सम्भल नामक ग्राममें किसी ब्राह्मणके यहाँ एक महान् शक्तिशाली बालक प्रकट होगा, जिसका नाम होगा 'विष्णुयशा' कल्की । वह महान् बुद्धि एवं पराक्रमसे सम्पन्न, महात्मा, सदाचारी तथा प्रजावर्गका हितैषी होगा ( वह बालक ही भगवान्का कल्की अवतार कहलायेगा ) । मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायँगे । वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा । वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए इस जगत्को आनन्द प्रदान करेगा । कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा । वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा । वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा ( वन० १९० । १३-१७ ) ।
  • उस समय चोर, डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान् कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको दे डालेंगे । उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन हैं । वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मङ्गलमयी मर्यादाओंका स्थापन करके ( तपस्याके लिये ) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे । फिर इस जगत्के निवासी मनुष्य उनके शील-स्वभावका अनुकरण करेंगे । द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युओंका तथा रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मण-शिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे । दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी । इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यधर्मपरायण होंगे ( वन० १९१ । १-७ ) ।

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