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वृत्र ( वृत्रासुर )

  • कश्यपपत्नी दनायुके गर्भसे उत्पन्न एक असुर ( आदि० ६५ । ३३ ) ।
  • यह राजा मणिमान् के रूपमें इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६५ । ४४ ) ।
  • इस महान् असुरके मस्तकपर वज्रके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये थे ( आदि० १७० । ५० ) ।
  • वृत्रासुरको देवताओंपर चढ़ाई ( वन० १०० । ४ ) ।
  • त्वष्टाकी अभिचारामिसे इसकी उत्पत्ति ( उद्योग० ९ । ४८ ) ।
  • इसका इन्द्रको अपना ग्रास बना लेना ( उद्योग० ९ । ५२ ) ।
  • महावृत्रके समान इन्द्रके साथ शर्तपूर्वक संधि करना ( उद्योग० १० । २७—३१ ) ।
  • इसका शुक्राचार्यके दंडोंका उत्तर देना ( शान्ति० २७१ । १३—३१ ) ।
  • सनत्कुमारजीके उपदेशका समर्थन करते हुए इसका परमधामको प्राप्त करना ( शान्ति० २८० । ५०—५१ ) ।
  • इन्द्रके साथ इसका युद्ध ( शान्ति० २८१ । १३—३१ ) ।
  • इन्द्रके वज्र-प्रहारसे इसके मारे जानेका वर्णन, जब वृत्रासुर ज्वरसे पीड़ित होकर जँभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्रने वज्रका प्रहार किया और वह प्राण त्यागकर विष्णुलोकको चला गया ( वन० १० । ३०; उद्योग० १० । ३०; शान्ति० २८२ । ९; शान्ति० २८३ । ५९—६० ) ।
  • इसके पक्ष-भर्तोंको प्राप्त करते हुए इन्द्रके शरीरमें प्रवेश करने और इन्द्रद्वारा मारे जानेका वर्णन ( आश्रम० ११ । ७—१९ ) ।

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