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वृद्धकन्या

  • महर्षि कुणिगर्गीकी पुत्री, जो बाल ब्रह्मचारिणी थी । इसकी घोर तपस्या ( शल्य० ५२ । ५—१० ) ।
  • नारदजीके कहनेसे इसका श्रृङ्गवान्के साथ आधा पुण्य प्रदान करनेकी प्रतिज्ञापूर्वक अपना विवाह करना ( शल्य० ५२ । १२—१७ ) ।
  • महर्षि श्रृङ्गवान्के साथ एक रात रहकर और उन्हें अपनी तपस्याका आधा पुण्य प्रदान करके इसका स्वर्गगमन ( शल्य० ५२ । १८—२१ ) ।
  • जाते समय उसने अपने स्थानको तीर्थ घोषित किया और उसका फल इस प्रकार बताया— 'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवतर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अठावन वर्षोंतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा' ( शल्य० ५२ । २१—२२ ) ।

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