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व्यास

  • एक महर्षि, जिनको नमस्कार कर लेनेके पश्चात् जय ( महाभारत एवं इतिहास-पुराण आदि ) के पाठकका विधान है । इन्हें कृष्णद्वैपायन कहते हैं ( आदि० १ । मङ्गलाचरण ) ।
  • राजर्षि जनमेजयके सर्पसत्रमें वैशम्पायनद्वारा श्रीकृष्णद्वैपायनकथित महाभारतकी विचित्र, विविध एवं पुण्यमयी कथाएँ सुनायी गयी थीं ( आदि० १ । १-११ ) ।
  • इनकी बनायी हुई महाभारतसंहिता नव शास्त्रोंके अभिप्रायके अनुकूल वेदाभिप्रायसे भूषित तथा चारों वेदोंके भावसे युक्त है ( आदि० १ । १७-२१ ) ।
  • हिमालयकी पवित्र तलहटीमें श्वेतगिरि नामक भीमर स्थानमें आदिसे पवित्र दो कुशासनपर बैठकर ध्यानयोगमें स्थित हो इन्होंने धर्मपूर्वक महाभारत इतिहासके स्वरूपका विचार करते हुए ज्ञानदृष्टिद्वारा आदिसे अन्ततक सब कुछ प्रत्यक्षकी भाँति देखा ( आदि० १ । २६ के बाद दा० पाठ; २९-४१ ) ।
  • इन्होंने तपस्या एवं ब्रह्मचर्यकी शक्तिसे सनातन वेदका विस्तार करके लोकपावन पवित्र इतिहासकी रचना की ( आदि० १ । ५४ ) ।
  • ये पराशरमुनिके पुत्र और द्वैपायन नामसे प्रसिद्ध हैं । उत्तम व्रतधारी, निग्रहानुग्रहसमर्थ एवं सर्वज्ञ हैं । इन्होंने महाभारतकी रचना करके यह विचार किया कि अब मैं शिष्योंको इस ग्रन्थका अध्ययन कैसे कराऊँ । इनके इस विचारको जानकर लोकगुरु भगवान् ब्रह्मा लोककल्याणकी कामनासे स्वयं इनके आश्रमपर पधारे । इन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके उन्हें श्रेष्ठ आसनपर बैठाया । उनके पादपीठिकाकी परिक्रमा की और उनके आसनके पास ही ये हाथ जोड़कर खड़े हो गये । फिर ब्रह्माजीकी आज्ञासे बैठकर प्रसन्नतापूर्वक बोले—''भगवन् ! मैंने एक महाकाव्यकी रचना की है । इसमें सम्पूर्णवेदोंका गुपतम रहस्य तथा अन्य सब शास्त्रोंका सार सङ्कलित हुआ है; परन्तु इसके लिये कोई लेखक नहीं मिलता ।'' ब्रह्माजीने इनके काव्यकी प्रशंसा करके इन्हें गणेश-स्मरणकी आज्ञा दी और स्वयं अपने धामको चले गये ( आदि० १ । ७५-७३ ) ।
  • इन्होंने गणेशजीका स्मरण किया और वे आ गये । व्यासजीने उनसे लेखक बननेकी प्रार्थना की । इन्होंने कहा—''यदि लिखते समय मेरी लेखनी क्षणभर को भी न ठहरे तो मैं लेखक हो सकता हूँ ।'' व्यासजीने कहा— ''ऐसा ही होगा; किन्तु आप भी बिना समझे एक अक्षर भी न लिखें ।'' कहते हैं, इन्होंने महाभारतमें आठ हजार आठ सौ श्लोक ऐसे रचे हैं, जिनका अर्थ ये तथा शुकदेवजी ही ठीक-ठीक समझते हैं । गणेशजी सर्वज्ञ होनेपर भी जब क्षणभर ऐसे श्लोकोंपर विचार करने लगते तबतक व्यासजी और भी बहुत से श्लोकोंकी रचना कर डालते थे ( आदि० १ । ७५-८३ ) ।
  • इन्होंने माता सत्यवती तथा परम ज्ञानी गङ्गापुत्र भीष्मकी आज्ञासे विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे तीन अग्नियोंके समान तीन तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे—धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर । इन सबके परलोकवासी हो जानेके बाद व्यासजीने मनुष्यलोकमें महाभारतका प्रवचन किया । जनमेजय तथा सहस्रों ब्राह्मणोंके प्रश्न करनेपर उन्होंने अपने शिष्य वैशम्पायनको आज्ञा दी थी कि तुम इन्हें महाभारतकी कथा सुनाओ ( आदि० १ । ८४-९४ ) ।
  • इन्होंने उपाख्यानोंसहित जो आद्यभारत या महाभारत बनाया था, वह एक लाख श्लोकोंका है । फिर इन्होंने उपाख्यानभागको छोड़कर चौबीस हजार श्लोकोंकी एक संहिता बनायी, जिसे विद्वान् पुरुष 'भारत' कहते हैं । इन्होंने सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेवको महाभारत ग्रन्थका अध्ययन कराया । फिर दूसरे-दूसरे सुयोग्य शिष्योंको इसका उपदेश दिया । तत्पश्चात् भगवान् व्यासने साठ लाख श्लोकोंकी दूसरी संहिता बनायी । उसके तीस लाख श्लोक देवलोकमें समादृत हो रहे हैं । पितृलोकमें पंद्रह लाख तथा गन्धर्वलोकमें चौदह लाख श्लोकोंका पाठ होता है । शेष रह एक लाख श्लोक ! उन्हींको आद्य भारत या महाभारत कहते हैं । मनुष्यलोकमें ये ही प्रतिष्ठित हैं । देवताओंको देवर्षि नारदने, पितरोंको असित देवलने, गन्धर्वोंको शुकदेवजीने और मनुष्योंको वैशम्पायनजीने महाभारतसंहिता सुनायी थी ( आदि० १ । १०१-१०९ ) ।
  • पुत्र और शिष्योसहित भगवान् वेदव्यास जनमेजयके सर्पसत्रमें सदस्य बने थे ( आदि० ५३ । ७-१० ) ।
  • आस्तीकके जनमेजयके यज्ञको सत्यवतीनन्दन व्यासके यज्ञके समान बताया ( आदि० ५५ । ७ ) ।
  • यज्ञकर्मसे अवकाश मिलनेपर व्यासदेवजीने अति विचित्र महाभारतकी कथा सुनाना प्रारम्भ की ( आदि० ५९ । ५ ) ।
  • इन्हें 'सत्यवती' नामकी कन्यावस्था में ही पराशर मुनिसे यमुनाद्वीपमें उत्पन्न किया था । ये पाण्डवोंके पितामह थे । इन्होंने जन्म लेते ही अपनी इच्छासे शरीरको बड़ा लिया था । इनको स्वतः ही अङ्गों और इतिहासोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका तथा परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो गया था । ये वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । इन्होंने एक ही वेदको चार भागोंमें विभक्त किया है । ब्रह्मर्षि व्यासजी परब्रह्म और अपरब्रह्मके ज्ञाता, कवि ( त्रिकालदर्शी ), सत्यव्रतपरायण तथा परम पवित्र हैं । इन्होंने ही शान्तनुकी सन्तानपरम्पराका विस्तार करनेके लिये धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुरको जन्म दिया था । ये जनमेजयके सर्पसत्रमें पधारे । राजा जनमेजयने सेवकोंसहित उठकर इनकी आगवानी की । इन्हें सोनेके सिंहासनपर बिठाकर इनका पूजन किया और कुशलप्रश्नके पश्चात् इनसे महाभारत-युद्धका वृत्तान्त पूछा । तब इन्होंने अपने पास बैठे हुए शिष्य वैशम्पायनको वह सारा प्रसङ्ग सुनानेकी आज्ञा दी ( आदि० ६० । १-२२ ) ।
  • वैशम्पायन गुरुदेव व्यासको नमस्कार करके कथा प्रारम्भ की ( आदि० ६१ । १-२ ) ।
  • व्यासजीके कहे हुए इस पञ्चम वेदरूप महाभारतको ‘कार्ष्ण वेद’ कहते हैं । जो इसका श्रवण कराता है, उसे अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति होती है । यह जय नामक इतिहास है । इसकी महिमाका विस्तृत वर्णन ( आदि० ६२ । १८-४१ ) ।
  • मुनिवर व्यास प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान-संध्या आदिसे शुद्ध हो महाभारतकी रचना करते थे । इन्होंने तपस्या और नियमका आश्रय ले तीन वर्षोंमें इस ग्रन्थको पूरा किया था ( आदि० ६२ । ४१-४२ ) ।
  • माता सत्यवतीने पराशरजीके संयोगसे तत्काल ही यमुनाके द्वीपमें इनको जन्म दिया था; इसीलिये ये पाराशर्य और द्वैपायन कहलाये । इन्होंने मातासे आज्ञा लेकर तपस्यामें ही मन लगाया और मातासे कहा, आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना, मैं अवश्य दर्शन दूँगा ( आदि० ६३ । ८४-८५ ) ।
  • वेदोंका व्यास ( विस्तार ) करनेके कारण ये वेदव्यास नामसे विख्यात हुए ( आदि० ६३ । ८८ ) ।
  • इन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और पञ्चम वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, शुकदेव तथा वैशम्पायनको कराया ( आदि० ६३ । ८९-९० ) ।
  • इनके द्वारा अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भमें राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ और इन्हींसे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजी उत्पन्न हुए; जो धर्म-अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान्, मेधावी और निष्पाप थे ( आदि० ११३ । ११३-११४ ) ।
  • सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाहन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे सन्तानोत्पादन करनेकी स्वीकृति देना ( आदि० १०५ । १५-१६ ) ।
  • इनके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति तथा माताके पूछनेपर इनका उन पुत्रोंके भावी गुणों और लक्षणोंका वर्णन ( आदि० १०५ अध्याय ) ।
  • इनका गान्धारीको सौ पुत्र होनेका वरदान देना ( आदि० ११४ । ८ ) ।
  • इनके द्वारा गान्धारीके लिये उसके गर्भसे गिरे हुए मांसपिण्डके सौ पुत्र होनेकी व्यवस्था ( आदि० ११४ । १०-२४ ) ।
  • इनका मांस-पिण्डके एक सौ एकवें भागसे गान्धारीके लिये एक पुत्री होनेका आश्वासन देना और उसे भी घृतपूर्ण घटमें स्थापित करना ( आदि० ११५ । १५-१८ ) ।
  • वनमें व्यासजीका कुन्तीसहित पाण्डवोंको दर्शन और आश्वासन देना ( आदि० १५५ । ५-१९ ) ।
  • इनका पाण्डवोंको पुनः दर्शन देकर द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना और उसके इन सभी पतियोंकी बात बताकर इन्हें पाञ्चालकी राजधानीमें जानेके लिये आदेश देना ( आदि० १६८ अध्याय ) ।
  • जिसे देवलोकमें अलकनन्दा कहते हैं—यह कृष्णद्वैपायनका मत है ( आदि० १६९ । २२ ) ।
  • द्रुपदकी राजधानीकी ओर जाते हुए पाण्डवोंसे मार्गमें इनकी भेंट और परस्पर स्वागत-सत्कारके बाद वार्तालाप ( आदि० १८४ । २-३ ) ।
  • व्यासजीके समक्ष द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना तथा असमंजससे डरी हुई कुन्तीको इनका आश्वासन देना ( आदि० १९५ अध्याय ) ।
  • इनका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर उन्हें दिव्य दृष्टि देना ( आदि० १९६ । १-२८ ) ।
  • द्रौपदी स्वर्गकी लक्ष्मी है और पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी नियत की गयी है—इस बातका द्रुपदको निश्चय कराना ( आदि० १९६ । ३१-५३ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास युधिष्ठिरकी सभामें विराजमान होते थे ( सभा० ४ । ११ ) ।
  • इनका अर्जुनको उत्तर, भीमसेनको पूर्व, सहदेवको दक्षिण और नकुलको पश्चिम दिशाओंमें दिग्विजयके लिये जानेका आदेश ( सभा० २४ । ४ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७४२ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें ब्रह्माका कार्य सँभालना ( सभा० ३३ । ३४ ) ।
  • राजसूय यज्ञके अन्तमें युधिष्ठिरके प्रति अभिषिक्त होना ( सभा० ५३ । १-१० ) ।
  • इन्होंने राजसूय यज्ञके अन्तमें युधिष्ठिरका अभिषेक किया ( सभा० ५३ । १३ ) ।
  • इनका पाण्डवोंसे दुर्योधनके अन्यायकी रोकनेके लिये अनुरोध ( वन० ६ । २२ से वन० ८ अध्यायतक ) ।
  • इनके द्वारा सुरभि और इन्द्रके उपाख्यानका वर्णन तथा पाण्डवोंके प्रति दया दिखाना ( वन० ९ अध्याय ) ।
  • पुत्रशोकसे संतप्त धृतराष्ट्रको सूचना देकर इनका प्रस्थान ( वन० १० । ४-६ ) ।
  • इनका द्वैतवनमें पाण्डवोंके पास जाना और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृति विषयका दान करना ( वन० २६ । २४-२८ ) ।
  • कुरुक्षेत्रकी सीमाके अन्तर्गत एक मिश्रकतीर्थ है, जहाँ महात्मा व्यासने द्विजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है । आगे चलकर व्यासवन है, और इससे भी आगे व्यासस्थली नामक एक स्थान है, जहाँ बुद्धिमान् व्यासने पुत्रशोकसे संतप्त हो शरीर त्याग देनेका विचार किया था ( वन० ८३ । १९-९७ ) ।
  • पाण्डवोंसे दान-धर्मके प्रतिपादनके प्रसंगमें मुद्गल ऋषिकी कथा सुनाना ( वन० अध्याय २६० से २६१ तक ) ।
  • धृतराष्ट्रसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बतानेके लिये संजयको आदेश ( उद्योग० ६७ । १० ) ।
  • इनका धृतराष्ट्र-संजय-संवाद ( उद्योग० ६९ । ११-१५ ) ।
  • इनके द्वारा संजयको दिव्य-दृष्टि-दान ( भीष्म० २ । १० ) ।
  • धृतराष्ट्रसे भयंकर उत्पातोंका वर्णन करना ( भीष्म० २ । १६ से भीष्म० ३ । ४५ तक ) ।
  • विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन करना ( भीष्म० ३ । ६५-८५ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरको मृत्युकी अनिवार्यता बताना ( द्रोण० ५२ । ११ ) ।
  • युधिष्ठिरको नारद-अकम्पन-संवाद सुनाना ( द्रोण० ५२ । २० से ५४ अध्यायतक ) ।
  • भीष्म-अम्बासंवादका प्रारम्भ करना ( द्रोण० अध्याय ५५ से द्रोण० ७१ । २२ तक ) ।
  • युधिष्ठिरका शोक-निवारण करके अन्तर्धान होना ( द्रोण० ७१ । २३ ) ।
  • द्रोणवधसे दुखी युधिष्ठिरको समझाना ( द्रोण० १८४ । ५८-६० ) ।
  • अश्वत्थामासे शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना ( द्रोण० २०१ । ५६-५९ ) ।
  • अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना ( द्रोण० २०२ अध्याय ) ; शल्य० २१ । ३९ ) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रको सान्त्वना ( शल्य० ६३ । ७७ ) ।
  • अर्जुन और अश्वत्थामाके ब्रह्मशस्त्रको शान्त करनेके लिये इनका प्रकट होना ( सौप्तिक० १४ । ११ ) ।
  • अश्वत्थामासे अपनी मणि देकर शान्त हो जानेके लिये कहना ( सौप्तिक० १५ । १९-२१ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा अश्वत्थामाको दिये गये शापका समर्थन करना ( सौप्तिक० १६ । १०-१८ ) ।
  • शोकसे मूर्च्छित धृतराष्ट्रको समझाना ( स्त्री० ८ । १२-१५ ) ।
  • पाण्डवोंको शाप देनेके लिये उद्यत गान्धारीको समझाना ( स्त्री० १७ । ७-१२ ) ।
  • युद्धके पश्चात् युधिष्ठिरके पास आना ( शान्ति० १ । ४ ) ।
  • युधिष्ठिरसे शत्रु और मित्रके विषयमें पूछना तथा सुद्युम्नके राजदण्डकी महत्ताका प्रतिपादन करना ( शान्ति० २३ अध्याय ) ।
  • राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाते हुए युधिष्ठिरको राजोचित कर्तव्य-पालनके लिये समझाना ( शान्ति० २४ अध्याय ) ।
  • राजा सेनजित्के उद्धारका उल्लेख करते हुए युधिष्ठिरको आश्वासन देना ( शान्ति० २५ अध्याय ) ।
  • शरीर त्यागनेके लिये उद्यत युधिष्ठिरको रोककर समझाना ( शान्ति० २७ । २६-३१ ) ।
  • असमा मुनि और जनकके संवादरूपमें प्रारम्भकी प्रबलता बताकर युधिष्ठिरको समझाना-बुझाना ( शान्ति० २८ अध्याय ) ।
  • अनेक युक्तियोंद्वारा युधिष्ठिरको समझाना ( शान्ति० ३२ अध्याय ) ।
  • कालकी प्रबलता बताकर देवासुर-संग्रामके उदाहरणसे युधिष्ठिरको प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना ( शान्ति० ३३ । १४-४८ ) ।
  • युधिष्ठिरसे प्रायश्चित्तका वर्णन करना ( शान्ति० अध्याय ३४ से ३५ तक ) ।
  • स्वायम्भुव मनुद्वारा कथित धर्मका उपदेश करना ( शान्ति० ३६ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरको भीष्मके पास चलनेके लिये कहना ( शान्ति० ३७ । ९-१५ ) ।
  • शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीको देखनेके लिये इनका पदार्पण करना ( शान्ति० ४५ । ५ ) ।
  • व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको कालका स्वरूप बताना ( शान्ति० २३१ । १९-२२ ) ।
  • शुकदेवको सृष्टिक्रम तथा युगधर्मका उपदेश देना ( शान्ति० २३२ अध्याय ) ।
  • इनका ब्राह्मप्रलय और महाप्रलयका वर्णन करना ( शान्ति० २३३ अध्याय ) ।
  • ब्राह्मणोंके कर्तव्य और दानकी प्रशंसा करना ( शान्ति० २३४ अध्याय ) ।
  • स्वर्ग, काल, धारणा, वेद, कर्ता, कार्य और क्रियाफलके विषयमें इनका शुकदेवको उपदेश करना ( शान्ति० अध्याय २३५ से २३९ तक ) ।
  • शुकदेवको मोक्ष-धर्मविषयक विभिन्न प्रश्नोंका उत्तर देना ( शान्ति० अध्याय २४० से २५५ तक ) ।
  • अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए चेतावनी देना ( शान्ति० २३१ । ४-५ ) ।
  • इनको पुत्र प्राप्तिके लिये तपस्या और शङ्करजीसे वर-प्राप्ति ( शान्ति० २३३ । १२-२९ ) ।
  • घृताचीसे मोहित होनेके कारण अरणी-काष्ठपर इनके वीर्यका पतन और उससे शुकदेवजीका दर्शन ( शान्ति० २३४ । ८-१० ) ।
  • शुकदेवको जनकके पास भेजना ( शान्ति० ३२५ । ६-११ ) ।
  • शिष्योंको वरदान देना ( शान्ति० ३२७ । ३०-५२ ) ।
  • नारद-अकम्पनसे अपनी उदासीनताका कारण बताना ( शान्ति० ३२८ । १६-४२ ) ।
  • शुकदेवकी अनध्यापका कारण बताना तथा ध्रुव आदि सात वायुओंका परिचय देना ( शान्ति० ३२८ । २८-५७ ) ।
  • पुत्र-मोहवश शुकदेव-जीको जानेसे रोकना ( शान्ति० ३३१ । ६३ ) ।
  • पुत्र-विरहजनित शोकसे व्याकुलता ( शान्ति० ३३१ । ६९ ) ।
  • व्यासजीका अपने शिष्योंको दिये गये नारायणके उपदेशको सुनाना ( शान्ति० ३३० । १०-११० ) ।
  • नारदके मुखसे इन्हें सात्वतधर्मकी उपलब्धि और इनके द्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको इस धर्मका उपदेश ( शान्ति० ३४८ । ६५ ) ।
  • सरस्वतीके पुत्र अपान्तरतमाके रूपमें इनकी उत्पत्ति और महिमा ( शान्ति० ३४९ । ३९-५८ ) ।
  • युधिष्ठिरसे शिवधर्मके विषयमें इनका अपना अनुभव बताना ( अनु० १८ । १-३ ) ।
  • भीष्मजीके समक्ष इनके द्वारा ब्रह्महत्याके समान पापोंका निरूपण ( अनु० २४ । ५-१२ ) ।
  • व्यासजीका शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महिमाका वर्णन ( अनु० ८१ । १२-४६ ) ।
  • एक कीटको ब्राह्मणत्व प्राप्त कराकर उसका उद्धार करना ( अनु० अध्याय ११० से ११६ तक ) ।
  • मैत्रेयके प्रश्नोंके उत्तरमें उनके साथ व्यासजीका संवाद ( अनु० अध्याय १२० से १२२ तक ) ।
  • भीष्मसे युधिष्ठिरको हस्तिनापुर जानेकी आज्ञा देनेको कहना ( अनु० १६६ । ६-७ ) ।
  • इनका शोकाकुल युधिष्ठिरको समझाना ( आश्व० २ । १५-२० ) ।
  • युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञ करनेकी सलाह देना ( आश्व० ३ । १८-२० ) ।
  • व्यासजीका युधिष्ठिरको धन-प्राप्तिका उपाय बताना ( आश्व० अध्याय ४ से १० तक ) ।
  • युधिष्ठिरको मरुत्तका वृत्तान्त सुनाना (आश्व० अध्याय ४ से १० तक)।
  • पतिशोकसे दुःखी उत्तराको आश्वासन देना (आश्व० ६२।११-१२)।
  • पुत्रशोकसे दुखी अर्जुनको समझाना ( आश्व० ६२ । १४-१७ ) ।
  • युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञकी आज्ञा देकर अन्तर्धान होना ( आश्व० १२ । २० ) ।
  • इनका अर्जुनको अश्वमेधीय अश्वको रक्षाके लिऐ, भीमसेन और नकुलको राज्य-पालन-सम्बन्धी कार्योंकी देख-रेखके लिये नियुक्त करना ( आश्व० ७२ । १९-२० ) ।
  • इनके द्वारा शास्त्रीय विधिके अनुसार अश्वमेधीय अश्वका उत्सर्ग ( आश्व० ७३ । ३ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इनकी समस्त पृथ्वीका दान तथा इनके द्वारा पृथ्वीको उन्हें लौटाकर उसके निष्क्रयरूपसे ब्राह्मणोंके लिये सुवर्ण देनेका आदेश ( आश्व० ८९ । ८-१६ ) ।
  • इनके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना ( आश्रम० ४ अध्याय ) ।
  • इनका वनमें धृतराष्ट्रके पास आना और उनका कुशल-समाचार पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरका धर्मरूपताका प्रतिपादन करके उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना ( आश्रम० २८ अध्याय ) ।
  • इनका अपना तपोबल दिखलानेके लिये कहकर धृतराष्ट्रको मनोवाञ्छित वर माँगनेके लिये आज्ञा देना तथा गांधारी और कुन्तीका इनसे अपने मरे हुए पुत्रों एवं सम्बन्धियोंके दर्शन करानेका अनुरोध करना ( आश्रम० २९ अध्याय ) ।
  • कुन्तीका इन्हें कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्तवना देना (आश्व० ३० अध्याय)।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पुवजन्मका परिचय तथा इनकी आज्ञासे सबका गङ्गातटपर जाना ( आश्रम० ३१ अध्याय ) ।
  • इनके प्रभावसे कुरुक्षेत्रमें मरे गये कौरव-पाण्डव वीरोंको गङ्गाके जलसे प्रकट होना ( आश्रम० ३२ अध्याय ) ।
  • इनका आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गामें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना ( आश्रम० ३३ । १८-२२ ) ।
  • इनकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना ( आश्रम० ३५ । ४-११ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रको पाण्डवोंको विदा करनेके लिये आदेश देना ( आश्रम० ३६ । ५-१२ ) ।
  • यदुकुल संहारके पश्चात् अर्जुनका इनके आश्रमपर आना और उनके साथ इनका वार्तालाप ( मौसल० ८ अध्याय ) ।
  • व्यासनिर्मित महाभारतके श्रवण एवं पठनकी महिमा ( स्वर्गारो० ५ । ३५-३८ ) ।

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