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शकुनि

  • (१) धृतराष्ट्र-कुलमें उत्पन्न एक नाग, जो जनमेजयके सर्पसत्रमें दग्ध हो गया था ( आदि० ५७ । १६ ) ।
  • (२) गान्धारराज सुबलका पुत्र, दुर्योधनका मामा; इसकी सहायतासे दुर्योधनने युधिष्ठिरको जुएमें ठग लिया था ( आदि० ६१ । ५० ) ।
  • देवताओंके कोपसे यह धर्मविरोधी हुआ ( आदि० ६३ । १११-११२ ) ।
  • यह द्वापरके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ७८; आश्रम० ३१ । १० ) ।
  • इसके द्वारा गान्धारीके विवाह-कार्यका सम्पादन ( आदि० १०९ । १५-१६ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८५ । २ ) ।
  • पाण्डवोंको जड़-मूलसहित नष्ट कर देनेके लिये इसका द्रुपदनगरमें कौरवोंको परामर्श देना ( आदि० १९५ । ७ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ५०३-५०४ ) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूय-यज्ञमें इसका पदार्पण ( सभा० ३४ । ६ ) ।
  • यह सबके विदा होनेपर भी उस दिव्य सभाभवनमें दुर्योधनके साथ ठहरा रहा ( सभा० ४५ । १८ ) ।
  • पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके सम्बन्धमें इसकी दुर्योधनसे बातचीत ( सभा० ४८ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरकी सम्पत्ति ( ऐश्वर्य ) को हड़पनेके लिये इसके द्वारा धृतराष्ट्रका परामर्श देना ( सभा० ४९ अध्याय ) ।
  • जूएमें छल करके इसका युधिष्ठिरके साथ जुआ खेलना ( सभा० अध्याय ६० से ६१ तक ) ।
  • इसके साथ जुआ खेलकर युधिष्ठिरका अपना सब कुछ हार जाना ( सभा० अध्याय ६५ ) ।
  • पुनर्जुआमें इसका युधिष्ठिरको हराना और एक ही दाँवमें अपनी विजय घोषित करना ( सभा० ७६ । १-२४ ) ।
  • पाण्डव प्रतिज्ञा तोड़कर वनसे नहीं लौटेंगे, यह कहकर इसका दुर्योधनको आशंकाको दूर करना ( वन० ७ । ७-१० ) ।
  • दैतवनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये इसका घोषयात्रामें प्रस्तावका समर्थन करना ( वन० २३८ । २९, ३३ ) ।
  • धृतराष्ट्रको घोषयात्राकी अनुमति के लिये समझाना ( वन० २३९ । १८-२१ ) ।
  • इसका घोषयात्रामें दुर्योधनके साथ गन्धर्वोंसे युद्ध करके घायल होना ( वन० २४१ । १७-२७ ) ।
  • दुर्योधनको पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके लिये समझाना ( वन० २५१ । १-८ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें प्रतिविन्ध्यके साथ द्वंद्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । ६३-६५ ) ।
  • इसके पुत्र उलूकका भीमसेनद्वारा वध ( भीष्म० ९० । २५-२७ ) ।
  • इसका युधिष्ठिर, नकुल और सहदेवपर आक्रमण और इसके द्वारा इसकी पराजय ( भीष्म० १०५ । ८-१६ ) ।
  • सहदेवके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । २२-२५ ) ।
  • इसके द्वारा मायावीका प्रयोग तथा अर्जुनद्वारा उन मायावीका नाश होनेपर इसका पलायन ( द्रोण० ३० । १५-२८ ) ।
  • अभिमन्युके साथ युद्ध ( द्रोण० ३७ । ५ ) ।
  • नकुल सहदेवके साथ युद्ध ( द्रोण० ९६ । २१-२५ ) ।
  • सात्यकि के साथ युद्ध ( द्रोण० १२० । ११ ) ।
  • भीमसेन द्वारा इसके सात रथियों और पाँच भाइयोंका संहार ( द्रोण० १५० । २२-२६ ) ।
  • नकुलद्वारा इसकी पराजय ( द्रोण० १६१ । १६ ) ।
  • इसका दुर्योधनका आज्ञासे पाण्डवसेनापर आक्रमण ( द्रोण० १७० । ११ ) ।
  • अर्जुनद्वारा इसका पराजय ( द्रोण० १९१ । २५-२९ ) । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर इसका युद्धस्थलसे भागना ( द्रोण० ११३ । १ ) ।
  • इसके द्वारा सुत- सोमकी पराजय ( कर्ण० २७ । ४० ) ।
  • सात्यकि- द्वारा इसका पराजित होना ( कर्ण० ५१ । ४८-४९ ) ।
  • भीमसेनद्वारा पृथ्वीपर गिराया जाना ( कर्ण० ७७ । ६९-७० ) ।
  • इसके द्वारा भाईसहित कुन्तिभोज-राजकुमारका वध ( कर्ण० ८५ । ७-११ ) ।
  • पाण्डव घुड़सवारोंका इसके ऊपर आक्रमण, इसका भागना, पुनः घुड़सवारोंका सेना- पर आक्रमण करना तथा पाण्डव सैनिकोंमें मिलकर युद्धका होना ( शल्य० २२ । ४१-४४ ) ।
  • सहदेवद्वारा इसका वध ( शल्य० २८ । ६१ ) ।
  • व्यासजीके प्रभावसे यह भी गङ्गाजीके जलसे प्रकटहो अपने सर्व-सम्बन्धियोंसे मिला था ( आश्रम० ३२ । ९ ) ।
  • मृत्युके पश्चात् यह द्वापरमें मिल गया ( स्वर्ग० ५ । २१ ) ।

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