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शकुन्तला

  • महर्षि कण्वकी पोषित पुत्री, जो सम्राट् दुष्यन्तकी धर्मपत्नी और भरतकी माता हुई । इनके यहाँ राजा दुष्यन्तका आगमन । इनके द्वारा उनका स्वागत तथा अपने जन्म-प्रसंगका वर्णन ( आदि० ७१ अध्याय ) ।
  • ये विश्वामित्रके द्वारा मेनका नामक अप्सराके गर्भसे हिमालयके शिखरपर मालिनी नदीके किनारे उत्पन्न हुई थीं । कण्व इनके पालक पिता थे । इनकी उत्पत्तिकी कथा ( आदि० ७२ । १-१० ) ।
  • शकुन्तों ( पक्षियों ) द्वारा रक्षित होनेके कारण इनका नाम 'शकुन्तला' हुआ ( आदि० ७२ । ११-१६ ) ।
  • दुष्यन्तके सामने बैठनेपर इनके द्वारा स्त्री-स्वातंत्र्यका निषेध, अपनी पितृभक्ति एवं ब्राह्मणके प्रभावका वर्णन ( आदि० ७२ । १५ के पूर्वतक ) ।
  • दुष्यन्तके द्वारा विवाहके आठ भेद बतलाकर इनके प्रति गान्धर्व-विवाहका समर्थन ( आदि० ७२ । ८-१४ ) ।
  • दुष्यन्तके साथ इनके विवाहकी शर्त ( आदि० ७२ । १५-१७ ) ।
  • दुष्यन्तके साथ इनका गान्धर्व विवाह ( आदि० ७२ । १९-२० ) ।
  • कण्वके प्रति इनके द्वारा अपने गुप्त विवाहके वृत्तान्तका निवेदन ( आदि० ७२ । २४ के बाद ) ।
  • कण्वद्वारा इनके विवाहका समर्थन तथा आशीर्वाद ( आदि० ७३ । २२ के बाद ) ।
  • इनके गर्भसे दुष्यन्तद्वारा भरतका जन्म ( आदि० ७४ । २ ) ।
  • कण्वद्वारा इनके प्रति पातिव्रत्य धर्मका उपदेश और उसकी महिमाका वर्णन ( आदि० ७४ । ९-१० ) ।
  • पिताकी आज्ञा पाकर इनका पति-गृह-गमन ( आदि० ७४ । १०-१४ ) ।
  • इनका राजा दुष्यन्तसे अपने पुत्रको ग्रहण करने और युवराज-पदपर अभिषिक्त करनेके लिये कहना तथा अपने साथ उनके सम्बन्ध और प्रतिज्ञाका स्मरण दिलाना ( आदि० ७४ । १६-१८ ) ।
  • दुष्यन्तका अस्वीकार करनेपर इनके अन्य सब देवगणों, सप्तर्षियों, धर्मकी देवियों और परमात्मा एवं सूर्य आदि देवताओंको दुष्यन्तका मार्ग बतलाकर दुष्यन्तसे अपने साथ न्यायपूर्वक व्यवहार करनेके लिये अनुरोध, पातिव्रत्य, पत्नी और पुत्र-पौत्रोंकी महिमा बतलाकर दुष्यन्तको उनके साथ अपने पूर्व सम्बन्धका स्मरण दिलाना ( आदि० ७४ । २१-२७ ) ।
  • दुष्यन्तके प्रति इनके द्वारा अपने जन्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ( आदि० ७४ । २९-३० ) ।
  • इनके द्वारा दुष्यन्तके प्रति पुनः अपने जन्म-कर्मकी महत्ता बतलाते हुए सत्यधर्मकी श्रेष्ठताका कथन तथा निराग्रह होकर जानेका उपक्रम ( आदि० ७४ । ७५ से १०८ के बाद तक ) ।
  • आकाशवाणीद्वारा इनके कथनकी सत्यता घोषित होनेपर दुष्यन्तद्वारा अङ्गीकार ( आदि० ७४ । १०९-१२५ ) ।
  • दुष्यन्त- द्वारा इनका पटरानीके पदपर अभिषेक ( आदि० ७४ । १२५ के बाद ) ।

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