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शरद्वान्

  • एक गौतमगोत्रीय महर्षि ( आदि० १२९ । १०७ ) ।
  • ये महर्षि गौतमके पुत्र थे और शरकण्डोंके साथ उत्पन्न हुए थे । ये स्वयं भी गौतम कहलाते थे । इनकी बुद्धि जितनी धनुर्वेदमें लगती थी, उतनी वेदोंके अध्ययनमें नहीं लगती थी ( आदि० १२९ । २-३ ) ।
  • जैसे अन्य ब्रह्मचारी तपस्यापूर्वक वेदोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार इन्होंने तपस्यामें संलग्न होकर सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उपदेश दिया ( आदि० १२९ । ४-२२ ) ।
  • इनकी तपस्या भी बड़ी भारी थी । इससे इन्होंने देवराज इन्द्रको चिन्तामें डाल दिया था; तब देवराजने जानपदी नामवाली एक देवकन्याको इनके पास भेजा और यह आदेश दिया कि तुम शरदानुकी तपस्यामें विघ्न डालो । जानपदी शरदानुके स्वर्गीय आश्रमपर जाकर इन्हें लुभाने लगी । उस अप्रतिम सुन्दरी अप्सराको देखकर इनके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और हाथोंसे धनुष एवं बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े । उसकी ओर देखनेसे इनके शरीरमें कम्प हो आया । शरदान् ज्ञानमें बहुत बड़े-चढ़े थे और इनमें तपस्याकी भी प्रबल शक्ति थी; अतः ये महाप्राज्ञ मुनि अत्यन्त धीरतापूर्वक अपनी मर्यादामें स्थित रहे । किंतु इनके मनमें सहसा जो विकार आ गया था; इससे इनका वीर्य स्खलित हो गया; परंतु इस बातका इन्हें भान नहीं हुआ । ये धनुष-बाण, काला मृगचर्म, वह आश्रम और वह अप्सरा—सबको वहीं छोड़कर वहाँसे चल दिये । इनका वह वीर्य शरकण्डके समुदायपर गिरकर दो भागोंमें विभक्त हो गया । उससे एक पुत्र और एक कन्याका उत्पात हुआ, जिन्हें राजा शान्तनुने कृपापूर्वक पाला और उनका नाम कृप एवं कृपी रखदिया । शरदानुको तपस्याके बलसे ज्ञान हो गया और इन्होंने गुरुस्वरूपसे आकर उनको गौण आदिका परिचय दे, उसे चार प्रकारके धनुर्वेद, नाना प्रकारके शास्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उपदेश दिया ( आदि० १२९ । ४ - २२ ) ।

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