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शर्मी

  • इजार दासियोंके साथ रहनेके लिये प्रतिज्ञा करना ( आदि० ८० । १९—२२ ) ।
  • इसके प्रति देवयानीका कटाक्ष और इसके द्वारा उसको समुचित उत्तर ( आदि० ८० । २३-२४ ) ।
  • एक सहस्र दासियोंसहित शर्मिष्ठाका देवयानीकी सेवामें उपस्थित होकर उसके साथ वन-विहारके लिये जाना और वहाँ आमोद-प्रमोदमें मग्न होना ( आदि० ८१ । २—४ ) ।
  • राजा ययातिसे उस स्थानपर जल पीनेकी इच्छासे आना और शर्मिष्ठाद्वारा सेवित देवयानीसे उन दोनोंका परिचय पूछना । देवयानीका दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको अपनी दानी दानाका ( आदि० ८१ । ९—१० ) ।
  • शुक्राचार्यका ययातिको अपनी पुत्रीका समर्पण करते समय कुमारी शर्मिष्ठाको भी समर्पित करना और उसे अपनी शय्यापर बुलानेसे मना करना ( आदि० ८१ । १४-१५ ) ।
  • एक दिन अपनेको रजस्वलावस्था में पाकर शर्मिष्ठा चिन्तामग्न हो गयी । स्नान करके शुद्ध हो समस्त आभूषणोंसे विभूषित हुई शर्मिष्ठा सुन्दर पुष्पोंके गुच्छोंसे भरी अशोकवृक्षके आश्रय लिये खड़ी थी । उसने दर्पणमें अपना मुँह देखा और इसके मनमें पतिके दर्शनकी लालसा जाग उठी । इसने अशोकवृक्षसे प्रार्थना की कि तुम मुझे भी प्रियतमका दर्शन कराकर अपने ही समान अशोक ( शोकरहित ) कर दो । फिर इसने राजा ययातिको ही पति बनानेका निश्चय किया; राजाको एकान्तमें पाकर इसने नम्रतापूर्वक उनके सामने अपना मनोभाव प्रकट किया । इस विषयको लेकर इन दोनोंमें कुछ देरतक संवाद हुआ, अन्तमें राजाने इसके साथ समागम किया । शर्मिष्ठाके गर्भ रह गया और इसने समय आनेपर एक देवोपम कुमारको जन्म दिया ( आदि० ८२ । ५—१० ) ।
  • इसके पुत्र होनेकी बात सुनकर देवयानीका इसने उस विषयमें पूछ-ताछ करना और शर्मिष्ठाका एक श्रेष्ठ ऋषपे अपने संतान-प्राप्त होनेकी बात बताकर उसे संतुष्ट कर देना ( आदि० ८३ । १—८ ) ।
  • इसके गर्भसे ययातिके द्वारा क्रमशः द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—इन तीन कुमारोंकी उत्पत्ति ( आदि० ८३ । १०, आदि० ९५ । १३ ) ।
  • शर्मिष्ठाके पुत्रोंसे उनके पिता-माताका यथार्थ परिचय जानकर देवयानीका शर्मिष्ठाको फटकारना और शर्मिष्ठाका उसे मुँहतोड़ उत्तर देना ( आदि० ८६ । १८—२२ दा० पाठसहित ) ।
  • यामुन पर्वतकी तलहटीमें बसे हुए 'पर्णशाला' नामक गाँवका एक अगस्त्यगोत्रीय, शमपरायण, अध्यापक ब्राह्मण, जिसे बुलानेके लिये यमराजने दूत भेजा था ( अनु० ६८ । ३—९ ) ।
  • इसी नाम और गुणवाला एक दूसरा ब्राह्मण भी उस गाँवमें था, जिसे लानेका
  • यमरजने निषेध कर दिया था ( अनु० ६८ । ७-८ ) ।
  • यमदूत उसी ब्राह्मणको ले गये, जिसे यमराजने मना किया था । यमराजने उसकी पूजा करके उसे घर जानेकी आज्ञा दी; साथ ही उसके पूछनेपर महान् पुण्यदायक कर्मके प्रसंगमें तिलदान, अन्नदान और जलदानकी विशेष महिमा बतायी ( अनु० ६८ । १०-२२ ) ।
  • यमदूतने पहले लाये हुएको उसके घर पहुँचा दिया और दूसरेको साथ लाकर यमराजको इसकी सूचना दी । यमराजने उसकी भी पूजा करके उसे विदा किया और उसे पूर्वोक्त सारा उपदेश दिया । वहाँसे लौटनेपर शर्यातिने यमराजके बताए अनुसार सारा कार्य किया ( अनु० ६८ । २४-२६ ) ।

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