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शान्तनु

  • महाराज प्रतीपके द्वितीय पुत्र । देवापिके अग्रज तथा वाह्लीकके अग्रज । इनकी माताका नाम सुनन्दा था ( आदि० ६४ । ६९; आदि० ९५ । ४४ ) ।
  • इनके बड़े भाई देवापिके बाल्यावस्थामें ही राज्य छोड़कर वन चले जानेके कारण ये ही राजा हुए ( आदि० ९५ । ४५ ) ।
  • ये जिसे अपने दोनों हाथोंसे छू देते, वह सुख-शान्तिका अनुभव करता और बूढ़ेसे जवान हो जाता था; इसीलिये इनका नाम शान्तनु हुआ ( आदि० ९५ । ४६ ) ।
  • ये पूर्वजन्ममें राजा महाभिष थे । इनके स्वर्गसे मर्त्यलोकमें आनेका इतिहास ( आदि० ९६ । १-९ ) ।
  • गङ्गाको पत्नी रूपमें स्वीकार करनेके लिये इनको पिताका आदेश ( आदि० ९७ । २१-२२ ) ।
  • गङ्गाके अनुरूप रूपसे आकृष्ट हो उनसे अपनी पत्नी होनेके लिये इनकी याचना ( आदि० ९७ । ३१-३२ ) ।
  • गङ्गाके साथ इनके विवाहकी शर्त ( आदि० ९८ । ३ ) ।
  • इनके द्वारा गङ्गाको फटकार ( आदि० ९८ । १६ ) ।
  • इनको वसिष्ठद्वारा वसुओंको प्राप्त हुए शापका वृत्तान्त बतलाकर गङ्गाका अन्तर्धान होना ( आदि० ९९ । ५-४६ ) ।
  • इनका सम्राट् पदपर अभिषेक ( आदि० १०० । ७ ) ।
  • इनके राज्यकी विशेषता ( आदि० १०० । ८-२० ) ।
  • गङ्गाजीका इनको बालक भीष्मका परिचय देना ( आदि० १०० । ३३ ) ।
  • सत्यवतीके रूपसे मोहित होकर उसकी प्राप्तिके लिये निषादराजसे इनको याचना ( आदि० १०० । ५०-५१ ) ।
  • सत्यवतीके पुत्रको ही सम्राट् पदपर अभिषेक करनेके लिये निषादराजका इनके प्रति प्रस्ताव ( आदि० १०० । ५४-५६ ) ।
  • इनका निषादके प्रस्तावको अस्वीकार करना ( आदि० १०० । ५७-५८ ) ।
  • इनका इकलौते पुत्रकी नतिके समान वशंजके संततिकी महिमाका वर्णन करना ( आदि० १०० । ६६-७० ) ।
  • इनकी वंशोच्छेदकी चिन्ता ( आदि० १०० । ७०-७१ ) ।
  • इनको भीष्मद्वारा सत्यवतीका समर्पण ( आदि० १०० । ७२ ) ।
  • इनके द्वारा भीष्मको स्वच्छन्द-मृत्युका वरदान ( आदि० १०० । १०२ ) ।
  • सत्यवतीके साथ इनका विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १०१ । १ ) ।
  • इनके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे चित्राङ्गद एवं विचित्रवीर्यका जन्म ( आदि० १०१ । २३ ) ।
  • इनका स्वर्गवास ( आदि० १०१ । २४ ) ।
  • इनका अपने जीवनकालमें वनमें अनाथकी तरह पड़े हुए बालक कृप एवं कृपीको घर लाकर उनका पालन-पोषण एवं समस्त संस्कार कराना ( आदि० १२९ । १८ ) ।
  • ये यमसभा में रहकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । २५ ) ।
  • ये आर्चिकपर्वतपर तपस्या करके नित्यधामको प्राप्त हुए थे ( वन० १२५ । १९ ) ।
  • इन्होंने भीष्मसे पिण्ड लेनेके लिये अपना हाथ बढ़ाया था ( अनु० ८४ । १५ ) ।
  • ये सायंप्रातः स्मरण करने योग्य राजाओंमें गिने गये हैं ( अनु० १६५ । ५८ ) ।

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