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शाल्व

  • (१) शाल्व—एक क्षत्रियनरेश, जो वृषपर्वके छोटे भाई अविक्षित्के पुत्र । इनके अन्य सात भाइयोंके नाम हैं— परीक्षित्, आदिराज, विराज, शबलाश्व, उच्चैःश्रवा, भङ्कार और जितारि ( आदि० ५४ । ५२-५३ ) ।
  • (२) काशिराजकी पुत्री अम्बाके स्वयंवरमें भीष्मद्वारा इसकी पराजय ( आदि० १०२ । ३४—४१ ) ।
  • यह सौभ नामक विमानका अधिपति था और अम्बाने मनही-मन इसे अपना पति चुन लिया था ( आदि० १०२ । ५१-६२ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १७८ । ८ ) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें भी नाम आया था ( सभा० ३४ । ४ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा इसके मारे जानेकी कथा ( वन० १२ । ३२ ) ।
  • इसके वधकी संक्षिप्त कथा ( वन० १४ अध्याय ) ।
  • इसका द्वारकापर आक्रमण; साम्ब, प्रद्युम्न आदिके साथ युद्ध तथा श्रीकृष्णद्वारा वध होनेकी विस्तृत कथा ( वन० अध्याय १५ से २२ तक ) ।
  • भीष्मसे आज्ञा लेकर आयी हुई अम्बाका इसके द्वारा परित्याग ( उद्योग० १७५ । २४ ) ।
  • (३) व्युपिताश्वपत्नी भद्राने अपने मृत पतिके शवके साथ शयन करके तीन 'शाल्व' और चार 'मद्र' उत्पन्न किये थे ( यहाँ 'शाल्व' और 'मद्र' का अर्थ है उन-उन देशोंके शासक ) ( आदि० १२० । ३२—३६ ) ।
  • शाल्वदेशके लोग जरासंधके डरसे दक्षिण दिशाको भाग गये थे ( सभा० १४ । २६ ) ।
  • प्राचीनकालमें शाल्वदेशपर द्युमत्सेन नामक एक धर्मात्मा क्षत्रिय नरेश शासन करते थे ( जिनके पुत्र सत्यवान्का सावित्रीके साथ विवाह हुआ था ) ( वन० २९४ । ४ ) ।
  • कौरवसेनाके संरक्षकोंमें शाल्वदेशके योद्धाओंका भी नाम आया है ( उद्योग० १६० । १०२-१०३ ) ।
  • शाल्व एक भारतीय जनपद है ( भीष्म० ९ । ३९ ) ।
  • शाल्व योद्धाओंने अर्जुनपर आक्रमण किया था ( भीष्म० ११० । ३४-३५ ) ।
  • पाण्डवपक्षीय शाल्वदेशीय योद्धाओंने द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया था ( द्रोण० १५४ । १०-११ ) ।
  • शाल्व आदि देशोंके बड़भागी मनुष्य सनातन धर्मको जानते हैं ( कर्ण० ४५ । १४-१५ ) ।
  • (४) पाण्डवपक्षका एक योद्धा, जिसे कौरवपक्षीय भीमरथने मारा था ( यह भीमरथ धृतराष्ट्रपुत्रसे भिन्न था ) ( द्रोण० १५५ । २३ ) ।
  • (५) एक म्लेच्छ-गणोंका राजा, जिसने पाण्डवोंकी विशाल सेनाका सामना करनेके लिये उसपर आक्रमण किया था ( शल्य० २० । १ ) ।
  • इसका हाथी पर्वतके समान विशालकाय, मदकी धारा बहानेवाला, मदोन्मत्त तथा ऐरावतके समान शक्तिशाली था । वह महाभद्र नामक गजराजके कुलमें उत्पन्न हुआ था । धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने सदा ही उसका आदर किया था । गजशास्त्रके ज्ञाता पुरुषोंसे उसे अच्छी तरह सजाया था । वह युद्धके अवसरोंपर सदा ही सवारीके उपयोगमें लाया जाता था ( शल्य० २० । २-३ ) ।
  • उस हाथीपर आरूढ़ हुए राजा शाल्वका पाण्डवोंपर आक्रमण और अपने पराक्रमसे पाण्डवसेनाको खदेड़ना । इसके हाथीका धृष्टद्युम्नपर आक्रमण करके उनके रथको घोड़ों और सारथिसहित कुचल डालना तथा धृष्टद्युम्नद्वारा उस गजराजका वध और सात्यकिद्वारा शाल्वके सिरका उच्छेद ( भीष्म० ४१ । १५-२६ ) ।

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