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शिखण्डी

  • राजा द्रुपदका पुत्र, जो पहले शिखण्डिनी नामवाली कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर पीछे पुरुषरूपमें परिणत हो गया था । स्थूणाकर्ण नामक यक्षने इसका लिंग बदलकर इसको पुरुष बना दिया था ( आदि० ६३ । १२५ ) ।
  • यह राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । १२६ ) ।
  • उपप्लव्य नगरमें अभिमन्युके विवाहोत्सवमें सम्मिलित हुआ था ( विराट० ७२ । १० ) ।
  • इसने उद्दूकको दुर्योधनके संदेशका उत्तर दिया था ( उद्योग०
  • १६३ । ४३-४५ ) ।
  • इसका द्रुपदके यहाँ उनकी मनस्विनी रानीके गर्भसे पुत्रीरूपमें जन्म । माता-पिता द्वारा इसके पुत्रीभावको छिपाकर पुत्र होनेकी घोषणा तथा इसके पुत्रोचित संस्कारोंका सम्पादन ( उद्योग० १८८ । १-१९ ) ।
  • इसे लेखन और शिल्पकलाकी शिक्षाका प्राप्त होना । माता-पिताका परस्पर सलाह करके इसका दशार्णराजकी कन्याके साथ विवाह कर देना ( उद्योग० १८९ । १-१३ ) ।
  • दशार्णराजकी कन्याका शिखण्डीके स्त्रीत्वका पता लगनेपर अपनी धायों और सखियोंको इसकी सूचना देना और धायोंका दशार्णराजतक यह समाचार पहुँचाना । दशार्णराजका कुपित होना । शिखण्डीका राजकुलमें पुरुषोंकी भाँति घूमना-फिरना तथा दशार्णराजका दूत भेजकर कन्याको पुत्र बताकर धोखा देनेके अपराधमें द्रुपदको जड़मूलसहित उखाड़ फेंकनेकी धमकी देना ( उद्योग० १८९ । १३-२३ ) ।
  • हिरण्यवर्माके भयसे घबराये हुए द्रुपदका अपनी महारानीसे संकटसे बचनेका उपाय पूछना । द्रुपदपत्नीका कन्याको पुत्र घोषित करनेका उद्देश्य बताना । राजाके द्वारा नगरकी रक्षाका व्यवस्था और देवार्चन । शिखण्डीका कन्या प्राण त्याग देनेकी इच्छासे वनमें जाना, स्थूणाकर्ण यक्षके भवनमें तपस्या करना । यक्षका इसे वर माँगनेके लिये प्रेरित करना तथा शिखण्डिनीका अपने माता-पितापर आये हुए संकटके निवारणके लिये पुरुषरूपमें परिणत हो जानेके लिये इच्छा प्रकट करना ( उद्योग० १९१ अध्याय ) ।
  • स्थूणाकर्णका पुनः लौटानेकी शर्तपर कुछ कालके लिये इसे अपना पुरुषत्व प्रदान करना । शिखण्डीका नगरमें आकर पिता तथा राजा हिरण्यवर्माको अपने पुरुषत्वका विश्वास दिलाकर संतुष्ट करना ( उद्योग० १९२ । १-३२ ) ।
  • शिखण्डीका पुरुषत्व लौटानेके लिये यक्षके पास जाना और यक्षका अपनेको स्त्रीरूपमें ही रहनेका शाप प्राप्त हुआ बताकर इसे लौटा देना ( उद्योग० १९२ । ३३-५० ) ।
  • द्रोणाचार्यसे अस्त्र-शिक्षाकी प्राप्ति ( उद्योग० १९३ । ४०-४१ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें अश्वत्थामाके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ७५ । ४६-४८ ) ।
  • द्रोणाचार्यके भयसे इसका युद्धसे हट जाना ( भीष्म० ६९ । ३१ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध और उनसे पराजित होना ( भीष्म० ८२ । २६-३८ ) ।
  • शल्यके अस्त्रको दिव्यबाणद्वारा विदीर्ण करना ( भीष्म० ८५ । २९-३० ) ।
  • भीष्मको उत्तर देना और उनको मारनेके लिये प्रयत्न करना ( भीष्म० १०८ । ४५-५० ) ।
  • अर्जुनके प्रोत्साहनसे इसका भीष्मपर आक्रमण ( भीष्म० ११० । १-३ ) ।
  • भीष्मपर धावा ( भीष्म० ११४ । ४० ) ।
  • अर्जुनके प्रोत्साहनसे भीष्मपर आक्रमण ( भीष्म० ११७ । ७—) ।
  • अर्जुनसे सुरक्षित होकर भीष्मपर धावा करना ( भीष्म० ११७ । ४३ ) ।
  • भीष्मपर प्रहार ( भीष्म० ११७ । ४३—४४ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इसकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । ४५ ) ।
  • भूरिश्रवाके साथ इसका युद्ध ( द्रोण० १३ । ४५ ) ।
  • इसके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । १९—२० ) ।
  • विकर्णके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । ३६—३७ ) ।
  • बाह्लीकके साथ युद्ध ( द्रोण० २६ । ६—१० ) ।
  • कृतवर्माके साथ युद्ध और उसके द्वारा इसकी पराजय ( द्रोण० ११४ । ८२—९० ) ।
  • कृपाचार्यद्वारा पराजय ( द्रोण० १६१ । २२—३२ ) ।
  • कृतवर्माके साथ युद्धमें इसका मूर्च्छित होना ( कर्ण० ५४ । १९—२३ ) ।
  • कृपाचार्यसे पराजित होकर भागना ( कर्ण० ५५ । १०—२३ ) ।
  • कर्णद्वारा इसकी पराजय ( कर्ण० ६३ । २६—३० ) ।
  • प्रभद्रकोंकी सेना साथ लेकर इसका कृतवर्मा और महारथी कृपाचार्यके साथ युद्ध ( शल्य० १५ । ७ ) ।
  • द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको आगे बढ़नेसे रोकना ( शल्य० १६ । ६ ) ।
  • अश्वत्थामाद्वारा इसका वध ( सौप्तिक० ८ । ५ ) ।

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