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शिबि

  • ( १ ) एक दैत्य, जो हिरण्यकशिपुका पुत्र था ( आदि० ६५ । १८ ) ।
  • यह दुम नामक राजाके रूपमें पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ८ ) ।
  • ( २ ) एक प्राचीन राजर्षि, जिनको संग प्राप्त करके ययाति स्वर्गको गये थे ( आदि० ८६ । ६ ) ।
  • इनका ययातिसे अपनेको मिलनेवाले पुण्यलोकोंके विषयमें पूछना; ययातिका उत्तर पुण्यलोक देना और उनका अस्वीकार करना ( आदि० ९३ । ६—९ ) ।
  • अश्वक आदि राजर्षियोंके साथ इनका स्वर्गलोकको गमन ( आदि० ९३ । ६ के बाद दा० पाठ ) ।
  • स्वर्गके मार्गमें अश्वकपूछनेपर ययातिद्वारा इनकी श्रेष्ठता तथा इनके दानकी महिमाका वर्णन ( आदि० ९३ । १८—१९ ) ।
  • ये यमसभाके सभासद होकर, यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १० ) ।
  • नारदजीद्वारा सुहोत्रके आगे रोकेपर इनकी श्रेष्ठताका वर्णन ( वन० ११५ । ५ ) ।
  • इनकी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये देवताओंकी मन्त्रणा ( वन० ११७ । १ ) ।
  • इनकी शरणागतरक्षाके विषयमें बाजधारी इन्द्रसे वार्ता ( वन० ११७ । ११—१२ ) ।
  • इनका अपने शरीरका मांस काटकर बाजके लिये तराजूके पलड़ेपर रखना और पूरा न पड़नेपर स्वयं भी उसपर चढ़ जाना ( वन० १९७ । २१—२३ ) ।
  • कपोतरूपधारी अग्निद्वारा इन्हें वर-प्रदान ( वन० १९७ । २४—२६ ) ।
  • देवर्षि नारदद्वारा इनकी महत्ताका प्रतिपादन । ब्राह्मणके लिये इनके द्वारा अपने पुत्रके वधका वृत्तान्त ( वन० १९८ अध्याय ) ।
  • विराटनगरमें गोहरणके समय कृपाचार्य और अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये इन्द्रके साथ विमानपर बैठकर आये थे ( विराट० ५६ । ९—१० ) ।
  • ये ययातिकी पुत्री माधवीके गर्भसे उशीनरनरेशद्वारा उत्पन्न हुए थे ( उद्योग० ११६ । १९—२० ) ।
  • इनका ययातिको अपना पुण्यफल देना ( उद्योग० १२२ । ८—११ ) ।
  • इन्हें भारतवर्ष बहुत ही प्रिय रहा है ( भीष्म० ९ । ७—९ ) ।
  • संजयको समझाते समय नारदजीद्वारा इनके यश और दानकी महत्ताका वर्णन ( द्रोण० ५८ अध्याय ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा नारद-संजय-संवादके उल्लेखपूर्वक इनके दान- धर्मका वर्णन ( शान्ति० २९ । ३९—४४ ) ।
  • यदुवंशियों- से इन्हें खड्गकी प्राप्ति ( शान्ति० १६६ । ८० ) ।
  • इनका ब्राह्मणके लिये अपने औरस पुत्रका दान तथा उनसे इन्हें स्वर्गकी प्राप्ति ( शान्ति० २३४ । ११२; अनु० १३७ । ४ ) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शपथ खाना ( अनु० १४५ । २६ ) ।
  • इनके द्वारा मांसभक्षण-निषेध ( अनु० १९५ । ६ ) ।
  • ( ३ ) एक देश तथा वहाँके निवासी । महाराज शान्तनुकी माता सुनन्दा यहींकी राजकुमारी थीं ( आदि० ९५ । ४४ ) ।
  • युधिष्ठिरके श्वसुर गोवासन यहींके राजा थे ( आदि० ९५ । ७६ ) ।
  • इस देशको पश्चिम-दिग्विजयके अवसरपर नकुलने जीता था ( सभा० ३२ । १० ) ।
  • यहाँके निवासी राजा युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें भेंट लेकर आये थे ( सभा० ५२ । १४ ) ।
  • इस देशके राजा उशीनर थे ( वन० १२९ । २९ ) ।
  • यह देश किसी समय जयद्रथके अधिकारमें था ( वन० २६७ । ११ ) ।
  • अर्जुनने जयद्रथके साथ आए हुए शिबिदेशके सैनिकोंका संहार कर डाला ( वन० २७१ । २८ ) ।
  • इस देशके महारथी अपनी सेना तथा दुर्योधनकी सहायतामें थे ( उद्योग० १९५ । ७-८ ) ।
  • शिबिदेशको कभी कर्णने जीता था ( द्रोण० ९ । ३८-४० ) ।
  • इस देशके लोग पहले कम समझवाले होते थे ( कर्ण० ४५ । ३४-३५ ) ।
  • ( ५ ) उशीनर देश या कुलमें उत्पन्न एक राजा, जो द्रौपदीके स्वयंवरमें आया था ( आदि० १८४ । १६ ) ।
  • यह पाण्डवपक्षका एक योद्धा था और द्रोणाचार्यके साथ लड़ा था ( द्रोण० ८ । २५ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इसका वध ( द्रोण० १९५ । १९ ) ।
  • ( ६ ) भूतपूर्व पाँच इन्द्रोंमेंसे एक, जो पर्वतकी कन्दरामें अवरुद्ध थे; इन सबको मानवलोकमें जन्म लेनेके लिये भगवान् शिवका आदेश ( आदि० १९६ । १९-२० ) ।

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