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शिव

  • ( १ ) सच्चिदानन्दघन परमात्मा, जो 'ईशान' कहे गये हैं । ये ही त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं ( आदि० १२२ । १ ) ।
  • ब्राह्मकल्पके आदिमें जो महान् दिव्य अण्ड प्रकट हुआ था, जिसमें सत्यस्वरूप, ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्म अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हुआ है, उससे ब्रह्मा तथा स्थाणु नामवाले शिवका भी प्रादुर्भाव हुआ है ( आदि० १२२ । ३०-३२ ) ।
  • इन्होंने ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे त्रिलोकीकी रक्षाके लिये कालकूट नामक विषको कण्ठमें धारण कर लिया, तभीसे ये कण्ठमें नीलचिह्नके कारण 'नीलकण्ठ' कहलाने लगे ( आदि० १२८ । ४१-४३ ) ।
  • स्थाणु नामसे ही परम तेजस्वी ग्यारह रुद्रोंके ये पिता हैं ( आदि० २११ । १ ) ।
  • अश्वत्थामा इनके अंशसे उत्पन्न हुआ था ( द्रोण० १७२ । ७२-७३ ) ।
  • इन्होंने ब्रह्माजीको ही पुत्र होनेका वरदान दिया था ( आदि० १०५ । १० ) ।
  • इन्होंने एक तपस्विनी ऋषिकन्याको पाँच पति प्राप्त होनेका वर दिया था, जो दूसरे जन्ममें द्रौपदी हुई थी ( आदि० १९८ । ६-१५ ) ।
  • इनके द्वारा पाँच इन्द्रोंका हिमालयकी गुफामें अवरोध और उन्हें मनुष्यलोकमें पाण्डवोंके रूपमें जन्म लेनेका आदेश ( आदि० १९६ । १६-२० ) ।
  • तिलोत्तमाके रूपको देखनेके लिये इनके चतुर्मुख होनेकी इच्छा ( आदि० २१० । २२-२८ ) ।
  • इनके द्वारा प्रमथगणको उसके कुलमें एक-एक संतान होनेका वरदान ( आदि० २१४ । २०-२१ ) ।
  • वारह वर्षोंतक निरन्तर अग्निमें आहुति देनेके लिये इनका श्वेतकिको आदेश ( आदि० २२२ । ४१-४८ ) ।
  • इनकी ब्राह्मणसे यज्ञ करानेके लिये राजा श्वेतकिको सामग्री जुटानेकी आज्ञा ( आदि० २२२ । ५१-५३ ) ।
  • उनके यज्ञका संपादन करनेके लिये इनका दुर्वासाको आदेश ( आदि० २२२ । ५७-५८ ) ।
  • एक हजार युग बीतनेपर बिन्दुसरपर यक्ष करते हैं ( सभा० ३ । १५ ) ।
  • ये पार्वतीदेवी तथा अपने गणोंके साथ कुबेरकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० १० । २१-२४ ) ।
  • जरासंधने उग्र तपस्याके द्वारा इनकी आराधना करके एक विशेष प्रकारकी शक्ति प्राप्त कर ली थी; इसीसे सब राजा उनमें परस्त हो गये थे ( सभा० १४ । ६४-६५ ) ।
  • बाणासुरको इनका वरदान । इनके द्वारा बाणासुरकी राजधानीकी रक्षा तथा बाणासुरके लिये इनका श्रीकृष्णके साथ भयानक युद्ध ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८२१-८२३ ) ।
  • ये भगवान् श्रीहरिके ललाटसे प्रकट हुए थे ( वन० १२ । ४० ) ।
  • अर्जुनकी उग्र तपस्याके विषयमें महर्षिका शिवगणोंके महर्षियोंके साथ वार्तालाप और इनका उन्हें आह्वान देकर विदा करना ( वन० ३८ । २८-३५ ) ।
  • इनका किरातवेष धारण करके धनुषबाण ले नाना वेषधारी भूतों, सहस्रों स्त्रियों और भगवती उमाके साथ वनमें अर्जुनके समीप जाना और उन्हें मारनेकी घातमें लगे हुए मूक नामक वराहस्वरूपधारी दानवको अर्जुनके साथ ही बाण मारना । फिर अर्जुनके बाण इनका विवाद और युद्ध । इनपर अर्जुनके बाणोंका विफल होना । इनके साथ उनका मल्लयुद्ध । पराजित हुए अर्जुनका भगवान् शिवकी शरणमें जाकर इनकी पार्थिवमूर्त्तिका पूजन करना और अपनी चढ़ायी हुई मालाको इनके सिरपर विद्यमान देख इन्हें पशुपतास्त्र देनेके लिये चरणोंमें पड़ जाना । भगवान् शिवका संतुष्ट होकर उन्हें पाशुपतास्त्र देनेके लिये कहना । अर्जुनद्वारा इनका स्तवन । इनका अर्जुनको हृदयसे लगाना और उन्हें वरदान देकर पाशुपतास्त्रके धारण और प्रयोगका नियम बताते हुए उन्हें उस अस्त्रका उपदेश देना । उस प्रज्वलित अस्त्रका अर्जुनके पार्श्वभागमें स्थित दिखायी देना । इनके स्पर्शसे अर्जुनके अशुभका नष्ट होना तथा अर्जुनको स्वर्गलोकमें जानेकी आज्ञा दे उन्हें उनके अस्त्र गाण्डीव आदिको लौटाकर समाहित भगवान् शिवका आकाशमार्गसे प्रस्थान ( वन० अध्याय ३९ से ४० तक ) ।
  • इनका मयूरक मुनिका नृत्य रोकनेके लिये अपनी अँगुलियोंसे भस्म प्रकट करना ( वन० ८३ । ११७—१२५ ) ।
  • इनके द्वारा मण्डूकको वरदान ( वन० ८३ । १३२—१३४ ) ।
  • इनके द्वारा राजा सगर-को संतान-प्राप्तिके लिये वरदान ( वन० १०६ । १५—१६ ) ।
  • इनका राजा भगीरथको वर देना ( वन० १०७ । १-२ ) ।
  • गङ्गाको सिरपर धारण करना ( वन० १०७ । ९ ) ।
  • इनके वीर्यसे मिञ्जिका मिञ्जिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति ( वन० २३१ । १० ) ।
  • इनकी भद्रवट यात्रा ( वन० २३१ । ३८—५४ ) ।
  • देवासुरसंग्राममें महिषासुरके वधके लिये इनका स्कन्दको याद करना ( वन० २३१ । ९० ) ।
  • इनके द्वारा जयद्रथको वरदान ( वन० २०२ । २८ ) ।
  • इनके द्वारा नरसखा नारायणकी महिमाका वर्णन ( वन० २०२ । ३१—७७ ) ।
  • इनका भीष्मके वधके लिये अम्बाको वरदान देना ( उद्योग० १८८ । १२—१५ ) ।
  • इनका द्रुपदको एक कन्या उत्पन्न होनेका वर देना ( उद्योग० १८८ । ४—५ ) ।
  • भगवान् शिव मेरु पर्वतपर उमाके साथ रहते हैं । ये एक लाख वर्षोंतक गङ्गाजीको अपने सिरपर ही धारण किये रहे ( भीष्म० ६ । २५—३१ ) ।
  • शाकद्वीपमें इनकी आराधना की जाती है ( भीष्म० ११ । २८ ) ।
  • कुपित ब्रह्माको शान्त करनेके लिये इनका उनके पास जाना ( द्रोण० ५२ । ४३ ) ।
  • क्रोध शान्त करनेके लिये ब्रह्मासे इनकी प्रार्थना और इन दोनोंका परस्पर वार्तालाप ( द्रोण० ५३ । १—१४ ) ।
  • पुण्यजनोँद्वारा पृथ्वी-दोहनके समय ये बछड़ा बने थे ( द्रोण० ६९ । २४ ) ।
  • इनका नर-नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण और अर्जुनका स्वागत करना और उनको अभीष्ट वर देनेको कहना ( अर्जुनका स्वप्न ) ( द्रोण० ८० । ५१—५२ ) ।
  • अर्जुनको पाशु-पतास्त्रका दान ( अर्जुनका स्वप्न ) ( द्रोण० ८१ । २१—२२ ) ।
  • ब्रह्मासहित देवताओंकी प्रार्थनापर प्रसन्न होकर इन्द्रको कवच प्रदान करना ( द्रोण० ९४ । ६१—६३ ) ।
  • सोमदत्तको पुत्र होनेका वर देना और अपनेको श्रीकृष्णसे मित्र बताना ( द्रोण० १४४ । १६—१८ ) ।
  • नारायण द्वारा भगवान् शिवकी आराधना, स्तुति और इनसे वर-प्राप्तिकी कथा ( द्रोण० २०१ । ५६—९६ ) ।
  • व्यास-जीका अर्जुनको भगवान् शिवकी महिमा बताना और त्रिपुर-वधके समय उनके रथ आदि सामग्रीका उल्लेख करना ( द्रोण० २०२ अध्याय ) ।
  • त्रिपुरोंसे भयभीत देवताओंको अभयदान देना ( कर्ण० ३३ । ६३ ) ।
  • देवताओंका आधा बल लेकर त्रिपुरवधके लिये उद्यत होना ( कर्ण० ३४ । १४ ) ।
  • इनके विचित्र रथ आदिका वर्णन ( कर्ण० ३४ । १६—५० ) ।
  • इनके द्वारा वृषभके खुरोंका चीरा जाना और घोड़ोंका स्तन काटना ( कर्ण० ३४ । १०५ ) ।
  • इनके द्वारा त्रिपुरोंका वध ( कर्ण० ३४ । ११४ ) ।
  • इनका परशुरामको वरदान देना ( कर्ण० ३४ । १४६—१४७ ) ।
  • कर्ण और अर्जुनके द्वैरथ युद्धमें स्कन्दके पूछनेपर अर्जुनकी विजय बतलाना ( कर्ण० ८० । ६२—६५ ) ।
  • मण्डूक मुनिपर कृपा ( शल्य० ३८ । ५२—५८ ) ।
  • स्कन्दको पार्षदरूपमें एक महान् असुर प्रदान करना ( शल्य० ४५ । २६ ) ।
  • स्कन्दको पताका और असुर सेना देना ( शल्य० ४६ । ४६—४८ ) ।
  • अश्वत्थामाकी परीक्षा लेना और उन्हें वर देना ( शल्य० ४८ । ३८—४८ ) ।
  • रातमें आक्रमण करते हुए अश्वत्थामाके अस्त्रोंको निगल जाना ( सौप्तिक० ६ । ११—१७ ) ।
  • अश्वत्थामाके आत्मसमर्पणसे प्रसन्न होकर उसके शरीरमें प्रवेश करना और उसे एक खड्ग प्रदान करना ( सौप्तिक० ७ । ६६ ) ।
  • इनका कुपित होकर अपने लिङ्गको काट डालना ( सौप्तिक० १० । २१ ) ।
  • इनके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत्की दुरवस्था ( सौप्तिक० १८ । ४—१९ ) ।
  • इनकी कृपासे सबका स्वस्थ होना ( सौप्तिक० १८ । २०—२३ ) ।
  • ये गजासुरके चर्मको वस्त्रकी भाँति धारण करते हैं । सर्वस्व-समर्पण नामक यज्ञमें अपने-आपको भी होमकर देवताओंके भी देवता हो गये हैं ( शान्ति० २० । १२ ) ।
  • परशु-रामजीने इनसे अनेक प्रकारके अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी कुठार प्राप्त किये थे ( शान्ति० ४९ । ३३ ) ।
  • इन्होंने ब्रह्मर्षिसे दण्डनीति-शास्त्रको सबसे पहले स्वयं ही ग्रहण करके शक्तिसे इन्द्रने उसको ग्रहण किया था ( शान्ति० ५९ । ६०—६२ ) ।
  • एक मरे हुए ब्राह्मण-बालकको जीवन तथा गीध एवं गीदड़ोंको भी भूख मिटने-का वर देना ( शान्ति० १५३ । ११४—११५ ) ।
  • ब्रह्मासे खड्ग प्राप्त करके दानवोंको परास्त करना ( शान्ति० १६६ । ५४—६३ ) ।
  • फिर भगवान् शिवका उसे भगवान् विष्णुके हाथमें देना ( शान्ति० १६६ । ६६ ) ।
  • कुपित हुए ब्रह्माजीके क्रोधको शान्त करना ( शान्ति० २८३ । १—६ ) ।
  • इन्द्रको वृत्रासुरके लिये इनको प्रोत्साहन और अपने अंशसे उनमें प्रवेश करना ( शान्ति० २८३ । ३४—३८ ) ।
  • दक्ष-यज्ञके विषयमें पार्वतीजीसे वार्तालाप और दक्ष-यज्ञका नाश ( शान्ति० २८४ । ३३—४४ ) ।
  • पार्वतीको सान्त्वना देना ( शान्ति० २८४ । २४—२८ ) ।
  • अपने शरीरसे वीरभद्रको प्रकट करना ( शान्ति० २८४ । २९ ) ।
  • दक्षके शरणागत होनेपर हवनकुण्डसे प्रकट हो उनपर कृपा करना ( शान्ति० २८४ । ५८—६० ) ।
  • सहस्र-नामद्वारा दक्षके स्तुति करनेपर उनको वरदान देकर अन्तर्धान होना ( शान्ति० २८४ । १८२—१९१ ) ।
  • उशनापर इनका कोप करना और उन्हें शिरदनद्वारसे बाहर निकालना ( शान्ति० २८१ । १४–३४ ) ।
  • शुक्राचार्यको अभयदान देना ( शान्ति० २८१ । ३६ ) ।
  • आसुरभावको नष्ट करना ( शान्ति० २८१ । १६–१७ ) ।
  • व्यासजीको पुत्र-प्राप्तिके लिये वर देना ( शान्ति० ३३३ । २०–२१ ) ।
  • व्यासपुत्र शुकदेवका उपनयन-संस्कार करना ( शान्ति० ३३४ । १९ ) ।
  • पुत्रशोकमें व्याकुल व्यासजीको समझाना ( शान्ति० ३३३ । ३४–३८ ) ।
  • नारायणके साथ युद्ध करना ( शान्ति० ३५० । ११८ ) ।
  • वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मासे परममुक्तके विषयमें इनका प्रश्न ( शान्ति० ३५० । २३–२५ ) ।
  • इनके माहात्म्यका विशेष वर्णन ( अनु० १४ । १४–१७ ) ।
  • तण्ड मुनिको वर प्रदान करना ( अनु० १६ । १६–१७ ) ।
  • इनके सहस्रनामका वर्णन ( अनु० १७ अध्याय ) ।
  • दक्षने इनको एक वृषभ प्रदान किया, जो इनका वाहन और ध्वज हुआ ( अनु० ७७ । २०–२८ ) ।
  • वरुणरूपसे इनके यज्ञका वर्णन ( अनु० ८५ । ८८–९६ ) ।
  • इनके धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन ( अनु० १३३ अध्याय ) ।
  • तीसरा नेत्र प्रकट करके हिमालयको दग्ध करके पुनः उसे प्रकृतिस्थ करना ( अनु० १४० । ४३–४८ ) ।
  • पार्वतीजीके साथ संवाद ( अनु० १४१ । ४२ के बादसे अनु० १४५ अध्यायतक ) ।
  • पार्वतीसे स्त्री-धर्मका वर्णन करनेके लिये कहना ( अनु० १४६ । २–१२ ) ।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्णकी वंशपरम्परा तथा माहात्म्यका कथन ( अनु० १४७ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा दक्ष-यज्ञ-विध्वंस ( अनु० १५० । ११–२४ ) ।
  • इनका त्रिपुरोंको दग्ध करना ( अनु० १६० । २६–३१ ) ।
  • पाँच शिखावाले बालकका रूप धारण करके इनका पार्वतीकी गोदमें आना ( अनु० १६० । ३३ ) ।
  • ये मुञ्जवान् नामक पर्वतपर सदा तपस्या करते हैं ( आश्व० ८ । १ ) ।
  • इनकी नाममयी स्तुति ( आश्व० ८ । १९–२२ ) ।
  • (२) एक अग्नि, जो शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं । ये समस्त दुःखातुर मनुष्योंका शिव ( कल्याण ) करते हैं; इसीसे इन्हें शिव कहते हैं ( वन० २२१ । २ ) ।

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