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शुक

  • (१) शर्यातिवंशज पृषत्के पुत्र, जो अपने पराक्रमसे शत्रुओको संतत करनेवाले थे । इन्होंने सारी पृथ्वीको जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया था और अश्वमेध जैसे सौ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, देवता तथा पितरोंकी आराधना की थी । तदनन्तर राज्य त्यागकर ये शतशृङ्ग पर्वतपर आ गये और शाक एवं फल-मूलका आहार करते हुए तपस्या करने लगे । इन्होंने ही श्रेष्ठ उपकरणों तथा शिक्षाके द्वारा पाण्डवोंकी योग्यता बढ़ायी, इनके कृपाप्रसादसे सभी पाण्डव धनुर्वेदमें पारंगत हो गये थे । इन्होंने अर्जुनको नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये थे ( आदि० १२३ । ३१ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ३६९ ) ।
  • (२) रावणका मन्त्री; जो वानरका रूप धारण करके श्रीरामकी सेनामें आनेपर विभीषणद्वारा बंदी बना लिया गया था ( वन० २८१ । ५२ ) ।
  • राक्षसस्वरूपमें प्रकट होकर श्रीरामने अपनी सेनाका दर्शन कराकर इसे मुक्त कर दिया था ( वन० २८३ । ५३ ) ।
  • (३) गांधारराज सुबलका एक पुत्र; शकुनिका भाई, इरावान्का मामा ( भीष्म० ९० । २६-३२ ) ।

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