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शुकदेव

  • व्यासजीके पुत्र तथा शिष्य । व्यासजीने पहले इन्हींको महाभारत ग्रन्थका अध्ययन कराया था ( आदि० १ । १०४ ) ।
  • शुकदेवजीने गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षसोंको चौदह लाख श्लोकोंसे युक्त महाभारतकी कथा सुनायी थी ( आदि० १ । १०५-१०८; स्वर्गा० ५ । ५५-५६ ) ।
  • इन्होंने सम्पूर्ण वेदों तथा महाभारतकी भी इन्हें शिक्षा दी थी ( आदि० ६३ । ८४ ) ।
  • ये युधिष्ठिरकी सभामें विराजमान होते थे ( सभा० ४ । ११ ) ।
  • धर्मपालनसे ही इनका हृदय शुद्ध हुआ है ( वन० ३१ । १२ ) ।
  • व्यासजीसे इनके अनेक प्रश्न ( शांति० २३१ । १९ ) ।
  • शुकदेवजीके प्रश्नके अनुसार व्यासजीके द्वारा ज्ञानके साधन और उसकी महिमा; योगसे परमात्माकी प्राप्ति, कर्म और ज्ञानके अन्तर; ब्रह्मप्राप्तिके उपाय; ब्रह्मचर्य-आश्रम, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम, संन्यासके आचरण; परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनके उपाय; ज्ञानोपदेशक पात्रके निर्णय; महाभूतादि तत्त्वोंके विवेचन, बुद्धिकी श्रेष्ठता; प्रकृति-पुरुष-विवेक; ज्ञानके साधन, ज्ञानीके लक्षण, परमात्म-प्राप्तिके साधन; संसारनदी, ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति, ब्रह्मवेत्ताके लक्षण, शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान, परमात्म-साक्षात्कारके प्रकार; कामवृक्ष, उसे काटकर मोक्षप्राप्ति, शरीरनगर तथा पञ्चभूत, मन और बुद्धिके गुण आदिका वर्णन ( शांति० २३१ । २ से २५५ अध्यायतक ) ।

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