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शुकाचार्य

  • महर्षि भृगुके पुत्र, जो असुरोंके उपाध्याय थे, इनका दूसरा नाम उशना था । इनके चार पुत्र हुए, जो दैत्योंके पुरोहित थे ( आदि० ६५ । ३६ ) ( कहीं-कहीं इन्हें भृगुका पौत्र भी कहा गया है ) ।
  • ये महर्षि भृगुके पौत्र और कचके पुत्र थे । ये ही ग्रह होकर तीनों लोकोंके जीवनकी रक्षाके लिये वृद्धि, अना-वृष्टि, भय एवं अभय उत्पन्न करते हैं । ब्रह्माजीकी प्रेरणासे समस्त लोकोंका चक्कर लगाते रहते हैं । महा-बुद्धिमान् शुक ही घोराके आचार्य तथा दैत्योंके गुरु हुए । ये ही बृहस्पतिसे लम्बे समयसे ही देवलोकमें भी गुरु हुए ( आदि० ६६ । ४२-४३ ) ।
  • दैत्योंके द्वारा इनका पुरोहितके पदपर वरण तथा बृहस्पतिके साथ इनकी स्पर्धा ( आदि० ६६ । ६-७ ) ।
  • इनके द्वारा मृतसंजीवनी विद्याके बलसे मरे हुए दानवोंका जीवित होना ( आदि० ७६ । ८ ) ।
  • इनकी पुत्रीका नाम देवयानी था ( आदि० ६६ । १३ ) ।
  • कचका दानव-राज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे अनेकों शिष्य-रूपसे ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना करना और इनकी सहस्र वर्षतक एक सहस्र वर्षतक ब्रह्मचर्यपालनके लिये अनुमति माँगना तथा इनकी कचको स्वागतपूर्वक ग्रहण करना ( आदि० ७६ । १०-१४ ) ।
  • इनका कचके लिये चिंतित हुई देवयानीको आश्वासन देकर संजीवनी विद्याका प्रयोग करके कचको पुकारना और उस विद्या-के बलसे कचका शरीरको विदीर्ण करके निकल आना ( आदि० ७६ । ३१-३४ ) ।
  • इनके द्वारा कचको दोबारा जीवनदान ( आदि० ७६ । ४१-४२ ) ।
  • तीसरी बार दानवोंके कचको मारकर आगमें जलाया और उनकी जली हुई लाक्षाका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया; फिर वही मदिरा उन्होंने ब्राह्मण शुक्रा-चार्यको पिला दी ( आदि० ७६ । ४३ ) ।
  • देवयानीका पुनः कचको जीवित करनेके लिये इनसे अनुरोध, शुक्राचार्यका कचको निगलनेसे चित्त होना तथा देव-यानीके प्राणत्याग करके लिये उद्यत होनेपर इनका असुरोंपर क्रोध करके संजीवनी विद्याके द्वारा कचको पुकारना, कचका अपनेको इनके उदरमें स्थित बताना और इनके पूछनेपर कचके नाम तथा पेटमें पहुँचने-का वृत्तान्त निवेदन करना । इनका कचको जीवित करनेके लिये इनसे अनुरोध । देवयानीका पिता और कच दोनोंमेंसे किसे भी नष्टसे अपनी मृत्यु बताना । इनका कचको सिद्ध बताकर उन्हें संजीवनी विद्याका उपदेश करना । कचका इनके पेटसे निकलकर विद्याके बलसे पुनः इन्हें जीवित कर देना और प्रणाम करके इन्हें अपना पिता तथा माता मानना तथा कभी भी इनसे द्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा करना ( आदि० ७६ । ४४ ) ।
  • इनका मदिरा- पानको ब्रह्महत्याके समान बतलाकर उसे ब्राह्मणोंके लिये सर्वथा निषिद्ध घोषित करना ( आदि० ७६ । ६७-६८ ) ।
  • देवयानीके प्रति इनके द्वारा अपने प्रभावका वर्णन ( आदि० ७८ । ३७-४० ) ।
  • शर्मिष्ठाद्वारा पादित हुई देवयानीको प्रसन्न करनेके लिये वृषपर्वाको समझाना तथा इनसे हुए क्रोधका वेग रोकनेवालोंमें परम श्रेष्ठ बतलाना ( आदि० ७९ । १-७ ) ।
  • अधर्मका फल अवश्य प्राप्त होता है—इसे दृष्टान्तपूर्वक वृषपर्वाको समझाना ( आदि० ८० । १-६ ) ।
  • इनके द्वारा देवयानीको प्रसन्न करनेके लिये वृषपर्वाको आदेश ( आदि० ८० । ९-१२ ) ।
  • ययातिके साथ अपने विवाहके लिये इनसे देवयानीकी प्रार्थना ( आदि० ८१ । ३० ) ।
  • ययातिसे अपनी पुत्रीको ग्रहण करनेके लिये कहना ( आदि० ८१ । ३१ ) ।
  • धर्म-लोपके भयसे भीत हुए ययातिको इनका आश्वासन देना ( आदि० ८१ । ३३ ) ।
  • देवयानीके साथ विवाह करने एवं शर्मिष्ठाके साथ यथोचित व्यवहार न करनेके लिये ययातिको इनकी आज्ञा ( आदि० ८१ । ३४-३५ ) ।
  • इनके द्वारा ययातिको जराग्रस्त होनेका शाप ( आदि० ८२ । ३१ ) ।
  • फिर उनके प्रार्थना करने- पर इनका ययातिको अपनी वृद्धावस्था दूसरेसे बदल सकनेकी सुविधा देना ( आदि० ८२ । ३९ ) ।
  • ये देव- राज इन्द्रकी सभामें विराजमान होते हैं ( सभा० ७ । २२ ) ।
  • ये ब्रह्मर्षि ब्रह्माजीकी सभामें भी उपस्थित होते हैं ( सभा० ११ । २९ ) ।
  • ये मेरु पर्वतके शिखरपर दैत्योंके साथ निवास करते हैं । सारे रत्न और रत्नमय पर्वत इन्हींके अधिकारमें हैं । भगवान् कुबेर इन्हींसे धनका चतुर्थ भाग प्राप्त करके उसे उपयोगमें लाते हैं ( भीष्म० ६ । २२-२३ ) ।
  • ये शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजीको देखनेके लिये गये थे ( शान्ति० ४७ । ८ ) ।
  • महाराज युधिष्ठिरके पूछनेपर इन्होंने इन्द्रको श्रेयःप्राप्तिके लिये प्रह्लादके पास भेजना ( शान्ति० १२४ । २० ) ।
  • ये वानप्रस्थ-धर्मका पालन करके स्वर्ग- को प्राप्त हुए हैं ( शान्ति० २४४ । १७-१८ ) ।
  • इन्द्रसे वृत्रासुरसे देवताओंद्वारा पराजित होनेपर भी दुःखी न होनेका कारण पूछना ( शान्ति० २७९ । १५ ) ।
  • सनत्कुमारजीसे वृत्रासुरको भगवान् विष्णुका माहात्म्य बतलानेके लिये कहना ( शान्ति० २८० । ५ ) ।
  • योगबल- से कुबेरके धनका अपहरण करना ( शान्ति० २८९ । ९ ) ।
  • भयके कारण सूर्यके उदरमें लीन होना ( शान्ति० २८९ । १९-२० ) ।
  • शिवजीके लिंगसे निर्गत होनेके कारण इनका शुक्र नाम पड़ना और पार्वतीजीका इन्हें अपना पुत्र स्वीकार करना ( शान्ति० २८९ । ३२- ३५ ) ।
  • इनके द्वारा महादेवजीको शाप ( शान्ति० ३४२ । २६ ) ।
  • इन्हें तण्डिसे शिवसहस्रनामका उपदेश प्राप्त हुआ था और इन्होंने गौतमको उसका उपदेश दिया ( अनु० १७ । १७७ ) ।
  • ये भृगुके सात पुत्रोंमें- से एक हैं ( अनु० ८५ । १२९ ) ।
  • बल्किके पूछनेपर इन्हें पुनर्जन्मका महत्त्व बतलाना ( अनु० २८ । १६-१४ ) ।

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