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शृङ्गवान्

  • (१) हिरण्यकवर्षका एक पर्वत, जहाँ उत्तर-दिग्विजयके समय अर्जुन गये थे और इसे लाँघकर उत्तर-कुरुवर्षमें चले गये थे ( सभा० २८ । ६ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७५० ) ।
  • इसकी गणना छः वर्षपर्वतोंमें है । यह सब धातुओंमें उत्तम एवं विचित्र शोभा धारण करनेवाला है । यहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं ( भीष्म० ६ । ५ ) ।
  • धृतराष्ट्रके प्रति संजयद्वारा इसका विशेष वर्णन ( भीष्म० ६ । ८-९ ) ।
  • सायं-प्रातःस्मरणीय पर्वतोंमें भी इसका नाम है ( अनु० १६५ । ३२ ) ।
  • ( २ ) एक प्राचीन ऋषि, जो गालवके पुत्र थे । इन्होंने शर्यातके साथ वृद्घकन्याका पाणिग्रहण किया था ( शल्य० ५२ । १७-१७ ) ।
  • एक रात इनके साथ निवास करके वृद्घकन्याके चले जानेपर ये उसके रूपका चिन्तन करते हुए अत्यन्त दुखी हो गये और शरीर त्यागकर इन्होंने भी उसीके पथका अनुसरण किया ( शल्य० ५२ । १९-२४ ) ।

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