← अनुक्रमणिका

शेषनाग

  • नागराज अनन्त, ( ये साक्षात् भगवान् नारायणके स्वरूप हैं और उनके लिये शय्यारूप होकर उन्हें धारण करते हैं ) । इनके द्वारा मन्दराचलका उखाड़ा जाना ( आदि० १८ । ८ ) ।
  • नागोंमें सर्वप्रथम ये ही प्रकट हुए थे ( आदि० ३५ । २-५ ) ।
  • नागोंके पारस्परिक द्वेषसे ऊबकर इनका पुष्कर आदि क्षेत्रोंमें तपस्या करना ( आदि० ३६ । ४-५ ) ।
  • धर्ममें अटल निष्ठा रहनेके लिये ब्रह्माजीसे इनकी वर-याचना ( आदि० ३६ । १० ) ।
  • ब्रह्माजीके द्वारा इनको वरदान एवं पृथ्वी धारण करनेकी आज्ञा ( आदि० ३६ । १८-१९ ) ।
  • पृथ्वीको स्थिरभावसे धारण करनेके लिये ब्रह्माजीका आश्वासन ( आदि० ३६ । २० ) ।
  • इनकी माता कद्रू और पिता कश्यप हैं ( आदि० ६५ । ४३ ) ।
  • इनके अंशसे बलरामजी अवतीर्ण हुए थे ( आदि० ६७ । १५२ ) ।
  • भगवान् नारायण शेषको शय्या बनाकर इनपर शयन करते हैं ( वन० २७२ । ३६-४० ) ।
  • त्रिपुरदाहके समय ये शिवजीके रथके अक्ष बने थे ( द्रोण० १०२ । ७२ ) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in