← अनुक्रमणिका

संवरण

  • मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे उत्पन्न महानुधर्षर पुत्र । इनके अन्य भाइयोंके नाम—ऋचेयु, पक्षेयु, कुकणेयु, स्फण्डिलेयु, जलेयु, तेजेयु, सत्येयु तथा धर्मेयु थे ( आदि० ९४ । ८—११ ) ।
  • सोमवंशी अजमीढके पौत्र तथा ऋक्षके पुत्र ( आदि० ९४ । ३१—३४ ) ।
  • पाञ्चाल-नरेशके द्वारा इनपर आक्रमण और इनकी पराजय ( आदि० ९४ । ३०—३८ ) ।
  • शत्रुके भयसे राज्य छोड़कर इनका सिन्धु-तटपर निवास ( आदि० ९४ । ३९—४० ) ।
  • इनके द्वारा राज्य-प्राप्तिके लिये पुरोहितके रूपमें वसिष्ठका वरण ( आदि० ९४ । ४२—४४ ) ।
  • वसिष्ठकी सहायतासे इनको अपने राज्यकी प्राप्ति तथा इनके द्वारा विविध यज्ञोंका सम्पादन ( आदि० ९४ । ४५—४७ ) ।
  • इनके द्वारा सूर्यकन्या तपतीके गर्भसे ‘कुरु’का जन्म ( आदि० ९४ । ४८ ) ।
  • इनकी सूर्यदेवके प्रति भक्ति एवं आराधना ( आदि० १०० । १२—१४ ) ।
  • राजा संवरणके गुण—इनके समान कोई नहीं था । ये
  • कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अपनी दिव्य कान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते थे। प्रजा इनकी उपासना करती थी। उत्तम गुणसम्पन्न और श्रेष्ठ आचार-विचारसे युक्त थे ( आदि० १७० । १९—१९ ) ।
  • इनके साथ तपतीके विवाहके लिये सूर्यदेवका संकल्प ( आदि० १७० । २० ) ।
  • एक दिन ये पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें शिकार खेलने- के लिये गये। वहाँ थकावटके कारण इनके घोड़ेकी मृत्यु हो गयी। फिर ये अकेले पैदल ही घूमने लगे। घूमते- घूमते उपवनमें इन्हें एक विशाललोचना दिव्य कन्या दिखायी दी ( वह सूर्यकन्या तपती थी ) ( आदि० १७० । २१—२३ ) ।
  • तपतीके रूप-सौन्दर्यको देखकर इनका मोह ( आदि० १७० । २४—२८ ) ।
  • इनका उस कन्यासे परिचय पूछना। उसका अदृश्य होना तथा उसके वियोगसे इनकी मूर्च्छा ( आदि० १७० । ३६— ४४ ) ।
  • तपतीद्वारा इनको आश्वासन ( आदि० १७१ । ४-५ ) ।
  • गान्धर्व विवाहद्वारा अपनी पत्नी बननेके लिये इनकी तपतीसे प्रार्थना ( आदि० १७१ । ७— १९ ) ।
  • तपतीकी प्राप्तिके लिये इनके द्वारा सूर्यकी आराधना और वसिष्ठजीका स्मरण ( आदि० १७२ । १२-१३ ) ।
  • वसिष्ठकी कृपा एवं प्रयत्नसे इनको तपतीकी प्राप्ति ( आदि० १७२ । १९—३२ ) ।
  • तपतीके साथ इनका विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १७२ । ३३ ) ।
  • तपतीके साथ इनका विहार ( आदि० १७२ । ३७ ) ।
  • इनके राज्यमें बारह वर्षतक अनावृष्टि ( आदि० १७२ । ३८ ) ।
  • ये साक्षात् स्मरणीय नरेश हैं ( अनु० १६५ । ५४ ) ।
  • महाभारतमें आये हुए संवरण नाम-आजमीढ, आर्ष, पौरव, पौरवनन्दन, ऋक्षपुत्र आदि।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in