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सकृद्ग्रह

  • वाह्लीकदेशके सुप्रसिद्ध राजा शल्य इसीके अंशासे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ६७ । ६ ) ।
  • यह वरुणकी सभामें रहकर उनकी उपासना करता था ( सभा० ९ । १२ ) ।
  • एक दक्षिण भारतीय जनपद ( भीष्म० ९ । ६६ ) ।
  • एक प्राचीन नरेश ( आदि० १ । २३४ ) ।
  • ये यमसभामें रहकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १५ ) ।
  • ये इक्ष्वाकुवंशके प्रतापी राजा थे । इनको दो रानियाँ थीं—वैदर्भी और शैव्या । इनकी संतान-प्राप्तिके लिये तपस्या और इन्हें एक पत्नीसे साठ हजार तथा दूसरीसे एक ही वंशधर पुत्र होनेका वरदान मिला था ( वन० १०६ । १०—१६ ) ।
  • इनकी एक रानी वैदर्भीके गर्भसे एक तुम्बी उत्पन्न हुई । राजा उसे फेंकना चाहते थे, किंतु आकाशवाणीके मना करनेपर तथा उसके निर्देशके अनुसार इन्होंने उस तुम्बीके एक-एक बीजको निकालकर सात हजार घृतपूर्ण कलशोंमें रखा और उनकी रक्षाके लिये भायें नियुक्त कर दीं । तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् इनके साठ हजार पुत्र उन घड़ोंमेंसे निकल आये ( वन० १०६ । १८ से वन० १०७ । ५ तक ) ।
  • इनकी अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा ( वन० १०७ । ११ ) ।
  • इनके साठ हजार पुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निमें भस्म होना ( वन० १०७ । ३३ ) ।
  • इनके द्वारा अपने पुत्र असंजसको त्याग ( वन० १०७ । ३९—४३; शान्ति० ५० । ८ ) ।
  • इनका अंशुमानको राज्य देकर स्वर्ग-गमन ( वन० १०७ । ६४ ) ।
  • ये अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये इन्द्रके विमानपर बैठकर विराटनगरके पास आये थे ( विराट० ५६ । १० ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा इनके दान, यज्ञ आदिका वर्णन ( शान्ति० २९ । १२०—१२६ ) ।
  • महर्षि अरिष्टनेमिसे इनका मोक्षविषयक प्रश्न ( शान्ति० २८८ । २ ) ।
  • इन्होंने जीवनमें कभी मांस नहीं खाया था ( अनु० ११५ । ६६ ) ।
  • ये सत्य-प्रातःस्मरणीय राजर्षि हैं ( अनु० १६५ । ४२ ) ।

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