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सञ्जय

  • (१) गवलगण नामक सूतके पुत्र, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे । ये धृतराष्ट्रके मन्त्री थे ( आदि० ६३ । १० ) ।
  • धृतराष्ट्रके द्वारा इनको अपनी विजय-विषयक निराशाका अनुभव सुनाना ( आदि० ९ । १५०—२९८ ) ।
  • (२) इनके द्वारा धृतराष्ट्रको आश्वासन ( आदि० ११ । २२२—२५१ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें गये थे । इन्हें राजाओंकी सेवा और सत्कारके कार्यमें नियुक्त किया गया था ( सभा० ३५ । ६ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रको फटकारना ( सभा० ८० । ५० ) ।
  • इनके द्वारा विदुरको बुलानेके लिये काम्यकवनमें जाना और विदुरसे संदेश कहना ( वन० ६ । ५—१० ) ।
  • इनके द्वारा संताप करते हुए धृतराष्ट्रको बातों का समर्थन ( वन० ४९ । १—१३ ) ।
  • इनका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके वधके लिये श्रीकृष्णदिके द्वारा काम्यकवनमें की हुई प्रतिज्ञाका वर्णन करना ( वन० ५१ । १५—४४ ) ।
  • धृतराष्ट्रके भेजनेसे युधिष्ठिरके पास जाकर उनकी कुशल पूछना ( उद्योग० २३ । १—५ ) ।
  • युधिष्ठिरके प्रश्नोंका उत्तर देना ( उद्योग० २४ अध्याय ) ।
  • पाण्डवों की सभामें धृतराष्ट्रका संदेश सुनाना ( उद्योग० २५ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी संभावना दिखाकर शान्त रहनेके लिये कहना ( उद्योग० २७ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरके पाससे हस्तिनापुर लौटकर धृतराष्ट्रसे उनका कुशल-समाचार कहना और धृतराष्ट्रके कार्योंकी निन्दा करना ( उद्योग० ३२ । ११—३० ) ।
  • कौरव-सभामें आगमन ( उद्योग० ४० । १४ ) ।
  • कौरवसभामें अर्जुन का संदेश सुनाना ( उद्योग० ४८ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रसे श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन करना ( उद्योग० ५० अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना ( उद्योग० ५० अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर रथ और अश्वोंका वर्णन करना ( उद्योग० ५६ । १—१७ ) ।
  • पाण्डवोंकी युद्धके लिये तैयारीका वर्णन ( उद्योग० ५७ । २—२५ ) ।
  • वृद्धद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन ( उद्योग० ५७ । ४०—४२ ) ।
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर अन्त:पुरमें कहे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनका संदेश सुनाना ( उद्योग० ५५ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन ( उद्योग० ६६ । ३—१५ ) ।
  • श्रीकृष्णके वार्तालापका वृत्तान्त बताना ( उद्योग० १५३ अध्याय ) ।
  • धृतराष्ट्रको कुरुक्षेत्रमें सेनाका पड़ाव पड़नेके बादका समाचार सुनाना आरम्भ करना ( उद्योग० १५९ । ८ ) ।
  • व्यासजीकी कृपासे इन्हें दिव्यदृष्टिकी प्राप्ति ( भीष्म० २ । १० ) ।
  • धृतराष्ट्रके पूछनेपर भूमिके गुणोंका वर्णन करना ( भीष्म० ५ । १२ तक ) ।
  • सुदर्शन द्वीपका वर्णन करना ( भीष्म० ५ । १३ ) ।
  • धृतराष्ट्रसे भीष्मजीकी मृत्युका समाचार सुनाना ( भीष्म० १३ अध्याय ) ।
  • ( यहाँसे सौप्तिकपर्वके ९ वें अध्याय तक संजयने धृतराष्ट्रको युद्धका समाचार सुनाया है । ) धृतराष्ट्रको उपालम्भ देना ( द्रोण० ८६ अध्याय ) ।
  • कर्णद्वारा अर्जुनके ऊपर शक्ति न छोड़नेकी बात न बताना ( द्रोण० १६२ अध्याय ) ।
  • कौरवपक्षके मारे गये प्रमुख वीरोंका परिचय देना ( कर्ण० ५ अध्याय ) ।
  • कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन ( कर्ण० ७ अध्याय ) ।
  • सात्यकिके जीते-जी इनका बंदी बनाया जाना ( शल्य० २५ । ५०-५८ ) ।
  • सात्यकिके अनुग्रहसे सात्यकिकी कैदसे छुटकारा पाना ( शल्य० २९ । ३९ ) ।
  • इनकी दिव्यदृष्टिका चला जाना ( सौप्तिक० ९ । ६२ ) ।
  • धृतराष्ट्रको सान्त्वना देना ( स्त्री० १३-४३ ) ।
  • धृतराष्ट्रसे स्वजनोंका मृतक कर्म करनेको कहना ( स्त्री० ९ । ५-७ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इन्हें कृताकृत कार्योंकी जाँच तथा आय-व्ययके निरीक्षणका कार्य सौंपा जाना ( शान्ति० ४१ । ११ ) ।
  • धृतराष्ट्र और गान्धारीके साथ इनका वनगमन ( आश्रम० १५ । ८ ) ।
  • यात्राके प्रथम दिन गङ्गातटपर धृतराष्ट्रके लिये शय्या बिछाना ( आश्रम० १८ । १९ ) ।
  • वनवासी महर्षियोंसे पाण्डवों तथा उनकी पत्नियोंका परिचय देना ( आश्रम० २५ अध्याय ) ।
  • वनमें छठे समय अर्थात् दो दिन उपवास करके तीसरे दिन आहार ग्रहण करते थे ( आश्रम० ३० । १३ ) ।
  • ये सदा धृतराष्ट्रके पीछे चलते और ऊँची-नीची भूमिमें उन्हें सहारा देकर ले चलते थे ( आश्रम० ३० । १६-१७ ) ।
  • वनमें दावानल प्रज्वलित हो जानेपर धृतराष्ट्रने संजयको दूर भाग जानेके लिये कहा । संजयने इस तरह दावानलमें जलकर होनेवाली मृत्युको राजाके लिये अनिष्ट बतायी; किंतु उससे बचनेका कोई उपाय न देखकर अपना कर्तव्य पूछा । राजाने कहा कि गृहस्थाश्रमियोंके लिये यह मृत्यु अनिष्टकारक नहीं, उत्तम है, तुम भाग जाओ । तब संजयने राजाका परिक्रमा की और उन्हें ध्यान लगानेके लिये कहा । राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती तीनों दग्ध हो गये, किंतु ये दावानलसे मुक्त हो गये । फिर गङ्गातटपर तपस्वी जनोंको राजाके दग्ध होनेका समाचार बताकर ये हिमालयको चले गये ( आश्रम० ३० । १९-२४ ) ।
  • ( २ ) सौवीर देशका एक राजकुमार, जो हाथमें ध्वज लेकर जयद्रथके पीछे चलता था ( वन० २६५ । १० ) ।
  • द्रौपदी-हरणके समय अर्जुनद्वारा इसका वध ( वन० २७१ । २७ ) ।
  • ( ३ ) सौवीर देशका एक राजकुमार, जिसकी माता विदुला थी । एक दिन रणभूमिसे भागकर आनेपर माताने इस कड़ी फटकार दी और युद्धके लिये प्रोत्साहन दिया ( उद्योग० अध्याय १३३ से १३६ । १२ तक )।
  • माताके उपदेशसे युद्धके लिये उद्यत हो उसकी आज्ञाका यथावत् रूपसे पालन किया ( उद्योग० १३६ । १३-१६ )।

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