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सत्यभामा

  • भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानी, भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरको मारकर इनके साथ नरकासुरके घरका निरीक्षण किया । फिर वे इन्हें साथ लेकर इन्द्रलोकमें गये । वहाँ शचीदेवीने इन्हें देवमाता अदितिके मिलाया था । माता अदितिने इन्हें यह वर दिया था कि ‘जबतक श्रीकृष्ण मानवशरीरमें रहेंगे तबतक तू भी वृद्धावस्थाको प्राप्त न होगी; दिव्य सुगन्ध एवं उत्तम गुणोंसे सुशोभित होगी ।’ सत्यभामा शचीके साथ स्वर्गमें घूम-फिरकर उनकी अनुमति ले भगवान् श्रीकृष्णके साथ पुनः द्वारका आ गयीं । द्वारकामें इन्हें रहनेके लिये श्वेत रंगका प्रासाद ( महल ) प्राप्त हुआ था; उसमें विचित्र मणियोंके सोपान लगे थे; उसमें प्रवेश करनेपर ग्रीष्म ऋतुमें भी शीतलताका अनुभव होता था । यह महल एक सुन्दर उद्यानमें बनाया गया था । इसमें चारों ओर ऊँची ध्वजाएँ फहराती थीं; ये सभाभवनमें भगवान्का वैभव एवं नवागता रानियोंको देखने गयी थीं ( सभा० ३८ । २९ के बाद, दा० पाठ, पृष्ठ ८०६, ८११, ८१५, ८१५, ८२० ) ।
  • इनका काम्यकवनमें श्रीकृष्णके साथ आकर द्रौपदीसे मिलना ( वन० १८३ । ११ ) ।
  • इनका द्रौपदीके पतिको अपने अनुकूल बनाये रखनेका उपाय पूछना ( वन० २३३ । ४—१८ ) ।
  • इनका द्रौपदीको आश्वासन देकर द्वारकाको प्रस्थान करना ( वन० २३५ । ४—१८ ) ।
  • ये सत्राजित्की पुत्री थीं, भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-गमनके पश्चात् जब अर्जुन द्वारकामें आये थे, उस समय उनके पास आकर रुक्मिणी आदि रानियोंके साथ इन्होंने विलाप किया था ( मौसल० ५ । १३ ) ।
  • श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा तपस्याका निश्चय करके वनमें चली गयी थीं ( मौसल० ७ । ७४ ) ।

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