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सत्यवती

  • ( १ ) उपरिचर वसुके वीर्यद्वारा ब्रह्माजीके शापसे मत्स्यभावको प्राप्त हुई ‘अद्रिका’ नामक अप्सराके गर्भसे उत्पन्न एक राजकन्या । मल्लाहोंने मछलीका पेट चीरकर एक कन्या और पुरुष निकाला; जब राजाको इस-की सूचना दी गयी, तब राजाने उन दोनों बालकोंमेंसे पुरुषको स्वयं ग्रहण कर लिया; वही ‘मत्स्य’ नामक धर्मात्मा राजा हुआ; उनमें जो कन्या थी, उसके शरीरसे मछली-की गन्ध आती थी, अतः राजाने उसे मल्लाहको सौंप दिया और कहा—‘यह तेरी पुत्री होकर रहे । मत्स्य
  • सत्य एवं सद्गुणसे सम्पन्न होनेके कारण वह 'सत्यवती' नामसे प्रसिद्ध हुई। मछेरोंके आश्रयमें रहने और मछलीकी सी गन्ध होनेके कारण वह कुछ काल 'मत्स्यगन्धा' कहलायी। यह पिताकी सेवाके लिये यमुनाजीमें नाव चलाया करती थी ( आदि० ६३ । ५०-५१ ) ।
  • यह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। एक दिन पराशर मुनिने इसे देखा और इसके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की। इस-की इच्छाके अनुसार अन्धकारके लिये उन्होंने कुहरेकी सृष्टि कर दी। इसके कन्यात्वके अक्षुण्ण रहने और शरीर-में उत्तम सुगन्ध प्रकट होनेका भी महर्षिने इसे वर दे दिया। फिर इसने महर्षिके साथ समागम किया। शरीरमें उत्तम गन्ध निकलनेसे इसका 'गन्धवती' नाम प्रसिद्ध हुआ। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी इसकी सुगन्ध-का अनुभव करते थे, इस कारण इसका दूसरा नाम 'योजनगन्धा' हो गया ( आदि० ६३ । ७०-७३ ) ।
  • सत्यवतीने पराशरजीके सम्पर्कमें तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया। यमुनाजीके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली परा-शरनन्दन व्यास प्रकट हुए। उन्होंने मातासे कहा—'आव-श्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना; मैं अवश्य दर्शन दूँगा।' इतना कहकर उन्होंने माताकी आज्ञामें तपस्यामें ही मन लगाया ( आदि० ६३ । ८४-८५ ) ।
  • पिताके पूछनेपर इसका अपने शरीरकी उत्तम गन्धमें महर्षि परा-शरकी कृपाको कारण बताना ( आदि० ६३ । ८६ के बाद दा० पाठ ) ।
  • इसका एक नाम 'गन्धकाली' भी था। इसका शान्तनुके साथ विवाह और उसके द्वारा इसके गर्भमें चित्राङ्गद और विचित्रवीर्यका जन्म हुआ ( आदि० ९५ । ४८-५०; आदि० १०१ । ३ ) ।
  • वंशकी रक्षाके लिये विवाह करने तथा अम्बिका आदिके गर्भमें पुत्रोत्पादनके लिये इसका भीष्मसे अनुरोध ( आदि० १०३ । १०-११ ) ।
  • भीष्मके प्रति इसका अपने गर्भमें व्यासजीके उनका वृत्तान्त सुनाना ( आदि० १०४ । ५-१४ ) ।
  • विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंसे सन्तानोत्पादनके हेतु व्यासजीको बुलाने-के सम्बन्धमें इसका भीष्मसे परामर्श ( आदि० १०४ । १८-१९ ) ।
  • भीष्मकी अनुमति प्राप्त होनेपर कुरुवंशकी रक्षाके लिये इसके द्वारा व्यासजीका स्मरण ( आदि० १०४ । २२-२४ ) ।
  • विचित्रवीर्यकी पत्नियोंसे पुत्रोत्पादन-के लिये इसके द्वारा व्यासको आदेश ( आदि० १०५ । ३५-३८ ) ।
  • इसका रानी अम्बिकाको समझा-बुझाकर अनुकूल करके पुत्रोत्पादनके निमित्त व्यासकी प्रतीक्षा करनेके लिये आज्ञा देना ( आदि० १०५ । ४६ से आदि० १०५ । २ तक ) ।
  • इसका अम्बालिकाको तैयार करना और उसके गर्भसे पुत्रोत्पादनके लिये व्यासजीको बुलाना ( आदि० १०५ । १३-१४ ) ।
  • व्यासजीका
  • (२) केकयकुलकी कन्या, इक्ष्वाकुवंशी महाराज हरिश्चन्द्रकी माता ( सभा० १२ । १० के बाद दा० पाठ ) ।
  • (३) महाराज गाधिकी पुत्री, जिसका विवाह राजाने एक हजार श्यामकर्ण घोड़े लेकर ऋचीक मुनिके साथ किया था ( वन० १९६ । २६-२९ ) ।
  • (४) नारदजीकी भार्या ( उद्योग० १७० । १५ ) ।

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