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सत्यवान्

  • (१) शाल्वराज द्युमत्सेनके पुत्र, जो नगरमें जन्म लेकर भी तपोवनमें पालित, पोषित और संवर्धित हुए थे ( वन० २९४ । १० ) ।
  • मदराज अश्वपतिकी कन्या सावित्रीके साथ इनका विवाह ( वन० २९५ । १५ ) ।
  • इनका समिधाके लिये वनमें जानेको उद्यत होना। सावित्रीका इनसे अपनेको भी साथ ले चलनेका अनुरोध। इनका उसे माता-पिताकी आज्ञा लेकर चलनेके लिये स्वीकृति देना ( वन० २९६ । १८-२३ ) ।
  • इनका वनमें फल चुनकर टोकरीमें रखना; फिर लकड़ी चीरना; श्रमसे इनके सिरमें दर्द होना; सावित्रीसे अपनी अस्वस्थता और असमर्थताका वर्णन करना; यमराजका सावित्रीमें सत्यवान्की आयुके समाप्त होने और इन्हें बाँधकर ले जानेके लिये अपने आगमनकी बात बताना तथा सत्यवान्के शरीरमें पाशमें बँधे हुए अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले जीवको बलपूर्वक खींचकर निकालना ( वन० २९६ । १-१७ ) ।
  • इनका पुनः जीवित होना और सावित्रीसे वार्तालाप करना। माता-पिताके दर्शनके लिये इनकी चिन्ता ( वन० २९७ । ६४-१०२ ) ।
  • सावित्रीके साथ इनका आश्रमकी ओर प्रस्थान ( वन० २९७ । १०३-११ ) ।
  • इनका पत्नीके साथ आश्रममें पहुँचना ( वन० २९८ । २९ ) ।

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