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सरस्वती

  • (१) एक देवपत्नी, जो सायं-प्रातः स्मरणीय नदियोंमें है ( अनु० १६५ । २१ ) । (२) वीर नामक अग्निकी पत्नी, जिसमें उन्होंने सिद्धि नामक पुत्रको जन्म दिया था ( वन० २१९ । ११ ) ।
  • (१) एक देवी, जिनकी प्रत्येक पर्वके आरम्भमें वन्दना की गयी है ( आदि० १ । मङ्गलाचरण ) ।
  • ये इन्द्रसभामें विराजमान होती हैं ( सभा० ७ । १६ ) ।
  • इनके द्वारा ताक्ष्यमुनिको उनके प्रश्नके अनुसार गोदान, अग्निहोत्र आदि विविध विषयोंका उपदेश किया गया ( वन० १८५ अध्याय ) ।
  • ये त्रिपुरदाहके समय शिवजीके रथके आगे बढ़कर मार्ग थी ( कर्ण० ३४ । २४ ) ।
  • दण्डनीतिस्वरूपा सरस्वती ब्रह्माजीकी कन्या हैं ( शान्ति० १२१ । २४ ) ।
  • महर्षि याज्ञवल्क्यके चिन्तन करनेपर स्वर और व्यञ्जन वाणीसे विभूषित वाग्देवी सरस्वती ॐकारको आगे करके उनके सामने प्रकट हुई थीं ( शान्ति० २९८ । १४ ) ।
  • (२) एक नदी, जिसके तटपर राजा मतिनारने यज्ञ किया था । यज्ञ समाप्त होनेपर नदीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया । मतिनार ने इसके गर्भसे तंसु नामक पुत्रको उत्पन्न किया ( आदि० ९५ । २६-२७ ) ।
  • यह गङ्गाकी सात धाराओंमेंसे एक है और प्रक्षकी जड़से प्रकट हुई है । इसका जल पीनेसे सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ( वन० १२१ । २०-२१ ) ।
  • यह वरुणकी सभामें रहकर उनकी उपासना करती है ( सभा० ९ । १९ ) ।
  • पाण्डवोंका वनयात्राके समय इसे पार करना ( वन० ५ । २ ) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा सरस्वती तट पर किये गये यज्ञानुष्ठानकी चर्चा ( वन० १२ । १५ ) ।
  • काम्यकवनका भूभाग सरस्वतीके तटपर है ( वन० ३६ । ४१ ) ।
  • यह नदी तीर्थस्वरूपा है । उनमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे यात्री सारस्वत लोकमें जाता और आनन्दका भागी होता है ( वन० ८४ । ६६ ) ।
  • तीर्थोंकी पंक्तिमें सुशोभित यह नदी बड़ी पुण्यदायिनी है ( वन० १० । ३ ) ।
  • दर्घाचका आश्रम सरस्वती नदी के उस पार था ( वन० १०० । १३ ) ।
  • लोमशद्वारा इस के माहात्म्यका वर्णन ( वन० १३० । २०-२१ ) ।
  • यह विनशनतीर्थमें लुप्त होकर चमसोद्भेदमें पुनः प्रकट हुई ( वन० १३० । ३-५ ) ।
  • असिकी उत्पत्तिकी स्थानभूता नदियोंमें इसकी गणना है ( वन० २२२ । २२ ) ।
  • ये गङ्गाकी सात धाराओंमेंसे एक हैं ( भीष्म० ६ । ४८ ) ।
  • सरस्वती उन पवित्र नदियोंमें है, जिनका जल भारतवासी पीते हैं ( भीष्म० ९ । १९ ) ।
  • सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंकी महिमाका विशेष वर्णन ( शल्य० अध्याय ३५ से ५४ तक ) ।
  • यह ब्रह्मसरोवरसे प्रकट हुई । इसके द्वारा वसिष्ठका बहाया
  • (१) विश्वामित्रद्वारा इसे शापकी प्राप्ति ( शल्य० ४२ । ३८-३९ ) ।
  • ऋषियोंके प्रयत्नसे शाप-मुक्ति ( शल्य० ४३ । १६ ) ।
  • महर्षि दधीचिके वीर्यको धारण करके पुत्र पैदा होनेपर उन्हें सौंपना ( शल्य० ४३ । १३-१४ ) ।
  • महर्षिद्वारा इसे वरदान-प्राप्ति ( शल्य० ५१ । १०-२४ ) ।
  • बलराम-जीद्वारा इसकी महिमाका वर्णन ( शल्य० ५४ । ३८-३९ ) ।
  • अर्जुनने सात्यकिके पुत्रको इसके तटवर्ती प्रदेशका अधिकारी बनाया ( मौसल० ८ । ७ ) ।
  • श्रीकृष्णकी सोलह हजार पत्नियोंने सरस्वती नदीमें कूदकर अपने प्राण दे दिये ( स्वर्ग० ५ । २५ ) ।
  • (२) मनुकी पत्नीका नाम ( उद्योग० ११७ । १४ ) ।

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