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सहदेव

  • (१) पाण्डुके क्षेत्रज पुत्र, अश्विनीकुमारोंके द्वारा माद्रीके गर्भसे उत्पन्न दो पुत्रोंमेंसे एक। ये दोनों भाई जुड़वें उत्पन्न हुए थे। दोनों ही सुन्दर तथा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहनेवाले थे ( आदि० ७१ । ११४; आदि० ६३ । ११७; आदि० ९५ । ६३ ) ।
  • अनुपम रूपशाली तथा परम मनोहर नकुल-सहदेव अश्विनीकुमारोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे ( आदि० ७१ । १११—११२ ) ।
  • इनकी उत्पत्ति तथा शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंद्वारा इनका नामकरणसंस्कार ( आदि० १२३ । १७—२१ ) ।
  • वसुदेवके पुरोहित कार्यपद्वारा इनके उपनयन आदि संस्कार तथा राजर्षि शुक्रद्वारा इनका अस्त्रविद्याका अध्ययन और ढाल-तलवार चलानेकी कलामें निपुणता प्राप्त करना ( आदि० १२३ । ३१ के बाद दा० पाठ ) ।
  • पाण्डुकी मृत्युके पश्चात् माद्रीका अपने पुत्रों ( नकुल-सहदेव ) को कुन्तीके हाथोंमें सौंपकर पतिके साथ चितापर आरूढ़ होना ( आदि० १२४ अध्याय ) ।
  • शतशृङ्गनिवासी ऋषियोंका सहदेव आदि पाँचों पाण्डवोंको कुन्तीसहित हस्तिनापुर ले जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथोंमें सौंपना। द्रोणाचार्यका पाण्डवोंको नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा देना ( आदि० १३१ । १४ ) ।
  • द्रुपदपर आक्रमण करते समय अर्जुनका माद्रीपुत्र नकुल और सहदेवको अपना चक्ररक्षक बनाना ( आदि० १३० । २० ) ।
  • द्रोणद्वारा सुशिक्षित किये गये सहदेव अपने भाइयोंके अधीन ( अनुकूल ) रहते थे ( आदि० १३८ । १८ ) ।
  • धृतराष्ट्रके आदेशसे कुन्तीसहित पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा, लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका लाक्षागृहमें निवास ( आदि० ११५ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंका लाक्षागृहका दाह और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश ( आदि० १५५ अध्याय ) ।
  • पाण्डवोंकी पाञ्चाल-यात्रा ( आदि० १६९ अध्याय ) ।
  • इनका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना ( आदि० १६४ अध्याय ) ।
  • पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार ( आदि० १६० अध्याय ) ।
  • पाँचों पाण्डवोंका कुन्तीसहित द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना ( आदि० १६३ अध्याय ) ।
  • द्रौपदीके साथ इनका विधिपूर्वक विवाह ( आदि० १६७ । १३ ) ।
  • विदुरके साथ पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर 'इन्द्रप्रस्थ' नगरका निर्माण करना । पाँचों भाइयोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण ( आदि० २११ अध्याय ) ।
  • सहदेवद्वारा द्रौपदीके गर्भमें श्रुतसेन ( श्रुतकर्मा ) का जन्म ( आदि० २२० । ८०; आदि० ९५ । ७५ ) ।
  • इनका मदराज द्युतिमान्की पुत्री विजयासे विवाह तथा इनके द्वारा उसके गर्भमें सुहोत्रका जन्म ( आदि० ९५ । ८० ) ।
  • इनके द्वारा दक्षिण दिशाके नरेशोंपर विजय ( सभा० ३१ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा मत्स्यनरेश विराट्की पराजय ( सभा० ३१ । २१ ) ।
  • दन्तवक्त्रकी पराजय ( सभा० ३१ । ३ ) ।
  • माहिष्मतीनरेश नीलके साथ इनका घोर युद्ध ( सभा० ३१ । ४९ ) ।
  • इनके द्वारा अग्निकी स्तुति ( सभा० ३१ । ४९ ) ।
  • अग्निकी कृपासे इनको राजा नीलद्वारा करकी प्राप्ति ( सभा० ३१ । ५१ ) ।
  • लङ्कामें कर लानेके लिये इनका घटोत्कचको दूत बनाकर राक्षसराज विभीषणके पास भेजना । घटोत्कचसे विभीषणकी बातचीत । विभीषणका बहुत-से सुवर्ण, मणि, रत्न आदि उपहार देकर दूतको विदा करना । उन भेंट-सामग्रियोंको पहुँचानेके लिये अठासी हजार राक्षस आये थे ( सभा० ३१ । ७२ के बाद दा० पाठ, पृष्ठ ७५९ से ७६४ तक ) ।
  • अन्य मन्त्रियोंसहित सहदेवको यज्ञका आवश्यक उपकरण एवं खाद्यान्न जुटानेके लिये राजसूययज्ञके समय युधिष्ठिरकी आज्ञा ( सभा० ३३ । २७-३१ ) ।
  • ये युधिष्ठिरके मन्त्री थे ( सभा० ३३ । ४० ) ।
  • इनके द्वारा राजसूय-यज्ञमें श्रीकृष्णकी अग्रपूजा ( सभा० ३६ । ३० ) ।
  • श्रीकृष्णकी अग्रपूजाके अवसरपर इनकी विरोधी राजाओंको चुनौती ( सभा० ३९ । १-५ ) ।
  • राजसूय-यज्ञके बाद ये आचार्य द्रोण और अश्वत्थामाको पहुँचानेके लिये उनके साथ गये थे ( सभा० ४५ । ४८ ) ।
  • युधिष्ठिरके द्वारा ये जुएके दाँवपर हारे और हार गये थे ( सभा० ६८ । १५ ) ।
  • इनकी शकुनिको मारनेकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७७ । २९-४२ ) ।
  • इस दुर्दिनमें कोई मुझे पहचान न ले—यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी लपेटकर वनकी ओर गये थे ( वन० ८० । १७ ) ।
  • इनकी अर्जुनके लिये चिन्ता ( वन० ८० । २७-२९ ) ।
  • इनका जटासुरकी पकड़े छूटकर युधिष्ठिरको पुकारना ( वन० १५७ । ११ ) ।
  • इनका विलापसहित दुर्योधनको बुलानेके लिये नदीतटपर जाना और भीमसेनको पुकारना ( वन० १६३ । ३०-३८ ) ।
  • द्रौपदीद्वारा जयद्रथमें इनके पराक्रम और ज्ञान आदि सद्गुणोंका वर्णन ( वन० २७० । १५-१९ ) ।
  • द्रौपदी-हरणके समय अपने घोड़ोंके मारे जानेपर युधिष्ठिरका सहदेवके रथपर आना तथा भीम एवं द्रौपदीको भी सहदेवद्वारा उसी रथपर चढ़वाना ( वन० २७१ । १५-३४ ) ।
  • द्वैतवनमें जल लानेके लिये जाना और सरोवरपर गिरना ( वन० ३१२ । ११ ) ।
  • इनका विराटनगरमें तन्तिपाल नामसे रहनेकी बात बताना ( विराट० ३ । १ ) ।
  • राजा विराटके यहाँ अरिष्टनेमि नामक वैश्यके रूपमें अपना परिचय देकर उनमें अपनेको रखनेके लिये प्रार्थना करना और उनके द्वारा गोशालाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना ( विराट० १० । ५-१६ ) ।
  • ये ग्वालके वेष धारण करके पाण्डवोंको दूध, दही, घी दिया करते थे ( विराट० १३ । १ ) ।
  • द्रौपदीका भीमसेनसे सहदेवकी वर्तमान दुःखमयी परिस्थिति बताकर उनके लिये शोक प्रकट करना ( विराट० १६ । ३३-४१ ) ।
  • विराटकी गौओंके अपहरणके समय इनका त्रिगर्तोंके साथ युद्ध ( विराट० ३३ । ३४ ) ।
  • संजयद्वारा पुण्ड्रराजसे इनकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । ३३-४१ ) ।
  • शान्तिदूत बनकर जानेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णसे युद्धकी ही योजना बनानेकी सम्मति देना ( उद्योग० ८१ । १-४ ) ।
  • इनका विराटको सेनापति बनानेका प्रस्ताव ( उद्योग० १५१ । १० ) ।
  • उद्दूकने दुर्योधनके संदेशका उत्तर देते हुए पुत्रसहित शकुनिको मार डालनेकी घोषणा करना ( उद्योग० १६२ । ३१-३६ ) ।
  • उद्दूकने युधिष्ठिरका उत्तर देना ( उद्योग० १६३ । ३९-४० ) ।
  • कवच उतारकर पैदल ही कौरवसेनाकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरसे प्रश्न करना ( भीष्म० ४३ । १९ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें दुर्मुखके साथ द्वन्द्व युद्ध ( भीष्म० ४५ । २९-२७ ) ।
  • विकर्णके साथ युद्ध ( भीष्म० ७१ । २९ ) ।
  • इनके द्वारा शल्यकी पराजय ( भीष्म० ८३ । ५३ ) ।
  • कौरवोंकी अग्रसेनाका संहार ( भीष्म० ८९ । ३२-३४ ) ।
  • इनके द्वारा युयुत्सुकी सेनाका संहार एवं पलायन ( भीष्म० १०५ । २१-२३ ) ।
  • इनका कृपाचार्यके साथ द्वन्द्व युद्ध ( भीष्म० १०५ । २९-३३; भीष्म० १११ । २८-३३ ) ।
  • पुण्ड्रक्षुद्रकमें इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । २२-२५ ) ।
  • शकुनिके साथ इनका युद्ध ( द्रोण० १४ । २३ ) ।
  • इनके रथके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । ९ ) ।
  • शकुनिके साथ युद्ध ( द्रोण० १६ । २१-२५ ) ।
  • दुर्मुखके साथ युद्ध ( द्रोण० १०६ । १३ ) ।
  • इनके द्वारा पुण्ड्रराजकी पराजय ( द्रोण० १०७ । २३-२४ ) ।
  • त्रिगर्त-राजकुमार निरमित्रका वध ( द्रोण० १०७ । २५-२६ ) ।
  • कर्णके साथ युद्धमें इनकी पराजय ( द्रोण० ५४ । १७ ) ।
  • दुःशासनके साथ युद्ध और उसे परास्त करना ( द्रोण० १६६ । २९-३५ ) ।
  • इनका धृष्टद्युम्नकी रक्षामें जाना ( द्रोण० १८५ । ७ ) ।
  • धृष्टद्युम्नको मारनेके लिये झपटते हुए माल्यकिको अनुनय-विनयसे शान्त करना ( द्रोण० १९८ । ५३-५९ ) ।
  • इनके द्वारा पुण्ड्रराजकी पराजय ( कर्ण० २२ । १५-१५ ) ।
  • दुःशासनकी पराजय ( कर्ण० २३ अध्याय ) ।
  • दुर्योधनके साथ युद्धमें इनका घायल होना ( कर्ण० ५६ । १७-१८ ) ।
  • इनके द्वारा उलूककी पराजय ( कर्ण० ६१ । ४४ ) ।
  • कर्णद्वारा इनकी पराजय ( कर्ण० ६३ । ३३ ) ।
  • इनके द्वारा शल्यके पुत्रका वध ( शल्य० ११ । ४३ ) ।
  • शल्यके साथ युद्ध ( शल्य० १३ अध्याय; शल्य० १५ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा शकुनिपुत्र उलूकका वध ( शल्य० २८ । ३२-३३ ) ।
  • इनके द्वारा शकुनिका वध ( शल्य० २८ । ४६-६१ ) ।
  • युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना ( शान्ति० १३ अध्याय ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इन्हें सभी अवस्थाओंमें अपनी रक्षाका कार्य सौंपना ( शान्ति० ४१ । १५ ) ।
  • युधिष्ठिरद्वारा इनके लिये दिये गये दुर्मुखके महलमें इनका प्रवेश ( शान्ति० ४४ । १६-१७ ) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर इनका त्रिवर्गमें अर्थकी प्रधानता बताना ( शान्ति० १६७ । २२-२७ ) ।
  • इनके द्वारा शकुनिके मारे जानेकी श्रीकृष्णद्वारा चर्चा ( आश्व० ६० । २५ ) ।
  • अभिमन्युके बालककी रक्षामें युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवके भी जीवनकी रक्षा होगी —ऐसा कुन्तीका श्रीकृष्णके प्रति कथन ( आश्व० ६६ । १९ ) ।
  • अश्वमेध-यज्ञके अवसरपर व्यासजी और युधिष्ठिरके द्वारा इन्हें कुटुम्ब-पालन सम्बन्धी समस्त कार्योंकी देखभालका काम सौंपा जाना। ( आश्रम० ७२ । २०- २६ ) ।
  • वनको जाती हुई कुन्तीका इन्हें और इनपर सदा प्रसन्न रहनेके लिये आदेश देना ( आश्रम० १६ । १० ) ।
  • नकुल और सहदेव गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहनेवाले थे, इन्हें भूखका कष्ट न उठाना पड़े, इसके लिये कुन्तीने युधिष्ठिरको युद्धके निमित्त उत्साह दिला था ( आश्रम० १७ । ८ ) ।
  • माताके दर्शनके लिये युधिष्ठिरके वन-गमन- विषयक विचारको जानकर इनका हर्ष प्रकट करना और स्वयं भी उनके साथ जानेकी उत्सुकता दिखाना ( आश्रम० २२ । १७-१३ ) ।
  • वनमें माताको दूरसे ही देखकर इनका दौड़ना और पास पहुँचकर उनके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोना, नेत्रोंमें आँसू बहाती हुई कुन्तीका भी इन्हें हाथोंसे उठाकर छातीसे लगा लेना और गान्धारीको इनके आगमनकी सूचना देना ( आश्रम० २४ । ८-१० ) ।
  • संजयका ऋषियोंसे सहदेव तथा इनकी पत्नीका परिचय देना ( आश्रम० २५ । ८-१३ ) ।
  • इनका अपना नेत्रोंमें आँसू भर- कर युधिष्ठिरके समक्ष वनमें रहनेकी इच्छा प्रकट करना, माताको छोड़कर घर जानेसे अरुचि दिखाना और माता-पिताकी सेवा करते हुए तपस्यासे शरीरको सुखा डालनेका विचार व्यक्त करना । इनकी बात सुनकर कुन्तीका इन्हें छातीसे लगा लेना और अपनी बात माननेके लिये कहकर घर जानेकी आज्ञा देना ( आश्रम० ३६ । ३६-४३ ) ।
  • माद्रीकुमार सहदेव भी जो माता कुन्तीको विशेष प्रिय रहे हैं, उन्हें आगमें जलनेसे बचा न सकें—ऐसा कहकर युधिष्ठिरका विलाप ( आश्रम० ३८ । १७-१९ ) ।
  • युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी—ये छः व्यक्ति एक ही हृदय रखते थे ( मौसल० १७ । ३ ) ।
  • इनका युधिष्ठिरके महाप्रस्थानविषयक निश्चयका अनुमोदन ( महाप्र० १ । ५ ) ।
  • इनकी भाइयोंके साथ महाप्रस्थान-यात्रा ( महाप्र० १ । २२-२५ ) ।
  • उस यात्रामें ये नकुलके पीछे और द्रौपदीके आगे चलते थे ( महाप्र० ३ । १२-१३ ) ।
  • महागिरि मेरुके पास द्रौपदीके पश्चात् मार्गमें भीमसेनके पूछनेपर सहदेवका भी धराशायी होना और भीमसेनके पूछनेपर युधिष्ठिरका इनके पतनका कारण बताना ( महाप्र० ३ । १०-११ ) ।
  • ( २ ) एक महर्षि, जो इन्द्रकी सभामें विराजते थे ( सभा० ७ । १६ ) ।
  • ( ३ ) एक प्राचीन राजा, जो यम-सभामें रहकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १७ ) ।
  • आचार्य नीलकण्ठके मतानुसार ये सुप्रसिद्ध राजा सुमुखके पुत्र थे । इन्होंने यमुनाके अभिगिर नामक तीर्थमें एक लाख स्वर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणा देकर विशाल यज्ञका अनुष्ठान किया था ( वन० १० । ५-७ ) ।
  • ( ४ ) जरासंधका पुत्र । इसके दो छोटी बहनें थीं, जो कंसकी ब्याही गयी थीं । उनके नाम थे—अस्ति और प्राप्ति ( सभा० १४ । ३१ ) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें आया था ( आदि० १८५ । ८ ) ।
  • जरासंधका इसके राज्याभिषेककी आज्ञा देना ( सभा० २२ । ३१ ) ।
  • पिताके मारे जानेपर इसका भेंट लेकर भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें जाना । श्रीकृष्णका इसे अभयदान देकर पिताके राज्यपर अभिषिक्त करना और इसको अपना अभिन्न सुहृद् बना लेना । भीम और अर्जुनद्वारा भी इसका सत्कार होना ( सभा० २४ । ४२-४३ दाक्षिणात्य पाठसहित ) ।
  • एक अक्षौहिणी सेनाके साथ इसका युधिष्ठिरकी सहायताके लिये आना ( उद्योग० ५० । ४८ ) ।
  • संजयद्वारा इसकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । ४८ ) ।
  • युधिष्ठिरकी सेनाके सात सेनापतियोंमें एक मगधराज सहदेव भी था, जिसका युधिष्ठिरने उक्त पदपर अभिषेक किया था ( उद्योग० १५७ । ११-१४ ) ।
  • इनके घोड़ोंका वर्णन ( द्रोण० २३ । ४८ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इसका वध ( द्रोण० १२५ । ४५ ) ।

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