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सात्यकि

  • वृष्णिवंशी शिनिकुमार सत्यकके पुत्र ( आदि० ६३ । १०५ ) ।
  • ये वृष्णिकुलभूषण, सत्यप्रतिज्ञ और शत्रु-मर्दन वीर थे तथा मरुत् देवताओंके अंशमें उत्पन्न हुए थे ( आदि० ७० । ७९ ) ।
  • ये द्रौपदीके स्वयंवरमें पधारे थे ( आदि० १८५ । १८ ) ।
  • अर्जुन और सुभद्राके लिये दहेज लेकर इन्द्रप्रस्थमें आये थे ( आदि० २२० । ३१ ) ।
  • सात्यकिका मूल नाम युयुधान था । ये युधिष्ठिरकी सभामें बैठते थे और इन्होंने वहीं अर्जुनसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी ( सभा० १४ । ३४-३६ ) ।
  • वृष्णिवंशी यादवोंके सात अतिरथी वीरोंमें इनकी गणना की गयी है ( सभा० ३४ । ५०-५८ ) ।
  • युधिष्ठिरके अभिषेकके समय इन्होंने उनके ऊपर छत्र लगा रखा था ( सभा० ५३ । १३ ) ।
  • प्रमासक्षेत्रमें पाण्डवोंका दुःख देखकर इनके शौर्यपूर्ण उद्गार ( वन० १२० । १९-२२ ) ।
  • ये उपप्लव्यनगरमें अभिमन्यु-के विवाहोत्सवमें सम्मिलित हुए थे ( विराट० ७२ । २१ ) ।
  • बलरामजीके कथनकी आलोचना करते हुए इनके वीरोचित उद्गार ( उद्योग० ३ अध्याय ) ।
  • इनका विशाल चतुरङ्गिणी सेनाके साथ युधिष्ठिरके पास आना ( उद्योग० १७ । १ ) ।
  • संजयद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( उद्योग० ५० । ३९ ) ।
  • शान्तिदूत बनकर कौरवोंके यहाँ जानेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णका इनके युद्धके लिये ही अपनी सम्मति प्रकट करना ( उद्योग० ८१ । ५-७ ) ।
  • श्रीकृष्णका सात्यकिको अपने रथपर अस्त्र-शस्त्र आदि रखनेको कहना तथा इन्हें रथपर बिठाकर साथ ले जाना ( उद्योग० ८३ । १२-२२ ) ।
  • दुर्योधनके षड्यन्त्रका भंडाफोड़ करना ( उद्योग० १३० । १४-१७ ) ।
  • प्रथम दिनके संग्राममें कृतवर्माके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । १२-१३ ) ।
  • कलिंगसेनाको परास्त करनेके बाद भीमसेनका अभिनन्दन करना ( भीष्म० ५४ । १२१-१२२ ) ।
  • भीष्मके बाणोंसे आच्छादित हुए अर्जुनकी सहायतामें पहुँचना ( भीष्म० ५५ । ७८ ) ।
  • भूरिश्रवाके साथ इनका युद्ध ( भीष्म० ६४ । १-२ ) ।
  • भीष्मद्वारा सारथिके मारे जानेपर इनके घोड़ोंका रथ लेकर भागना ( भीष्म० ७३ । २८-२९ ) ।
  • भूरिश्रवाके साथ इनका युद्ध और उसके द्वारा इनके दस पुत्रोंका वध ( भीष्म० ७४ । १-२७ ) ।
  • इनके द्वारा अलम्बुषकी पराजय ( भीष्म० ८२ । ४५ ) ।
  • अश्वत्थामा-को मूर्छित कर देना ( भीष्म० १०१ । ४७ ) ।
  • भीष्मके साथ इनका युद्ध ( भीष्म० १०४ । २९-३६ ) ।
  • दुर्यो-धनके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ११० । १४; भीष्म० ११५ । १८ ) ।
  • अलम्बुषके साथ युद्ध ( भीष्म० १११ । १-६ ) ।
  • इनका मगदत्तके साथ युद्ध ( भीष्म० १११ । ७-१३ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० १११ । १४-१९ ) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनकी वीरताका वर्णन ( द्रोण० १० । १३-३९ ) ।
  • कृतवर्माके साथ युद्ध ( द्रोण० १४ । ३५-३६; द्रोण० २५ । ८-९ ) ।
  • क्षेम धूर्ति और बृहन्तके साथ युद्ध ( द्रोण० २५ । ७-१८ ) ।
  • भगदत्तके हाथीद्वारा इनके रथका फेंका जाना ( द्रोण० २४ । ४४ ) ।
  • कर्णके साथ युद्ध ( द्रोण० २७ । ११-१० ) ।
  • श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ इनकी रणयात्रा ( द्रोण० ८४ । २१ ) ।
  • अर्जुनके आदेशसे युधिष्ठिरकी रक्षा में जाना ( द्रोण० ८४ । २५ ) ।
  • दुःशासनके साथ युद्ध ( द्रोण० ९६ । १४-१७ ) ।
  • इनके द्वारा द्रोणाचार्यके प्रहारसे घृष्टद्युम्नकी रक्षा ( द्रोण० ९७ । ३३ ) ।
  • द्रोणाचार्यके साथ अद्भुत संग्राम और उनके लगातार सौ धनुषोंको काटना ( द्रोण० ९८ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा व्याघ्रदत्तका युद्ध ( द्रोण० १०६ । १४ ) ।
  • इनके द्वारा व्याघ्रदत्तका वध ( द्रोण० १०७ । ३२ ) ।
  • द्रोणाचार्यद्वारा इनका घायल होना ( द्रोण० ११० । २-१३ ) ।
  • युधिष्ठिरके द्वारा अर्जुनकी सहायताके लिये अनेकों आदेश मिलनेपर उनको उत्तर देना ( द्रोण० १११ । ३-२६ ) ।
  • अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और प्रस्थान ( द्रोण० ११२ । ७-७६ ) ।
  • भीमसेनको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये सौंपना ( द्रोण० ११२ । ७९-७६ ) ।
  • इनके द्वारा कौरवसेनाका संहार ( द्रोण० ११२ । ६-२० ) ।
  • द्रोणाचार्यसे युद्ध करके उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना ( द्रोण० ११३ । २२-४८ ) ।
  • कृतवर्माके साथ युद्ध और उसे घायल करके आगे बढ़ना ( द्रोण० ११३ । ४६-६० ) ।
  • इनके द्वारा कृतवर्माकी पराजय ( द्रोण० ११५ । १०-११ ) ।
  • जलसंधका वध ( द्रोण० ११५ । ५२-५३ ) ।
  • दुर्योधनकी पराजय ( द्रोण० ११६ । २४-२५ ) ।
  • इनके द्वारा कृतवर्माकी पराजय ( द्रोण० ११६ । ४१ ) ।
  • द्रोणाचार्यकी पराजय ( द्रोण० ११७ । ३० ) ।
  • सुदर्शनका वध ( द्रोण० ११७ । १५ ) ।
  • सारथिके साथ संवाद और कौरवसेनाको खदेड़ना ( द्रोण० ११७ अध्याय ) ।
  • म्लेच्छसहित दुर्योधनको परास्त करना ( द्रोण० १२० । ४२-४४ ) ।
  • इनके द्वारा म्लेच्छसेनासहित दुःशासनकी पराजय ( द्रोण० १२१ । २६-४६ ) ।
  • दुःशासनकी पराजय ( द्रोण० १२३ । ३१-३४ ) ।
  • राजा अलम्बुषका वध ( द्रोण० १४० । १८ ) ।
  • अद्भुत पराक्रम प्रकट करते हुए अर्जुनके पास इनका पहुँचना ( द्रोण० १४१ । ११ ) ।
  • भूरिश्रवाके साथ युद्धमें पराजित होकर उसके द्वारा इनकी चुटियाका पकड़ा जाना ( द्रोण० १४२ । ५१-५३ ) ।
  • इनके द्वारा आमरण अनशन करके बैठे हुए भूरिश्रवाका वध ( द्रोण० १४३ । ५४ ) ।
  • इनका कौरवोंको उनके अधर्मका उत्तर देना ( द्रोण० १४३ । ६०-६८ ) ।
  • कर्णके साथ युद्धमें उसे पराजित करना ( द्रोण० १४७ । ६४-६५ ) ।
  • इनका सोमरदत्तके साथ युद्ध और सोमरदत्त
  • की पराजय ( द्रोण० १५४ । २९; द्रोण० १५७ । १०-११ ) ।
  • इनके द्वारा सोमरदत्तका वध ( द्रोण० १६३ । ३३ ) ।
  • भूरिका वध ( द्रोण० १६६ । १२ ) ।
  • कर्ण और वृषसेनके साथ युद्ध और वृषसेनको परास्त करना ( द्रोण० १७० । ३०-४३ ) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय ( द्रोण० १७१ । २३ ) ।
  • श्रीकृष्णसे कर्णके अर्जुनपर शक्ति न छोड़नेका कारण पूछना ( द्रोण० १८२ । ३४ ) ।
  • दुर्योधनके साथ संवाद और युद्ध ( द्रोण० १८२ । ३२-४८ ) ।
  • अर्जुनद्वारा इनकी शूरवीरताकी प्रशंसा ( द्रोण० १९१ । ४०-४३ ) ।
  • घृष्टद्युम्नके कुकृत्यकी पृष्ठभूमि के कुकृत्यकी इनके द्वारा निन्दा ( द्रोण० १९८ । ८-२४ ) ।
  • घृष्टद्युम्नको मारनेके लिये गदा लेकर कूद पड़ना तथा भीमसेन और सहदेवद्वारा इनका ऐसा करनेसे रोका जाना ( द्रोण० १९८ । ४६-५१ ) ।
  • कौरवपक्षीय छः महारथियोंको एक साथ भगाना ( द्रोण० २०० । ५३ ) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्ध और मूर्च्छित होना ( द्रोण० २०० । ५६-६९ ) ।
  • इनके द्वारा केकयराजकुमार अनुविन्दका वध ( कर्ण० १२ । ११ ) ।
  • विन्दका वध ( कर्ण० १३ । ३५ ) ।
  • बंगराजका वध ( कर्ण० २२ । १३ ) ।
  • कर्णके साथ युद्ध ( कर्ण० ३० अध्याय ) ।
  • वृषसेनके साथ युद्ध और उसे परास्त करना ( कर्ण० ४८ । ४० के बादसे दा० पा० ४५ श्लोकतक ) ।
  • शकुनिको पराजित करना ( कर्ण० ५१ । ४४-४९ ) ।
  • इनके द्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध ( कर्ण० ६२ । ६ ) ।
  • इनका शल्यके साथ युद्ध ( शल्य० १३ अध्याय; शल्य० १५ अध्याय ) ।
  • इनके द्वारा कृतवर्माकी पराजय ( शल्य० १७ । ७७-७८ ) ।
  • रेणुकाका वध ( शल्य० २० । २६ ) ।
  • रेणुकाका वध ( शल्य० २१ । ८ ) ।
  • कृतवर्माकी पराजय ( शल्य० २१ । २९-३० ) ।
  • संजयका जीवित पकड़ा जाना ( शल्य० २५ । ५०-५८ ) ।
  • इनका संजयको मारनेके लिये उद्यत होना और व्यासजीकी आज्ञासे उसे छोड़ देना ( शल्य० २६ । ३८-३९ ) ।
  • श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरके पास जाना और उनका संदेश सुनाना ( शान्ति० ५३ । १२-१३ ) ।
  • श्रीकृष्णके साथ हस्तिनापुरसे द्वारकाको प्रस्थान ( आश्र० ५२ । ५७-५८ ) ।
  • श्रीकृष्णके साथ रैवतक पर्वतपर होनेवाले महोत्सवमें सम्मिलित होना ( आश्र० ५३ । ३-४ ) ।
  • महोत्सवसे लौटकर अपने भवनमें जाना ( आश्र० ५३ । १७ ) ।
  • इनके द्वारा अभिमन्युका श्राद्ध ( आश्र० ६२ । ६ ) ।
  • युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें हस्तिनापुर आना ( आश्र० ६६ । ३ ) ।
  • इनके द्वारा सुरापान करके मदमत्त होकर कृतवर्माका सोते हुए बालकोंके वधकी चर्चा करते हुए उपहास ( मौसल० ३ । १६-१८ ) ।
  • प्रद्युम्नके अनुमोदन तथा कृतवर्माद्वारा भूमिशयनकी बात कहकर इनका तिरस्कार ( मौसल० ३ । १९-२१ ) ।
  • इनका भगवान् श्रीकृष्णको कृतवर्माद्वारा स्यमन्तक- मणिके अपहरण और सत्राजित्के वधका स्मरण दिलाना और सत्यभामाको रोती देख कोपपूर्वक उठकर तलवारसे कृतवर्माका सिर काट लेना ( मौसल० ३ । २२-२८ ) ।
  • इन्हें दूसरे लोगोंका भी वध करनेकी श्रीकृष्णका इन्हें रोकनेके लिये दौड़ना, भोजों और अन्धकोंका एक मत होकर इन्हें चारों ओरसे घेरकर युद्धके वर्णनमें मारना । इन्हें बचानेके लिये प्रद्युम्नका बीचमें कूद पड़ना । यदु- वंशीय सात्यकिका भोजों और अन्धकोंके साथ जूझना और श्रीकृष्णके देखते-देखते बहुसंख्यक विपक्षियोंद्वारा मारा जाना ( मौसल० ३ । २९-३३ ) ।
  • अर्जुनने इनके प्रिय पुत्र यौयुधानिको सरस्वतीके तटवर्ती देशका अधिकारी एवं निवासी बनाया तथा वृद्धों और बालकोंको उसके साथ कर दिया ( मौसल० ७ । ७ ) ।
  • स्वर्गमें पहुँचकर इनका मरुद्गणोंमें प्रवेश ( स्वर्गारो० ५ । १७-१८ ) ।

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