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सावित्री

  • (१) सूर्यदेवताकी पुत्री एवं ब्रह्माजीकी पत्नी । ये तपतीकी बड़ी बहिन हैं ( आदि० १०० । ७ ) ।
  • ब्रह्माजीकी सभामें विराजमान होती हैं ( सभा० ११ । ३४ ) ।
  • ये गायत्री-मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवी हैं । इन्होंने अग्निहोत्रसे प्रकट होकर अपने आराधक राजा अश्वपतिको प्रत्यक्ष दर्शन एवं वर दिया था ( वन० २९३ । ८-१८ ) ।
  • त्रिपुरदाहके लिये यात्रा करते हुए भगवान् शंकरने इन्हें अपने रथके घोड़ोंकी बागडोर बनाया था ( द्रोण० २०२ । ७५ ) ।
  • उनके संवत्सरमय धनुषकी प्रत्यञ्चा भी ये ही बनी थीं ( कर्ण० ३४ । १६ ) ।
  • एक जापक ब्राह्मणद्वारा किये गये गायत्री-जपसे संतुष्ट होकर इन्होंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन एवं इच्छानुसार वर दिया ( शान्ति० १९९। ५-१६ ) ।
  • विदर्भनिवासी धर्मात्मा तपस्वी सत्यनामक ब्राह्मणके यज्ञमें इनका पदार्पण और पुनः यज्ञभूमिमें प्रवेश ( शान्ति० २७३ । ११-१२ ) ।
  • इनके द्वारा अन्नदानकी महिमाका कथन ( अनु० ६७ । ८-९ ) ।
  • ( २ ) उमादेवीकी अनुगामिनी एक सहचरी ( वन० २३१ । ४९ ) ।
  • ( ३ ) मद्रनरेश अश्वपतिकी कन्या, जो सावित्री देवीके दिये हुए वरदानके अनुसार उन्हें प्राप्त हुई थी ( वन० २९३ । २३-२४ ) ।
  • इसके अद्भुत रूप-सौन्दर्य और तेज आदिका वर्णन ( वन० २९३ । २५-२७ ) ।
  • इसका पिताकी आज्ञासे स्वयं ही अपना पति चुननेके लिये प्रस्थान ( वन० २९३ । ३२-३६ ) ।
  • इसका पिताके पूछनेपर शाल्व नरेशके वनवासी सत्यवान्के वनवासी पुत्र सत्यवान्को पतिरूपमें वरण करनेकी बात बताना । नारदजीद्वारा उसके अल्पायु होनेकी बात सुनकर भी इसका सत्यवान्के साथ ही विवाह करनेका दृढ़ निश्चय ( वन० २९५ । २-२७ ) ।
  • सावित्रीका सत्यवान्के साथ विवाह तथा इसका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना ( वन० २९५ अध्याय ) ।
  • सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सत्यवान्के साथ इसका वनमें जाना ( वन० २९६ अध्याय ) ।
  • यमराजके साथ इसका वार्तालाप और उनसे इसको वर एवं मरे हुए पतिको पुनर्जीवनकी प्राप्ति ( वन० २९७ । ११-६० ) ।
  • सत्यवान्के साथ इसका वार्तालाप ( वन० २९७ । ६५-१०२ ) ।
  • पतिको साथ लेकर इसका आश्रमकी ओर प्रस्थान ( वन० २९७ । १०७ ) ।
  • आश्रममें पहुँचकर इसका ऋषियोंके समक्ष वनका सारा वृत्तान्त बतलाना ( वन० २९८ । २०-४२ ) ।
  • इसके श्वसुरको राज्यकी प्राप्ति तथा पतिका युवराजपदपर अभिषेक । इसको सौ पुत्रों तथा सौ भाइयोंकी प्राप्ति ( वन० २९९ अध्याय ) ।
  • इसके पातिव्रत्यकी प्रशंसा ( विराट० २९ । १५ ) ।
  • ( ४ ) एक धर्मपरायणा राज-पत्नी, जिसने दो दिव्य कुण्डलोंका दान करके उत्तम लोक प्राप्त किया था ( शान्ति० २३४ । २४ ) ।
  • ( सम्भव है यह सत्यवान्की पत्नी रही हो ) ।

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