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सुलभा

  • एक संन्यासिनी कुमारी, जो योगधर्मके अनुष्ठानद्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही इस पृथ्वीपर विचरण करती थी ( शान्ति० ३२० । ७ ) ।
  • इसने त्रिदण्डी मोक्ष-तत्त्वकी जानकारीके विषयमें मिथिलापति राजा जनककी प्रशंसा सुनी । सुनकर इसके मनमें उनके दर्शनका संकल्प हुआ । इसने योग-शक्तिसे अपना पहला शरीर छोड़कर दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया । फिर यह पलभरमें विदेह देशकी राजधानी मिथिलामें जा पहुँची । वहाँ इसने भिक्षा लेनेके बहाने मिथिलेश्वरका दर्शन किया । राजाने इसका स्वागत-पूजन करके अन्न देकर संतुष्ट किया । तदनन्तर यह योग-शक्तिसे उनकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो गयी और उनके मनको बाँध लिया । फिर एक ही शरीरमें रहकर राजा और सुलभाका परस्पर संवाद आरम्भ हुआ । राजाद्वारा अयोग्य एवं असङ्गत वचनोंद्वारा इसका तिरस्कार ( शान्ति० ३२० । ८-७५ ) ।
  • राजाके वचनोंसे विचलित न होकर इसने विद्वत्तापूर्ण भाषणद्वारा उन्हें उत्तर दिया और अपना परिचय देते हुए कहा— मैं राजर्षिप्रधानके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ । अविच्छिन्न हूँ । मैंने अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया है । मेरा नाम सुलभा है । मैं सदा स्वधर्ममें स्थित रहती हूँ ( शान्ति० ३२० । ७६-१२२ ) ।

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