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सूर्य

  • (१) भगवान् सूर्य या सविता । दिव; पुत्र आदि बारह नाम विवस्वान् ( सूर्य ) के ही बोधक माने गये हैं । इनमें अन्तिम नाम रवि है । रविको 'महा' कहा गया है । उनके पुत्र देवभ्राट् ( आदि० ९ । १४२—४३ ) ।
  • छलसे अमृतपान करते हुए राहुके गुण भेदका इनके द्वारा उद्घाटन हुआ ( आदि० १९ । ५ ) ।
  • इसीसे इनके प्रति राहुकी शत्रुता हो गयी ( आदि० १९ । ९ ) ।
  • राहुसे पीड़ित हो जगत्के विनाशके लिये संकल्प हुआ ( आदि० २४ । १० ) ।
  • फिर देवताओंकी प्रेरणासे अरुणने इनका सारथ्य ग्रहण किया ( आदि० २४ । २० ) ।
  • कश्यपके द्वारा आदिके गर्भसे प्रकट बारह आदित्य इन्हींके स्वरूप हैं ( आदि० ६५ । १४—१५ ) ।
  • इनकी भार्या त्वष्टाकी पुत्री 'संज्ञा' देवी हैं ( आदि० ६६ । ३५ ) ।
  • इनके द्वारा कुन्तीके गर्भसे कर्णका जन्म ( आदि० ११० । १८ ) ।
  • वसिष्ठजीद्वारा इनकी स्तुति ( आदि० १७२ । ८ के बाद दा० पाठ ) ।
  • वसिष्ठकी प्रार्थनापर इनके द्वारा अपनी पुत्री तपतीका संवरणके लिये समर्पण ( आदि० १७७ । २६ ) ।
  • धौम्यद्वारा युधिष्ठिरको सूर्यदेवके एक सौ आठ नामोंका उपदेश, युधिष्ठिरद्वारा इनकी पूजा, उपासना और पूर्वोक्त नामोंका जप एवं स्तुति । इससे संतुष्ट होकर इनका उन्हें दर्शन एवं अठारहवें वर्षमें राज्य प्राप्त होनेका आशीर्वाद प्रदान करना ( वन० ३ । १५—७४ ) ।
  • धौम्यद्वारा इनकी गतिका वर्णन ( वन० १९३ । २८—४२ ) ।
  • कर्णको स्वप्नमें दर्शन देकर इनका इन्द्रको कवच-कुण्डल न देनेका आदेश देना ( वन० ३०० । १०—२०; वन० ३०१ अध्याय ) ।
  • कर्णसे इनकी शक्ति लेकर ही कवच-कुण्डल देनेकी सम्मति देना ( वन० ३०१ । २९—१७ ) ।
  • कुन्तीके आवाहनपर प्रकट होना और उनके साथ वार्तालाप करना ( वन० ३०९ । ८—२८ ) ।
  • कुन्तीके उदरमें इनके द्वारा गर्भस्थापन ( वन० ३०९ । २८ ) ।
  • द्रौपदीद्वारा भगवान् सूर्यकी उपासना और इनका द्रौपदीकी रक्षाके लिये अदृश्यरूपसे एक राक्षसको नियुक्त कर देना ( विराट० १५ । १९-२० ) ।
  • जिधर सूर्यका उदय हो वही पूर्व दिशा है । पूर्व दिशा ही सूर्यमार्गका द्वार है ( उद्योग० १०८ । ३-५ ) ।
  • ये दूसरोंका अहित करनेवाले कृतघ्न असुरोंका क्रोधपूर्वक विनाश करते हैं ( उद्योग० १०८ । १६ ) ।
  • पूर्वकालमें भगवान् सूर्यने वेदोक्त विधिसे यज्ञ करके आचार्य कश्यपको दक्षिणारूपमें जिस दिशाका दान किया था, उसे दक्षिण दिशा कहते हैं ( उद्योग० १०९ । १ ) ।
  • जिसमें दिनके पश्चात् सूर्यदेव अपनी किरणोंका विसर्जन करते हैं वही पश्चिम दिशा है ( उद्योग० १०९ । २ ) ।
  • कर्णके प्रति कुन्तीके कथनका सूर्यद्वारा समर्थन ( उद्योग० १४६ । १-२ ) ।
  • इनके विस्तार आदिका वर्णन ( भीष्म० १२ । ४४-४५ ) ।
  • कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धमें कर्णकी विजयके लिये इन्द्रसे इनका विवाद ( कर्ण० ८० । ५७-५९ ) ।
  • इनके द्वारा स्कन्दको पार्षद प्रदान ( शल्य० ४५ । ३१ ) ।
  • महादेवजीने इन्हें तेजस्वी ग्रहोंका अधिपति बनाया ( शान्ति० ११२ । ३१ ) ।
  • इन्होंने याज्ञवल्क्यको वेद-ज्ञानका वरदान दिया ( शान्ति० ३१८ । ६-१२ ) ।
  • महाभयनामक नागमें इनका उच्च एवं शिलवृत्तिकी महिमाका वर्णन करना ( शान्ति० ३६३ अध्याय ) ।
  • कार्तिकेयको सुन्दर कान्तिकी भेंट देना ( अनु० ६६ । २३ ) ।
  • महर्षि जमदग्निने ब्रह्मा-प्रार्थना करके इनकी शरणमें आना ( अनु० ९५ । २० से ९६ । ७ तक ) ।
  • जमदग्नि ऋषिकों छाता और जूता देना ( अनु० ९६ । १४-१५ ) ।
  • देवासुर-संग्राममें राहुद्वारा सूर्य और चन्द्रमाके घायल होनेमें सब ओर अन्धकार छा गया । देवतालोग असुरोंद्वारा मारे जाने लगे । उस समय देवताओंकी प्रार्थनासे अत्रिसुनिने चन्द्रमाका वध धारण किया और सूर्यदेवको तेजस्वी बनाया था ( अनु० ९६ । २-१० ) ।
  • कुन्तीने व्यासजीके समक्ष अपने गर्भमें सूर्यदेवद्वारा कर्णकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाया था ( आश्रम० ३० अध्याय ) ।
  • (२) एक विख्यात दानव, जो कश्यपद्वारा कद्रूके गर्भमें उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६५ । २६ ) ।
  • यह राजा दरदके रूपमें पृथ्वीपर पैदा हुआ था ( आदि० ६७ । ५८ ) ।

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