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संजय

  • (१) एक प्राचीन नरेश ( आदि० ९ । १२५ ) ।
  • ये यमसभामें रहकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ( सभा० ८ । १५ ) ।
  • दिवितिके पुत्र, जिनके पर्वत और नारद ये दोनों ऋषि मित्र थे ( द्रोण० ५५ । ५ ) ।
  • इनका नारदको अपनी कन्या देना स्वीकार करना ( द्रोण० ५५ । १३ ) ।
  • पुत्रकी कामनासे ब्राह्मणोंकी आराधना करना ( द्रोण० ५५ । १८-१९ ) ।
  • नारदजीसे पुत्रप्राप्तिका वर माँगना ( द्रोण० ५५ । २२-२३ ) ।
  • इन्हें सुवर्णश्रीवी नामक पुत्रकी प्राप्ति ( द्रोण० ५५ । २४ ) ।
  • लुटेरोंद्वारा मारे जानेपर इनका पुत्रके शोकमें विलाप करना ( द्रोण० ५५ । ३३-३४ ) ।
  • इन्हें नारदजीका षोडशराजकीयोपाख्यान सुनाकर समझाना ( द्रोण० ५५ । ३६ से द्रोण० ७१ । ३ तक ) ।
  • नारदजीके समझानेसे इनका शोकरहित होना ( द्रोण० ७१ । ५ ) ।
  • नारदजीके प्रभावमें इनके पुत्रका जीवित प्रकट होना ( द्रोण० ७१ । ८ ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको समझानेके लिये नारद-संजय-संवादको प्रस्तुत करके 'षोडशराजकीयोपाख्यान' सुनाना ( शान्ति० २९ अध्याय ) ।
  • संजयका पर्वत मुनिसे पुत्र-प्राप्तिके लिये वर माँगना ( शान्ति० ३१ । १५ ) ।
  • इन्हें सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्रकी प्राप्ति ( शान्ति० ३१ । २३ ) ।
  • पुत्रकी मृत्युपर इनका विलाप ( शान्ति० ३१ । ३७ ) ।
  • नारदजीकी कृपासे पुनः इनके पुत्रका जीवित होना ( शान्ति० ३१ । ४२ ) ।
  • इन्होंने जीवनमें कभी मांस नहीं खाया था ( अनु० ११५ । ६३ ) ।
  • ( २ ) एक दक्षिणभारतीय जनपद ( भीष्म० ९ । ६३ ) ।

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