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इन्द्र -

  • ( १ ) कश्यप से उनकी पत्नी अदिति के गर्भ से जो बारह आदित्य उत्पन्न हुए, उनमें इन्द्र प्रमुख हैं ( आदि० ६५।१५-१६; ७०।१-११ ) ।
  • ये वज्रधारी, वृत्रहन्ता, पुरंदर तथा तीनों लोकों के स्वामी हैं ( आदि० ३।१४८-१४९ )।
  • देवश्रेष्ठ और सहस्राक्ष हैं ( आदि० २५।१-१३ ) ।
  • तक्षक द्वारा अपहृत हुए मदयन्ती के कुण्डलों को प्राप्त कराने में इन्होंने उत्तङ्ग की सहायता की ( आदि० ३।१३१ ) ।
  • उत्तङ्ग द्वारा इनकी स्तुति ( आदि० ३।१४६-१४९ ) ।
  • समुद्रमन्थन से इन्हें ऐरावत की प्राप्ति हुई ( आदि० १८।४० ) ।
  • कद्रू द्वारा इनकी स्तुति ( आदि० २५।७-१० ) ।
  • इनके द्वारा की हुई बर्बर सर्पों की प्रशंसा ( आदि० २६ अ०८ ) ।
  • इनके द्वारा वालखिल्य ऋषियों का अपमान ( आदि० ३९।१० ) ।
  • गरुड़ के ऊपर इनका वज्रप्रहार और उनसे मित्रता स्थापित करने की इच्छा ( आदि० ६३।१८-२५ ) ।
  • इन्द्र और गरुड़ की मित्रता ( आदि० ३४।९ ) ।
  • सर्पों से छलपूर्वक अमृत का अपहरण ( आदि० ३४।८-२० ) ।
  • इनका तक्षक को आश्वासन ( आदि० ५२।१५-१७ ) ।
  • इनके द्वारा कुन्ती के गर्भ से अर्जुन की उत्पत्ति ( आदि० ६३।११४ )।
  • इनका ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण से कवच-कुण्डल माँगना ( आदि० ६०।१४४-१४५ ) ।
  • विश्वामित्र का तप भंग करने के लिये मेनका अप्सरा को भेजना ( आदि० ७१।२१-२६ ) ।
  • वायु का रूप धारण करके इनके द्वारा जलक्रीड़ा करती हुई देवयानी आदि कन्याओंके बछोंका सम्मिश्रण (आदि० ७८ । ४)।
  • इनका ययातिके साथ वार्तालाप और उन्हें स्वर्गसे नीचे गिराना (आदि० ८८। १-५)।
  • पाण्डुद्वारा इन्द्रकी आराधना तथा इन्द्रका उन्हें वरदान (आदि० ११२। २५-२७)।
  • कुन्तीद्वारा इनका आवाहन तथा इनके द्वारा अर्जुनका जन्म (आदि० १२२। ३५)।
  • ‘जानपदी’ नामक अप्सराको भेजकर इनका शरद्वान् ऋषिके तपस्यामें विघ्न डालना। (आदि० १९६ । १-६)।
  • शिवजीद्वारा इनका हिमालयकी गुफामें अवरोध और मनुष्यलोकमें अर्जुनरूपमें जन्म लेनेके लिये इन्हें आदेश (आदि० १९६ । २-६)।
  • पाण्डवोंके निवासके लिये खाण्डवप्रस्थमें दिव्यनगरके निर्माणहेतु इनको श्रीकृष्णकी मानसिक प्रेरणा तथा विश्वकर्माको आदेश (आदि० २०६। २८ के बाद दा० पाठ)।
  • तिलोत्तमाके रूपमें मोहित होकर इनका सहस्रनेत्र होनेका (आदि० २३०। २७)।
  • खाण्डव वनकी रक्षाके लिये इनका श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके साथ युद्ध (आदि० २२६ अ० में)।
  • इनके द्वारा तक्षकके पुत्र अश्वसेनकी रक्षा (आदि० २२६ । ९)।
  • अर्जुन- द्वारा इनकी पराजय (आदि० २२०। २३)।
  • श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको इनका वरदान (आदि० २२३। १०- १२)।
  • नारदजीद्वारा इनकी दिव्य सभाका युधिष्ठिरके प्रति वर्णन (सभा० ७ अ० में)।
  • भगवान् श्रीकृष्ण- द्वारा इनका मानमर्दन, इनके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका 'गोविन्द' नामकरण ( सभा० २८ । २९ के बाद दक्षिणात्य पाठ )।
  • नरकासुरको मारनेके लिये इनकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना (वन० ७६ । १० पाठ)।
  • इनका सुरभिसे वार्तालाप (वन० ९।६-१६)।
  • इनके द्वारा अर्जुनको दिव्यास्त्र देनेकी स्वीकृति (वन० ३७। ५०-५८)।
  • इनका अर्जुनको स्वर्गमें चलनेका आदेश (वन० ४३ । ४३-४५)।
  • इनके द्वारा चित्रसेनको अर्जुनके लिये संगीतविद्याकी शिक्षा देनेका आदेश (वन० ४४ । ८)।
  • इनका अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये चित्रसेनको उर्वशीके पास भेजना (वन० ४४ । २)।
  • उर्वशीने शाप देनेपर इनके द्वारा अर्जुनको आश्वासन (वन० ४६ । ५५-५८)।
  • इनका नर- नारायणकी महिमा बतलाते हुए लौमश मुनिको युधिष्ठिरके पास संदेश देनेके लिये भेजना (आदि० ४०। १०-३१)।
  • इनका नलद्वारा दमयन्तीको संदेश देना (वन० ५५ । ६)।
  • इनके द्वारा दमयन्ती-स्वयंवरमें राजा नलको वर- प्रदान (वन० ५७ । ३५-३६)।
  • इनका कलियुगको नलके प्रति अन्याय करनेसे रोकना (वन० ५८ । १९- २२)।
  • इनके द्वारा वृत्रासुरका वध (वन० १०९ । १७-१९)।
  • इनका महर्षि च्यवनकर वज्र-प्रहार करनेको उद्यत होना (वन०१२४ । १०)।
  • मदासुरसे डरे हुए इन्द्रका अग्निकुमारोंको सोमपानका अधिकारी बनाना (वन० १२५ । १-५)।
  • इनका युवाश्वकुमार मान्धाताको अँगुलि पिलाना (वन० १२६ । ३०; द्रोण० ६२ । ७-८)।
  • इनका वाज बनकर उशीनरसे कबूतरके बराबर तौलकर मांस माँगना (वन० १३२ । २३-२४)।
  • इनके द्वारा राजा उशीनरको वर-प्रदान (वन० १३३ । ३०-३१)।
  • इनका यवक्रीतिको वर-प्रदान (वन० १३५ । ४१-४२)।
  • नरकासुरको मारनेके लिये इनकी विष्णुसे प्रार्थना (वन० १४२ । २४)।
  • इनके द्वारा गन्धमादन पर्वतपर युधिष्ठिरको आवाहन (वन० १६६ । १३-१४)।
  • हिरण्यपुरके विनाशके उपलक्ष्यमें इनके द्वारा अर्जुनका अभिनन्दन (वन० १७२। १०२-०५)।
  • इनका महर्षि बकसे चिरजीवियोंके सुख-दुःखके विषयमें (वन० १९३ अ० में) प्रश्न।
  • वाजरूपसे राजा शिविसे वार्तालाप तथा उनसे कबूतरके बराबर मांस माँगना (वन० १९७ । २०)।
  • इनके द्वारा केशी दानवकी पराजय और देवसेनाका उद्धार (वन० २२३ । १५)।
  • देवसेनाके साथ ब्रह्माके पास जाना (वन० २२४ । २२-२३)।
  • स्कन्दद्वारा पराजित होकर इनकी शरणमें जाना (वन० २२७ । १७-१८)।
  • स्कन्दको देवसेनापति-पदपर अभिषेक करना (वन० २२९ । २३)।
  • स्कन्दको देवसेनाके साथ पाणिग्रहणके लिये कहना (वन० २२९ । ४८)।
  • रावणके पुत्र इन्द्रजित्से इनकी पराजयकी चर्चा (वन० २८८ । ३)।
  • कर्णसे उसका कवच-कुण्डल माँगना (द्रोण० ३१० । ४)।
  • कर्णको अपनी अमोघ शक्ति देना (द्रोण०३१०। २३)।
  • त्रिशिराको तरसे हिं गानेके लिये अप्सराओंको भेजना (उद्योग० ९ । १२-१४)।
  • इनके द्वारा त्रिशिराका वध (उद्योग० ९ । १२-१४)।
  • त्रिशिराके सिर काटनेके लिये इनके द्वारा बड़ईको वरदान (उद्योग० ९ । ३०)।
  • त्रिशिराके वधसे लगी हुई ब्रह्महत्याका विभाजन (उद्योग० ९ । ४३ के बाद० पाठ)।
  • इनका वृत्रासुरके मुखसे बाहर निकलना (उद्योग० ९ । ५४)।
  • भगवान् विष्णुके कहनेसे वृत्रासुरके साथ इनकी मैत्री (उद्योग० ९ । १२)।
  • इनके द्वारा वृत्रासुरका वध (उद्योग० ९ । १३)।
  • इनका ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना (उद्योग० १० । ४६)।
  • इनके द्वारा ब्रह्महत्याका विभाजन (उद्योग० १३ । १५)।
  • इनका प्रकट होकर पुनः नहुषके भयसे अन्तर्धान होना (उद्योग० १३ । २१- २२)।
  • इनका लोकपालोंको उनका अधिकार प्रदान करना ( उद्योग० १६ । ३१-३४ )।
  • अगस्त्यजीसे नहुषके पतनका वृत्तान्त पूछना ( उद्योग० १० । ६ )।
  • इनका महर्षि अङ्गिराको वरदान ( उद्योग० १० । ८ )।
  • स्वर्गमें आकर इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होना ( उद्योग० १० । ९ )।
  • मातलिका जामाता नागकुमार सुमुलको भगवान् विष्णुकी आज्ञासे दीर्घायु बनाना ( उद्योग० १०४ । २८ )।
  • शिवद्वारा दिव्यकवचकी प्राप्ति, उससे सुरक्षित होकर इनका वृत्रको मारना तथा मन्त्र और विधिसहित वह कवच अङ्गिराको देना ( द्रोण० ९४ । ६४-६६ )।
  • इन्द्रके लिये विश्वकर्माद्वारा विजय नामक धनुषका निर्माण तथा इन्द्रका उसे परशुरामको समर्पण करना ( कर्ण० ३९ । ४२-४४ )।
  • त्रिपुरोंसे भयभीत होकर इनका देवताओंसहित ब्रह्माके पास ( कर्ण० ३३ । ३७-४० )।
  • कर्ण और अर्जुनके द्वैप-युद्धमें अर्जुनकी विजयके लिये इनका सूर्यसे विवाद ( कर्ण० ८० । ५०-५३ )।
  • इन्द्रके अनुरोधसे ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा अर्जुनकी विजय घोषणा ( कर्ण० ८० । ६८-७३ )।
  • नमुचिके वधसे संकटमें पड़े हुए इन्द्रका अरुणास्रवमें स्नान करनेसे उद्धार ( शल्य० ४३ । ४३-४५ )।
  • इनके द्वारा स्कन्दको 'उल्लोका' और 'षडङ्क' नामक दो अनुचर-प्रदान ( शल्य० ४५ । ३५-३६ )।
  • स्कन्दको शक्ति नामक अस्त्र और घण्टाका दान ( शल्य० ४६ । ४४-४५ ) ।
  • इनके द्वारा भरद्वाजकन्या श्रुतावर्तीका परीक्षा और उसे वर-प्रदान ( शल्य० ४८ । २४-२८ )।
  • इन्द्रातीर्थमें सौ यज्ञ करनेसे इनका 'शतक्रतु' नाम होना ( शल्य० ४९ । २-४ )।
  • कुरुक्षेत्रकी भूमि जोतते हुए राजर्षि कुरुके साथ इनका संवाद ( शल्य० ५३ । ५-१५ )।
  • पक्षीरूपसे आकर इनका तपस्वियोंको गृहस्थ-धर्मका उपदेश ( शान्ति० ७१ । ११-२६ )।
  • इनका रन्ति-देवको वरदान ( शान्ति० २९ । १२०-१२१ )।
  • बृहस्पतिजीसे समस्त प्राणियोंके लिये प्रिय होनेका उपाय पूछना ( शान्ति० ८४ । २ )।
  • अम्बरीषके पूछनेपर इनका उनके सेनापति सुदेवकी सदृशिका कारण बताना ( शान्ति० ९८ । ११ के बाद दक्षि० पाठ से १३ तक )।
  • अम्बरीषके पूछनेपर इन्द्रका उनसे रणयज्ञका वर्णन करना ( शान्ति० ९८ । १९-५० )।
  • बृहस्पतिजीसे विजयप्राप्तिके उपाय पूछना ( शान्ति० १०३ । ४-५ )।
  • प्रह्लादसे बाल शीलीकी शिक्षाके लिये शिष्य-रूपसे निवास और वररूपसे उसकी प्राप्ति ( शान्ति० १२४ । २८-६२ )।
  • विरोधाक्षको राजधर्मके शापकी कथा सुनाना ( शान्ति० १०३ । ८-१० )।
  • राजधर्मके कहनेसे गौतमको जीवन-दान देना ( शान्ति० १०३ । १२-१३ )।
  • आत्महत्याके लिये उद्यत काश्यपको सियारके रूपमें प्रकट होकर समझाना ( शान्ति० १८० अ० में )।
  • प्रह्लादके साथ इनका ज्ञानविषयक संवाद ( शान्ति० २२२ । १-३७ )।
  • ब्रह्मासे बलिका पता पूछना ( शान्ति० २२३ । ३-७ )।
  • बलिपर आक्षेप ( शान्ति० २२३ । १३-२५; शान्ति० २२४ । २-४ )।
  • लक्ष्मीके साथ संवाद और उनकी सुप्रतिष्ठा ( शान्ति० २२५ । ५-२९ )।
  • बलिको जीवित चले जानेकी आज्ञा देना ( शान्ति० २२५ । ३३-३६ )।
  • नमुचिसे उसके श्रीहीन होनेपर भी दुःखित न होनेका कारण पूछना ( शान्ति० २२६ । ३ )।
  • राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट होनेपर भी बलिको शोक न करनेका कारण पूछना ( शान्ति० २२७ । १४-१९ )।
  • बलिका उत्तर सुनकर उसकी बातोंका समर्थन और उसे अभय-दान ( शान्ति० २२७ । ८४-११९ )।
  • नारदजीके साथ लक्ष्मीका दर्शन ( शान्ति० २२८ । १६-१८ )।
  • असुरोंको त्यागकर आनेके विषयमें लक्ष्मीसे प्रश्न ( शान्ति० २३८ । २८ )।
  • लक्ष्मीको साथ लेकर अमरावतीमें प्रवेश ( शान्ति० २२८ । ८९ )।
  • इनके द्वारा अपनी पत्नी अहल्याकी धर्षणकी गौतमद्वारा चर्चा ( शान्ति० २६६ । ४०-५१ )।
  • इनका वृत्रासुरके साथ युद्ध और मोहित होना ( शान्ति० २६९ । १२-२१ )।
  • देवताओं और ऋषियोंके प्रोत्साहनसे इनके
  • द्वारा वृत्रासुरका वध ( शान्ति० २८२ । ९ )।
  • ब्रह्म-हत्याके भयसे भागना और कमलनालमें छिपना ( शान्ति० २८२ । ११-१८ )।
  • ब्रह्माद्वारा इन्हें ब्रह्महत्यासे छुटकारा प्राप्त होना ( शान्ति० २८२ । ५६ )।
  • अहल्यापर बलात्कारके कारण गौतमके शापसे इनकी दाढ़ी-मूँछ हरी हो गयी और विश्वामित्रके शापसे इन्हें अपना अण्डकोश खो देना पड़ा; जिससे मेढ़ेके अण्डकोश जोड़े गये ( शान्ति० ३४२ । २३ )।
  • इन्हें दूसरी ब्रह्महत्या लगी ( शान्ति० ३४२ । ४२ )।
  • नारदजीसे अद्भुत घटनाके विषयमें इनका प्रश्न करना ( शान्ति० ३५२ । ७-९ )।
  • एक तोतेके साथ संवाद ( अनु० ५ । १३-२८ )।
  • राजर्षि भङ्गास्वनको स्त्री बना देना ( अनु० ५ । ४३-५० )।
  • भङ्गास्वनके दो पुत्रोंमें फूट डालना ( अनु० १२ । २५-३१ )।
  • भङ्गास्वनपर प्रसन्न होकर वर देना ( अनु० १२ । ४२-५३ )।
  • मतङ्गको तपस्यासे विरत करनेके प्रसंगमें उसके साथ संवाद ( अनु० २० । २७ से २९ । १२ तक )।
  • मतङ्गको वरदान देना ( अनु० २१ । २४-२५ )।
  • शम्बरसुरसे व्यवहारके विषयमें प्रश्न ( अनु० ३६ । ३ )।
  • महर्षि देवशर्माकी पत्नी रुचिको प्रलोभन देना और विष्णुद्वारा फटकार पाना ( अनु० ४१ । ७-२६ )।
  • बृहस्पतिजीसे उत्तम दानके विषयमें पूछना (अनु० ६२।५३)।
  • ब्रह्माजीसे गोलोक और गोदानके विषयमें प्रश्न (अनु० ७२।१६-१२) ।
  • ब्रह्माजीसे दूसेरेकी गौका अपहरण करनेके फलके सम्बन्धमें प्रश्न (अनु० ७४।१)।
  • ब्रह्माजीसे गोलोककी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न (अनु० ८३।१३- १४) ।
  • कार्तिकेयको भेंट समर्पित करना (अनु० ८६।२५) ।
  • अगस्त्यजीको अपना परिचय देकर कमलकी चोरीका कारण बताना (अनु० ९४।४०-४१)।
  • मातलिके पूछनेपर सनत्के वन्दनीय पुत्रिका परिचय देना (अनु० ९६।२२ के बाद दा० पाठ)।
  • धृतराष्ट्रके रूपमें इनके द्वारा गौतमनामक ब्राह्मणके हाथीका अपहरण कर लिये जानेपर इनके साथ संवाद (अनु० १०२।७-६१)।
  • महर्षि विबुधप्रभको पापसे छूटनेका उपाय बताना (अनु० १२५।४६-५०)।
  • बृहस्पतिजीसे धर्मके विषयमें जिज्ञासा (अनु० १२५। ५१) ।
  • अश्विनीकुमारोंके निमित्त च्यवनके साथ संघर्ष (अनु० १५६।१६-३१)।
  • पक्षिवाले बालकके रूपमें शिवजीपर वज्र प्रहार करते समय इनकी बाँहका स्तम्भित होना और शिवजीकी कृपासे पुन: इनका संकटमुक्त होना (माअनु० १६०।३३-३६)।
  • बृहस्पतिजीको मरुत्का यज्ञ करानेसे रोकना (आश्र० ५।१८-२१)।
  • बृहस्पतिजीसे उनकी चिन्ताका कारण पूछना (आश्र० ९।१-५) ।
  • अग्निको दूत बनाकर मरुत्के पास संदेश भेजना (आश्र० ९।८)।
  • गन्धर्वराज धृतराष्ट्रको दूत बनाकर मरुत्के पास भेजना (आश्र० ९।१२)।
  • मरुत्पर वज्र-प्रहार करनेको उद्यत होना (आश्र० ९।१८) ।
  • मरुत्के यज्ञमें जाना (आश्र० ९।२०)।
  • यज्ञमण्डपकी व्यवस्था करना (आश्र० ९।२६-३०)।
  • इनके द्वारा शरीस्थ वृत्रासुरका संहार (आश्र० ९।११) ।
  • चाण्डालरूपसे उत्तङ्कको अमृत पिलानेके लिये प्रकट होना (आश्र० ५५।१८-१९)।
  • मुनिने इनकार करनेपर अन्तर्धान होना (आश्र० ५५।२२)।
  • ब्राह्मणका रूप धारण करके उत्तङ्ककी सहायता करना (आश्र० ५८।३२-३३) ।
  • उत्तङ्क मुनिके दंडेमें वज्रास्त्रका संयोग करना (आश्र० ५८।३५)।
  • इनके द्वारा स्वर्गमें श्रीकृष्णका स्वागत (मौसल० ४।२८)।
  • इन्द्रका युधिष्ठिरको अपने रथपर बैठाकर संदह स्वर्ग चलनेके लिये कहना और उनके आतिथ्यवात्सल्यकी परीक्षा करना (महाप्रस्था० ३।२१-२९)।
  • धर्मप्रेरित इन्द्रके द्वारा युधिष्ठिरकी पुन: परीक्षा-देवदूतद्वारा उन्हें मायामय नरकका दर्शन करवाना (स्वर्ग० २ अ०में)।

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