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स्वर्ग

  • पुण्य कर्मोंसे प्राप्त होनेवाला देवलोक, जिसमें इन्द्रलोक प्रधान है । राजा ययाति स्वर्गलोकमें जाकर देवभवनमें निवास करते थे । वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा सत्कार किया था । वहाँ इन्द्रके साथ बातचीत करनेका उन्हें अवसर मिला था ( आदि० ८७ । १-३ ) ।
  • स्वर्गलोकमें जो रमणीय इन्द्रपुरी है, वह सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे सुशोभित है । वहाँ ययातिने एक हजार वर्षोंतक निवास किया था । वहाँ नन्दनवन है, जहाँ इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करते हुए वे दस लाख वर्षोंतक रहे ( आदि० ८९ । १६, १९ ) ।
  • साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात बड़े दरवाज़े बतलाते हैं, जिनके द्वारा प्राणी इसमें प्रवेश करते हैं—तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया ( आदि० ९० । २२ ) ।
  • स्वर्गमें जो इन्द्रकी सभा है, उसकी लंबाई डेढ़ सौ और चौड़ाई सौ योजनकी है । वह आकाशमें विचरनेवालों और इच्छाके अनुसार मन्द या तीव्र गतिसे चलनेवाली है । उसकी ऊँचाई भी पाँच योजन है । उसमें बुढ़ापा, शोक और थकावटका प्रवेश नहीं है । वहाँ भय नहीं है । वह मङ्गलमयी और दिव्य शोभासे सम्पन्न है । उसमें ठहरनेके लिये सुन्दर-सुन्दर महल और बैठनेके लिये उत्तमोत्तम सिंहासन बने हुए हैं । वह रमणीय सभा दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित है । वहाँ इन्द्राणी शची और स्वर्गलोककी लक्ष्मीके साथ देवराज इन्द्र सर्वश्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान होते हैं । गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य, वाद्य एवं गीतोंद्वारा उनका मनो-रञ्जन करती हैं ( सभा० ७ अध्याय ) ।
  • स्वर्गमें राजसूय यज्ञके प्रभावसे राजा हरिश्चन्द्रको सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त
  • हुई थी । उसे देखकर राजा पाण्डु चकित हो गये थे और उन्होंने नारदजीके द्वारा युधिष्ठिरके पास राजसूय यज्ञ करनेके लिये संदेश भेजा था ( सभा० १२ । २३-२६ ) ।
  • सत्यभामाने श्रीकृष्णके साथ स्वर्गमें जाकर वहाँका वैभव देखा था और वहाँ उन्हें देवमाता अदिति का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८११-८१२ ) ।
  • अर्जुनने स्वर्गलोक को जाते समय ऊपर सहस्रों अद्भुत विमान देखे । वहाँ न सूर्य प्रकाशित होते हैं न चन्द्रमा । अग्निकी प्रभा भी वहाँ काम नहीं देती है । स्वर्गके निवासी अपने पुण्य कर्मोंसे प्राप्त हुई अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होते हैं । स्वर्गेश्वर अर्जुनको सुन्दर विजयी गजराज ऐरावत खड़ा दिखायी दिया; जिसके चार दाँत बाहर निकले थे ( वन० ४२ । ४० ) ।
  • सिद्धों और चारणोंसे सेवित रमणीय अमरावतीपुरी सभी वृक्षोंसे फूलों और पुण्यमय वृक्षोंसे सुशोभित है । अप्सराओंसे सेवित नन्दनवनकी शोभा अद्भुत है, जो तपस्या और अग्निहोत्रसे दूर रहे हैं, जिन्होंने युद्धमें पीठ दिखा दी है, वैसे लोग पुण्यात्माओंके उस लोकका दर्शन नहीं कर सकते हैं । जो यज्ञ, व्रत, वेदाध्ययन, तीर्थस्नान और दान आदि सत्कर्मोंसे वर्जित हैं, शराबी, गुरुपत्नीगामी, मांसाहारी तथा दुरात्मा हैं, वे भी उस दिव्यलोकका दर्शन नहीं पा सकते । देवताओं, सिद्धों और महर्षियोंने वहाँ अर्जुनका स्वागत-सत्कार किया । अप्सराओंने नृत्य और गीतोंद्वारा उनका मनोरंजन किया ( वन० ४३ अध्याय ) ।
  • जिसे स्वर्गलोक कहते हैं, वह यहाँसे बहुत ऊपर है । वहाँ पहुँचनेके लिये ऊपरको आया जाता है; इसलिये उसका एक नाम ऊर्ध्वग भी है । वहाँ जानेके लिये जो मार्ग है, वह बहुत उत्तम है । वहाँके लोग सदा विमानोंपर विचरा करते हैं । जिन्होंने तपस्या नहीं की है, बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन नहीं किया है तथा जो असत्यवादी एवं नास्तिक हैं, वे उस लोकमें नहीं जा पाते हैं । धर्मात्मा, मनको वशमें रखनेवाले, शम-दमसे सम्पन्न, ईर्ष्यारहित, दान-धर्मपरायण तथा युद्धकलामें प्रसिद्ध शूरवीर मनुष्य ही वहाँ सद धर्मोंमें श्रेष्ठ इन्द्रियसंयम और मनोनिरग्रहरूपी योगको अपनाकर सत्पुरुषोंद्वारा सेवित पुण्यवानोंके लोकोंमें जाते हैं । वहाँ देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, यम, धाम, गन्धर्व तथा अप्सरा—इन सब देवसमूहोंके अलग-अलग अनेक प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंसे सम्पन्न, तेजस्वी तथा मङ्गलकारी हैं । स्वर्गमें तैंतीस हजार योजनका सुवर्णमय एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो मेरुगिरिके नामसे विख्यात है । वहाँ देवताओंके
  • नन्दन आदि पवित्र उद्यान तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके विहारस्थल हैं । वहाँ किन्हींको भूख-प्यास नहीं लगती, मनमें कभी ग्लानि नहीं होती, गर्मी और जाड़ेका कष्ट भी नहीं होता और न कोई भय ही होता है । वहाँ कोई वस्तु ऐसी नहीं है, जो घृणा करनेयोग्य एवं अशुभ हो । वहाँ सब ओर मनोरम सुगन्ध, मधुर शब्द सुननेमें कानों और मनको प्रिय लगनेवाले पुष्प तथा सुगन्ध आते हैं । स्वर्गलोकमें न शोक होता है, न बुढ़ापा । वहाँ थकावट तथा करुणाजनक विलाप भी श्रवणगोचर नहीं होते । स्वर्गलोक ऐसा ही है । अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप ही उसकी प्राप्ति होती है । मनुष्य अपने किये हुए पुण्यकर्मोंसे ही रद्द पाते हैं । स्वर्गवासियोंमें सत्त्वगुण तत्त्वकी प्रधानता होती है । वे शरीर पुण्यमय ही उत्पन्न होते हैं । माता-पिताके रजोवीर्यसे उनकी उत्पत्ति नहीं होती है । उन शरीरोंमें कभी पसीना नहीं निकलता, दुर्गन्ध नहीं आती तथा मल-मूत्रका भी अभाव होता है । उनके कपड़ोंमें कभी मैल नहीं बैठती । स्वर्गवासियोंकी जो दिव्य ( दिव्य कुसुमोंकी ) मालाएँ होती हैं, वे कभी कुम्हलाती नहीं हैं । उनसे निरन्तर दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है तथा वे देखनेमें भी बड़ी मनोरम होती हैं । स्वर्गके सभी निवासी ऐसे ही विमानोंसे सम्पन्न होते हैं, जो अपने सत्कर्मोंद्वारा स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ बड़े सुखसे जीवन बिताते हैं । उनमें किमके प्रति ईर्ष्या नहीं होती, वे कभी शोक तथा थकावटका अनुभव नहीं करते एवं मोह तथा मात्सर्य ( द्वेषभाव ) से सदा दूर रहते हैं । अपने किये हुए सत्कर्मोंका फल वहीं स्वर्गमें ही स्वर्गमें भोगा जाता है । वहाँ कोई नवीन कर्म नहीं किया जाता । अपना पुण्यरूप मूलधन गँवानेसे ही वहाँके भोग प्राप्त होते हैं ( वन० २६१ । १२—१६, २८ ) ।
  • युधिष्ठिरके द्वारा स्वर्गलोकका दर्शन ( स्वर्ग० ५ अध्याय ) ।

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