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हरिश्चन्द्र

  • -इक्ष्वाकुवंशी राजा त्रिशङ्कुके पुत्र । इनकी माताका नाम सत्यव्रता था ( सभा० १२ । १० के बाद दा० पाठ ) ।
  • ये इन्द्रसभामें सम्मानपूर्वक विराजते हैं ( सभा० ७ । १३ ) ।
  • ये बड़े बलवान् और समस्त भूपालोंके सम्राट थे । भूमण्डलके सभी नरेश इनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सिर झुकाये खड़े रहते थे । इन्होंने अपने रथपर चढ़कर अपने शस्त्रोंके प्रतापसे सातों द्वीपोंपर विजय प्राप्त कर ली थी । इन्होंने राजसूय नामक यज्ञका अनुष्ठान किया था । इन्होंने याचकोंके माँगनेपर उनकी माँगेसे पाँचगुना अधिक धन दान किया था । ब्राह्मणोंको धन-रत्न देकर संतुष्ट किया था । इसीलिये ये अन्य राजाओंकी अपेक्षा अधिक तेजस्वी और यशस्वी हुए हैं तथा अधिक सम्मानपूर्वक इन्द्रसभामें विराजमान होते हैं ( सभा० १२ । ११-१८ ) ।
  • इनकी सम्पत्तिको देखकर नारदजीद्वारा राजसूय करनेका संदेश भेजा था ( सभा० १२ । २३-२६ ) ।
  • इनके द्वारा मांस-भक्षणका निषेध ( अनु० १९५ । ६१ ) ।
  • ये प्रायः प्रातःस्मरणीय नरेश हैं ( अनु० १९५ । ५२ ) ।

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