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हिमवान्

  • भारतकी उत्तर-सीमापर स्थित एक विशाल पर्वतराज, जो शरीरमें पर्वत होते हुए भी 'आत्मा' से देवता है । यहाँ हिमवान्का अर्थ हिमालय पर्वत और उसके अधिष्ठाता देवता समझना चाहिये । वालखिल्य मुनि यहाँ तपस्या करनेके लिये आये थे ( आदि० २० । १८ ) ।
  • शेषनाग संयम-नियम तथा एकान्तवासके लिये हिमालय पर्वतपर आये थे ( आदि० ३६ । ३-४ ) ।
  • गान्धारीके बालकोंकी रक्षाकी व्यवस्था करनेके लिये हिमालयपर तपस्याके लिये चले गये थे ( आदि० ११४ । २४ ) ।
  • राजा पाण्डु कालकूट और हिमालयपर्वतको लाँघते हुए गन्धमादनपर्वतपर चले गये थे ( आदि० १९८ । १८ ) ।
  • क्षत्रियलोग भृगुवंशी ब्राह्मणोंके गर्भमें बालकोंकी भी हत्या करते हुए मारा पृथ्वीपर विचरने लगे । यह देख भयके मारे भृगुवंशियोंकी पत्नियोंने दुर्गम हिमालयपर्वतका आश्रय लिया ( आदि० १९७ । २० ) ।
  • पाराशरने समस्त राक्षसोंके विनाशके उद्देश्यसे किये जानेवाले सत्रके लिये जो अग्नि संचित की थी, उसे उत्तर-दिशामें हिमवान्के आनपास एक विशाल वनमें छोड़ दिया ( आदि० १८० । २२ ) ।
  • इन्द्रपुत्र अर्जुनने भी हिमालयकी यात्रा की थी ( आदि० २१३ । १ ) ।
  • हिमवान् कुबेर-सभामें रहकर धनके स्वामी महामना भगवान् कुबेरकी उपासना करते हैं ( सभा० १० । ३१-३४ ) ।
  • देवर्षि नारदजीने ब्रह्माजीकी सभाका दर्शन पानेके उद्देश्यसे सूर्यके बताये अनुसार हिमालयके शिखरपर एक हजार वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले महान् व्रतका अनुष्ठान किया था ( सभा० ११ । ८-९ ) ।
  • अर्जुनने संग्राममें हिमवान्को जीतकर धवलगिरिपर आकर वहीं अपनी सेनाका पड़ाव डाला ( सभा० २७ । २९ ) ।
  • भीमसेनने हिमालयके पास जाकर मारे जलोद्भव देशपर थोड़े ही समयमें अधिकार प्राप्त कर लिया । ( सभा० ३० । ४ ) ।
  • हिमालयपर्वतपर मेरु-सावर्णिने युधिष्ठिरको धर्म और ज्ञानका उपदेश दिया था ( सभा० ७८ । १४ ) ।
  • राजा भगीरथने तपस्याके लिये हिमालयपर्वतको प्रस्थान किया । गिरिराज हिमवान् विविध वस्तुओंसे विभूषित तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत है । इसकी रमणीय शोभाका विस्तृत वर्णन ( वन० १०८ । ३-११ ) ।
  • कुलिनिराज सुबाहुका विशाल राज्य हिमालयपर्वतके निकट था । पाण्डवोंमें रातमें वहीं रहकर दूसरे दिन सवेरे हिमालयकी ओर प्रस्थान किया ( वन० १४० । २४-२७ ) ।
  • पाण्डवलोग सत्रहवें दिन हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे । हिमालयके उस पावन प्रदेशमें वृषपर्वाका पवित्र आश्रम था । वहाँ जाकर उन्होंने वृषपर्वाको प्रणाम किया ( वन० १४८ । १८-२१ ) ।
  • भीमसेन हिमालयपर्वतके सुन्दर प्रदेशोंका अवलोकन करते हुए वनमें शिकार खेलने लगे । इसी अवस्थामें उन्हें एक अजगरने पकड़ लिया ( वन० १७८ अध्याय ) ।
  • मार्कण्डेयजीने भगवान् बालमुकुन्दके उदरमें हिमवान् तथा हेमकुट आदि पर्वतोंको देखा था ( वन० १८८ । १४ ) ।
  • भृगुवारी प्रावारकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक उल्लू निवास करता है, जो शाकद्वोपमें भी प्रलेका उत्पन्न हुआ है ( वन० १९१ । १२ ) ।
  • कर्णने हिमालयपर्वतपर आरूढ़ हो हिमवत्प्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उन सबसे कर वसूल किया ( कर्ण० २४ । ४-६ ) ।
  • उत्तरमें हिमवान्के शिखरपर भगवान् महेश्वर भगवती उमाके साथ नित्य निवास करते हैं ( उद्योग० १११ । ५ ) ।
  • हिमवान् पूर्वसे पश्चिम दिशाकी ओर फैले हुए छः वर्ष-पर्वतोंमें एक है ( भीष्म० ६ । ३-५ ) ।
  • श्रीकृष्णके साथ कैलासकी यात्रा करते समय पवित्र हिमवान् पर्वतका शिखर देखा था ( द्रोण० ८० । २३-२४ ) ।
  • त्रिपुरदाहके समय हिमवान् और विन्ध्य भगवान् रुद्रके रथमें आधारकाष्ठ बने थे ( कर्ण० ३४ । २२ ) ।
  • ब्रह्माजीने स्कन्दकी उत्पत्ति हिमवान् पर्वतके सुरम्य देवपूजित हिम प्रदेशमें की थी, जिससे स्कन्द प्रकट हुए थे । कुमार कार्तिकेयका अभिषेक करनेके लिये गिरिराज हिमवान् भी अधिष्ठाता देवताके रूपमें उपस्थित थे ( शल्य० ४५ । १५-१८ ) ।
  • इन्होंने कुमारको सुवर्चा और अतिवर्चा नामक दो पार्षद प्रदान किये थे ( शल्य० ४५ । ४७-४८ ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णने हिमालयको प्रद्युम्नको जन्म दिया ( सौप्तिक० १२ । २०-२१ ) ।
  • पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमवान्ने राजा पृथुको अक्षय धन समर्पित किया था ( शान्ति० ५९ । १९८ ) ।
  • हिमालयके सुरम्य शिखरपर, जिसका विस्तार सौ योजन है। भगवान् ब्रह्माजीने एक यज्ञ किया था ( शान्ति० १६६ । ३२-३७ ) ।
  • पूर्वकालमें प्रजापति दक्षने हिमालयके पार्श्ववर्ती गङ्गाद्वारके शुभ प्रदेशमें एक यज्ञका आयोजन किया था ( शान्ति० २८५ । ३ ) ।
  • राजा जनकका उपदेश सुनकर शुकदेवजीने हिमालयपर्वतको प्रस्थान किया। इस पर्वतपर सिद्ध और चारण निवास करते हैं। एक समय देवर्षि नारदजी इसका दर्शन करनेके लिये वहाँ पधारे थे। वहाँ सब ओर अप्सराएँ विचरती हैं। विविध प्राणियोंकी शान्त मधुर ध्वनिसे वहाँका सारा प्रान्त व्याप्त रहता है। सहस्रों किन्नर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मोर और कोकिल अपना कलरव फैलाते रहते हैं। पक्षीराज गरुड़ हिमवान्पर नित्य निवास करते हैं। चारों लोकपाल, देवता और ऋषि जगत्‌की हितकी कामनासे वहाँ सदा आते रहते हैं। भगवान् श्रीकृष्णने पुत्रके लिये यहीं तप किया था। यहीं कुमारकार्तिकेयने बाल्यावस्थामें देवताओंपर आक्षेप किया और तीनों लोकोंका अपमान करके अपनी शक्ति गाड़ दी और यह बात कही -- जो मुझसे भी अधिक बलवान्, ब्राह्मणभक्त और पराक्रमी हो, वह इस शक्तिको उखाड़ दे अथवा हिला दे। भगवान् विष्णुने कुमारके सम्मानकी रक्षाके लिये उस शक्तिको केवल हिला दिया, उखाड़ा नहीं। हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादने उसे उखाड़नेकी चेष्टा की, किंतु वे चीत्कार करके मूर्च्छित हो हिमालयके शिखरपर गिर पड़े। गिरिराज हिमालयके पार्श्वभागमें उत्तर दिशाकी ओर भगवान् शिवने दुर्घर्ष तपस्या की है। भगवान् शङ्करके उस आश्रमको प्रज्वलित अग्निने चारों ओरसे घेर रक्खा है। उस पर्वतशिखरका नाम आदित्यगिरि है। उसपर अजितात्मा पुरुष नहीं चढ़ सकते। उसका विस्तार दस योजन है। वह आगकी लपटोंसे घिरा हुआ है। शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं विराजमान हैं। गिरिराज हिमवान्की पूर्वदिशाका आश्रय लेकर पर्वतके एकान्त तटप्रान्तमें किसी समय महर्षि व्यास अपने शिष्य महाभाग सुमन्तु, जैमिनि, पैल तथा वैशम्पायनको वेद पढ़ाया करते थे ( शान्ति० ३२७ । २-२७ ) ।
  • शुकदेवजीके ऊर्ध्वलोकमें गमन करते समय गिरिराज हिमालय विदीर्ण होता-सा प्रतीत हुआ। उन्होंने अपने सामने पर्वतके दो दिव्य शिखर देखे, जो एक दूसरेसे सटे हुए थे। उनमेंसे एक हिमालयका शिखर था और दूसरा मेरुका। शुकदेवजी उन्हें देखकर भी रुके नहीं। उनके निकट आते ही वे दोनों पर्वतशिखर सहसा विदीर्ण होकर दो भागोंमें बँट गये ( शान्ति० ३३३ । ५-१० ) ।
  • हिमवान्की पुत्रीका नाम उमा है। उसे रुद्रदेवने पत्नीरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी बीचमें महर्षि भृगुने आकर हिमवान्से उस कन्याको अपने लिये माँगा। हिमवान्ने कहा, 'इसके लिये रुद्रदेवने रुद्रदेवको वर निश्चित कर लिया गया है।' यह सुनकर भृगुने हिमवान्को शाप दे दिया कि तुम रत्नोंके भण्डार नहीं रहोगे ( शान्ति० ३४२ । ६२ ) ।
  • भगवान् नारायण और शङ्करके युद्धसे हिमालयपर्वत विदीर्ण होने लगा था ( शान्ति० ३४३ । १२२ ) ।
  • हिमवान् पर्वतपर देवर्षि नारदका अपना आश्रम है ( शान्ति० ३४६ । ३ ) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णने हिमालयपर्वतपर पहुँचकर महात्मा उग्रसेनका दिव्य आश्रम देखा था ( अनु० १३ । ४३-४५ ) ।
  • हिमालयपर्वतपर महात्मा राजा मरुत्तके रहनेसे ब्राह्मणोंके बहुत-सा धन वहीं छोड़ दिया था ( आश्रम० ३ । २०-२१ ) ।
  • धृतराष्ट्र और गान्धारीके दावानलमें दग्ध हो जानेके पश्चात् संजय हिमालयपर चले गये ( आश्रम० १७ । ३३-३४ ) ।
  • महाप्रस्थानके समय योगयुक्त पाण्डवोंके मार्गमें महापर्वत हिमालयका दर्शन किया और उसे लाँघकर जब वे आगे बढ़े, तब उन्हें बालूका समुद्र दिखायी दिया ( महाप्र० २ । १-२ ) ।

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