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अङ्गिरा -

  • ब्रह्माजीके छ: मानस पुत्रोंमेंसे एक (आदि० ६५।१०)।
  • ये ब्रह्माजीके सभासद हैं (सभा० ११। १२)।
  • इन्हींके पुत्र बृहस्पतिका देवताओंने पुरोहित्यके पदपर वरण किया था (आदि० ७६।६)।
  • इनकी ब्रह्माजीके वीर्य एवं अङ्गारासे उत्पत्तिका वर्णन (अनु० ८५।१०५ -१०६)।
  • इनसे बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त नामक तीन पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई (आदि० ६६।५)।
  • इन्होंने सूर्यदेवीकी रक्षा की है (वन० ९२।६)।
  • ये अलकनन्दा नामक गङ्गाके तटपर नित्य स्वाध्याय, जप आदि करते हैं (वन० १४२ । ६)।
  • अग्निके अङ्गिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार किया (वन० २१०।८-१८)।
  • इनकी पत्नी सुप्रभासे होनेवाली संतति-बृहत्कीर्ति आदि पुत्र और भानुमती आदि कन्याओंका वर्णन (वन० २१८।१-८)।
  • इन्हें इन्द्रदेवतासे वर की प्राप्ति हुई (उद्योग० १८५।५)।
  • इन्होंने द्रोणा-चार्यके पास आकर उनसे युद्ध बंद करनेको कहा था (द्रोण० १९०।३४-४०)।
  • गौतमके पुत्रनेपर तीर्थका महत्त्व बताया (अनु० २५।७-९)।
  • अगस्त्यजीके समक्ष स्वयं कमलोंकी चोरी न करनेके विषयमें शपथ कराया (अनु० १४।२०)।
  • इनके द्वारा भीष्मजीसे अनशनव्रतकी महिमाका वर्णन (अनु० १०६।११ -१६)।
  • धर्मके रहस्यका वर्णन (अनु० १३२।८)।
  • समुद्रके जलका पान (अनु० १५३।२)।
  • अग्निको शाप (अनु० १५३।८)।
  • इन्होंने राजा अविधित्सुका यज्ञ कराया (आश्रम० ३।२२)।

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