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उत्तङ्क -

  • (१) आयोदधौम्यके तीसरे शिष्य वेदके शिष्य ( आदि० ३।८३ )।
  • इनकी गुरुसेवा ( आदि० ३। ८५ )।
  • इनके द्वारा गुरुपत्नीकी अवैध आशाका उल्लङ्घन ( आदि० ३।८७ )।
  • गुरुपत्नीके कहनेपर इनका राजा पौष्यके यहाँसे कुण्डल लानेके लिये जाना ( आदि० ३।९० )।
  • इनके द्वारा असुरस्वरूप गोमयका भक्षण ( आदि० ३।९७ )।
  • गुरुपत्नीके लिये राजासे कुण्डल-की याचना ( आदि० ३।१०४ )।
  • क्षत्राणीके अन्तःपुरमें उपस्थित न होनेकी बात बताकर इनका राजाको उपालम्भ देना ( आदि० ३।१०६ )।
  • फिर आचमन आदिसे शुद्ध होनेपर इनको क्षत्राणीका दर्शन होना और उनसे इनका कुण्डल माँगना ( आदि० ३। १११ )।
  • इनका राजा पौष्यको अपवित्र अन्न खिलानेके कारण शाप देना ( आदि० ३।११६ )।
  • पौष्यद्वारा इनको अनपत्य होनेका शाप ( आदि० ३।११० )।
  • कुण्डल लेकर आते समय इनकी धृषणकरूपी तक्षकसे भेंट तथा उसके द्वारा कुण्डलोंका हरण होना ( आदि० ३।१२० )।
  • इनका क्षपणकका पीछा करना एवं क्षपणकका तक्षकरूपमें प्रकट होकर नागलोकमें जाना ( आदि० ३।१२९- १३० )।
  • नागलोक जाते समय इनकी सहायताके लिये इन्द्रका वज्रसे आदेश देना ( आदि० ३।१३१ )।
  • नागलोकमें जाकर इनके द्वारा तक्षककी स्तुति ( आदि० ३।१४० )।
  • नागलोकमें वस्त्र धुनती हुई दो स्त्रियों तथा चक्र घुमाते हुए छः कुमारों एवं एक दिव्य पुरुषका इन्हें दर्शन होना तथा इनका उनकी स्तुति करना ( आदि० ३।१४४-१४९ )।
  • इनके द्वारा घोड़ेकी खुरा फूँकनेसे आगकी लपटोंका प्रकट होना एवं आगसे भयभीत होकर इनका कुण्डल देना ( आदि० ३।१५१-१५२ )।
  • नागलोकमें देखे हुए कुमार आदिके विषयमें इनका गुरुसे पूछना ( आदि० ३।१६२ )।
  • बैल और उसपर चढ़े हुए पुरुषके सम्बन्धमें इनकी जिज्ञासा ( आदि० ३। १६५ )।
  • गुरुके द्वारा इनके प्रश्नोंका समाधान ( आदि० ३। १६६-१६८ )।
  • तक्षकके विनाशहेतु सर्पयज्ञके लिये राजा जनमेजयको सर्पसत्रकी सलाह देना ( आदि० ३। १७८-१७४ )।
  • (२) गौतम ऋषिके शिष्य, द्वारका जाते समय मार्गमें श्रीकृष्णसे इनकी भेंट और उनसे कौरवों-पाण्डवों- का समाचार पूछना ( आश्रम० ५३।८-१४ )।
  • कुपित होकर इनका श्रीकृष्णको शाप देनेके लिये उद्यत होना ( आश्रम० ५३।२०-२२ )।
  • श्रीकृष्णसे अल्पतक्षत्त्वका वर्णन करनेके लिये कहना ( आश्रम० ५४।१ )।
  • शाप-दानसे निवृत्त होकर इनका श्रीकृष्णसे विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करना ( आश्रम० ५५।१-२ )।
  • श्रीकृष्णसे जलके लिये वरदान माँगना ( आश्रम० ५५। १३ )।
  • श्रीकृष्णका इन्हें उद्दालक नामक मेघसे जल प्राप्त होनेका वर देना ( आश्रम० ५५।२५-३० )।
  • इनकी उत्कृष्ट गुरुभक्ति ( आश्रम० ५६।२-६ )।
  • उद्दालक गुरुके लिये काष्ठका बोझ लाना । उस बोझके साथ गिरी हुई सफेद जटा देखकर वृद्धावस्थाका अनुमान करके इनका रोदन; गुरुपुत्रीका इनके आँसुओंको अपने हाथमें लेना और उनका हाथ जलना; गुरुके पूछनेपर 'घर जानेकी आशा न मिलनेसे ही मुझे दुःख हुआ है' यह बताना तथा गुरुका इन्हें आशा लेकर घर जानेका आदेश देना; उद्दालक 'गुरुदक्षिणा क्या दूँ?' यह पूछना, गुरुका बिना दक्षिणाके ही संतोष व्यक्त करके उन्हें पुत्री देनेकी इच्छा व्यक्त करना तथा उद्दालकका षोडशवर्षीय युवक होकर उसका पाणिग्रहण करना ( आश्रम० ५६। १०-२४ )।
  • इनका गुरुपत्नीसे गुरुदक्षिणा माँगनेका आग्रह और अहल्याका मदयन्तीके कुण्डल माँगना ( आश्रम० ५६। २४-२९ )।
  • कुण्डल लानेके लिये सौदादसे पास जाकर उनके साथ इनका वार्तालाप करना ( आश्रम० ५७।३- १८ )।
  • मदयन्तीको राजाका संदेश सुनाकर कुण्डल माँगना ( आश्रम० ५७।१९ )।
  • राजा सौदासने रानीके लिये संदेशका प्रमाण माँगना ( आश्रम० ५८।१ )।
  • मदयन्तीको राजाका संदेश सुनाकर कुण्डल प्राप्त करना ( आश्रम० ५८।२ )।
  • सौदासके साथ पुनः इनकी बातचीत ( आश्व० ५८ । ४-१६ )।
  • इनके वृक्षपर चढ़कर बेल तोड़कर गिराते समय कुण्डलोंकी चोरी ( आश्व० ५८ । २४-२६ )।
  • इनके डंडेसे साँपकी बाँबी खोदना ( आश्व० ५८ । २०-२८ )।
  • इन्द्रकी सहायता- से नागलोकमें पहुँचना ( आश्व० ५८ । २६-३८ )।
  • असंख्‌य अग्निकी सहायतासे कुण्डल प्राप्त करना ( आश्व० ५८ । ५६ )।
  • गुरुपत्नीको कुण्डल देना ( आश्व० ५८ । ५६ )।
  • इनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् विष्णुका इन्हें वरदान देना ( वन० २०३ । ३० )।
  • इनका अयोध्याधिप बृहद्‌ध्रसे घुघुको मारने के लिये आग्रह करना ( वन० २०३ । ३२ )।

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