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उत्तर –

  • ( १ ) राजा विराटके पुत्र । इनका विराटके साथ द्रौपदीस्वयंवरमें आना ( आदि० १८५ । ८ )।
  • इनका दूसरा नाम 'भूमिंजय' था ( विराट० ३५ । ९ )।
  • इनके पास गोहरतालासे आना और इन्हें युद्धके लिये उत्साहित करना ( विराट० ३५ । ९ )।
  • इनके द्वारा अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव ( विराट० ३६ । २ )।
  • बृहन्नला नामधारी अर्जुनको सारथि बनाकर इनका युद्धके लिये प्रस्थान ( विराट० ३७ । २० )।
  • कौरवोंकी सेना देखकर भयभीत हो रथसे कूदकर भागना ( विराट० ३८ । २८ )।
  • अर्जुनके समझानेपर इनका सारथि बननेको राजी होना ( विराट० ३८ । ५१ )।
  • शमी-वृक्षसे अर्जुनकी आज्ञाके अनुसार पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना ( विराट० ४१ । ८ )।
  • बृहन्नलासे पाण्डवोंके अस्त्रोंके विषयमें प्रश्न करना ( विराट० ४२ अध्यायमें )।
  • अर्जुनने उनके दस नामोंके कारण पृथक्‌-पृथक्‌ पूछना ( विराट० ४४ । १०-१२ )।
  • अर्जुनकी पहचानकर उनकी शरणमें जाना ( विराट० ४४ । २४-२५ )।
  • अर्जुनने उनके नपुंसक होनेका कारण पूछना ( विराट० ४५ । १२ )।
  • घायल होनेसे हतोत्साह होकर अर्जुनके सारथ्यके लिये अपनी असमर्थता प्रकट करना ( विराट० ६१ । ४-१२ )।
  • अर्जुनके आदेशसे कौरव महारथियोंके वस्त्र उतार लेना ( विराट० ६६ । १५ )।
  • बृहन्नलाको सारथि बनाकर इनका नगर- की ओर प्रस्थान ( विराट० ६७ । १७ )।
  • उत्तरका नगरमें प्रवेश करके पिता तथा कङ्कके चरणोंमें अभिवादन ( विराट० ६८ । ५० )।
  • विराटसे युद्धका समाचार बताना ( विराट० ६९ । १-११ )।
  • पितासे पाण्डवोंका परिचय देना ( विराट० ७१ । १३-१७ )।
  • अर्जुनका विशेषरूपसे परिचय देना ( विराट० ७१ । १८-२१ )।
  • प्रथम दिनके युद्धमें वीरबाहुके साथ द्वन्द्वयुद्ध ( भीष्म० ४५ । ७७ )।
  • शाल्वपर आक्रमण और उनके द्वारा इनका वध ( भीष्म० ४७ । ३६-३९ )।
  • स्वर्गमें जाकर इनका विश्वेदेवोंमें प्रवेश ( स्वर्ग० ५ । १०-१८ )।
  • ( २ ) एक राजा, जो अपने बड़ेका अपमान करनेके कारण नष्ट हो गया ( सभा० २२ । २४ )।
  • ( ३ ) एक अग्नि, तीन दिन अग्निहोत्र छूट जानेपर इन्हें अष्टाश्रवा नामकी आहुति देना कर्तव्य ( वन० २२१ । २९ )।
  • ( ४ ) उत्तर भारतका एक जनपद ( भीष्म० ९ । ६४ )।

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