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उपमन्यु –

  • ( १ ) आयोदौम्य ऋषिके शिष्य ( आदि० ३।२२-३३ )।
  • इनकी गुरुभक्ति ( आदि० ३।२४-४५ )।
  • इनका आका पत्ते खाने से अन्धा होकर कुएँमें गिरना और गुरुकी आज्ञासे इनके द्वारा अश्विनीकुमारोंकी स्तुति ( आदि० ३।५०-६८ )।
  • इनको अश्विनीकुमारका वरदान ( आदि० ३।७३ )।
  • इनको गुरुदेवका आशीर्वाद ( आदि० ३।७६-७७ )।
  • ( २ ) सत्ययुगके महा यशस्वी ऋषि। व्याघ्रपादके पुत्र। धौम्यके बड़े भाई ( अनु० १४।११-१२; अनु० १४।५५ )।
  • इनके आश्रमका वर्णन ( अनु० १४।४५-६३ )।
  • श्रीकृष्ण ने इन्हें प्रणाम करना और उपमन्युका उन्हें पुत्र-प्राप्ति का विश्वास दिलाते हुए महादेवजीकी आराधना के लिए कहना एवं शिवजीकी महिमा बताना ( अनु० १४।६२-११० )।
  • इन्होंने बाल्यकाल में माता से दूध-भात माँगा; माँने आटा घोलकर दोनों भाइयों को दूध के नाम पर दे दिया। फिर इन्होंने पिता के साथ किसी यजमान के यहाँ जाकर दूध का स्वाद चखा और घर आकर माँ से कहा, 'तुमने जो दूध कहकर दिया, वह दूध नहीं था।' माँ ने कहा, 'भगवान् शिव की कृपा के बिना दूध-भात कहाँ?' उन्होंने पूछा, 'महादेवजी कौन हैं?' फिर माता ने उनकी महिमा बतायी; जिससे वे शिवाराधना में प्रवृत्त हुए ( अनु० १४।११५-१६० )।
  • इनकी तपस्या, शिवभक्ति, स्तुति-प्रार्थना, शिवदर्शन और वरप्राप्ति ( अनु० १४।१६६-२०० )।
  • इनका श्रीकृष्ण से तण्डिद्वारा की गयी शिव-स्तुति का वर्णन ( अनु० १६ अध्याय में )।
  • इनके द्वारा श्रीकृष्ण ने शिवसहस्रनामस्तोत्र का वर्णन ( अनु० १७ अध्याय में )।

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