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उपरिचरवसु –

  • एक प्राचीन पुरुवंशी राजा, जो नित्य धर्म- परायण थे (आदि० ६२ । १)।
  • इन्द्रकी आज्ञासे उन्होंने चेदिदेशका राज्य स्वीकार किया (आदि० ६२ । २)।
  • इन्द्रके द्वारा इनके प्रति चेदिदेशकी प्रशंसा (आदि० ६६ । ८-१९)।
  • देवराजद्वारा इन्हें सर्वज्ञ होनेका वर- दान (आदि० ६२ । १२)।
  • इनको देवेन्द्रके द्वारा दिव्य विमान, बांसकी छड़ी एवं वैजयन्तीमालाकी भेंट (आदि० ६२ । १३-१७)।
  • इनका बांसकी छड़ीसे धरतीमें गाड़कर इन्द्रपूजाकी प्रथा चलाना (आदि० ६३ । १८-१९)।
  • इसका स्वरूप धारण करके इन्द्रका इनकी की हुई पूजा ग्रहण करना एवं अपनी पूजाका महत्त्व बत- लाना (आदि० ६३ । २२-२५)।
  • उपरिचरवसुने चेदिदेशमें ही रहकर इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया (आदि० ६३।२८)।
  • इनके बृहद्रथ, प्रत्यग्रह, कुशाणु, मानैल्ल् तथा यदु नामकके पाँच पुत्र थे (आदि० ६३ । ३०-३१)।
  • इनका ‘उपरिचर' नाम होनेका कारण (आदि० ६३ । ३४)।
  • इनकी राजधानीके समीप प्रसिद्ध नदी ‘शुक्तिमती' बहती थी (आदि० ६३ । ३५)।
  • इनके द्वारा 'कोलाहल' पर्वतपर पैरसे प्रहार (आदि० ६३ । ३६)।
  • इनके द्वारा शुक्तिमतीकी पुत्री ‘गिरिका’ का पाणिग्रहण (आदि० ६३ । ३९)।
  • पितरोंकी आज्ञा का पालन करनेके लिये हिंसक पशुओका मारनेके हेतु इनका वनमें जाना (आदि० ६३ । ४१-४२)।
  • इक्ष्वाकुवंशके द्वारा अपनी गिरिकाके लिये इनके द्वारा अपना वीर्य भेजना (आदि० ६३ । ४४)।
  • बांजोके पारस्पिरिक युद्धसे इनके वीर्यका यमुनाजीमें गिर जाना (आदि० ६३ । ४८)।
  • यमुनाजीमें गिरे हुए इनके वीर्यसे मत्स्य रूपधारिणी ‘अद्रिका’ नामक अप्सराद्वारा 'सत्यवती' एवं 'मत्स्य' राजाका जन्म (आदि० ६३ । ४८-४९)।
  • मछलीके पेटसे उत्पन्न हुए ‘मत्स्य' नामक बालकका इनके द्वारा ग्रहण एवं सत्यवतीको मल्लाहके हाथमें सौंपना (आदि० ६३ । ६३-६७)।
  • यमकी सभामें ये विराज- मान होते हैं (सभा० ८ । २०)।
  • ये इन्द्रके सखा, नारायणके भक्त, धर्मात्मा, पितृभक्त तथा आलस्यरहित थे, श्रीनारायणदेवके वरसे इन्हें साम्राज्य प्राप्त हुआ था, ये वैष्णवाज्ञाके अनुसार भगवानका पूजन करते थे, यज्ञशिष्ठ अन्नके भोक्ता, सत्यपरायण और अहिंसक थे, इन्होंने सब कुछ भगवानको समर्पित कर दिया था। इन्हें इन्द्रदेव अपने साथ एक शय्या और आसनपर बिठाते थे (शान्ति० ३३५ । १०-२६)।
  • इनके यज्ञका आरम्भ (शान्ति० ३३६ । ५)।
  • इनके यज्ञकी समाप्ति (शान्ति० ३३६ । १७)।
  • अजका अर्थ वक्रता बतानेके कारण ऋषियोंके शापसे इनका पातालमें प्रवेश (शान्ति० ३३७ । १३-१६)।
  • देवताओंद्वारा इन्हें वर-प्राप्ति (शान्ति० ३३७ । २४-२७)।
  • भगवत्कृपासे गरुडने इन्हें आकाशचारी बनाया (शान्ति० ३३७ । ३०)।
  • इनका ब्रह्मलोकगमन (शान्ति० ३३७ । ३८)।

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