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उलूपी –

  • ऐरावत-कुलसम्भवन कौरव्य नागकी पुत्री ( आदि० २९३ । १२ )।
  • इसके द्वारा अर्जुनका हरिद्वारसे नाग-लोकमें आकर्षण ( आदि० २९३ । १२ )।
  • अर्जुन-द्वारा इसके गर्भसे इरावान्‌का जन्म ( आदि० २९३ । ३६ के बाद दक्षिणात्य पाठ )।
  • इसका बभ्रुवाहनको अर्जुनसे युद्ध करनेके लिये उत्साहित एवं उत्तेजित करना ( आश्व० ७१ । १९-२२ )।
  • संजीवन मणिके द्वारा अर्जुनको जिलाना ( आश्व० ८० । ५०-५२ )।
  • अर्जुनके पूछने-पर युद्धमें अपने अनेका कारण बताकर उनको मिले हुए शाप और उससे छूटनेका वृत्तान्त बताना तथा उससे विदा लेकर अर्जुनका अश्वके पीछे जाना ( आश्व० ८१ अ० में )।
  • बभ्रुवाहन और चित्राङ्गदाके साथ इसका हस्तिनापुर आगमन ( आश्व० ८७ । २६-२७ )।
  • इसके द्वारा कुन्ती और द्रौपदीके चरण छूना, सुभद्रासे मिलना तथा नाना प्रकारके उपहार पाना ( आश्व० ८८ । ९-५ )।
  • इसके द्वारा गान्धारीकी सेवा ( आश्रम० ७ । २३ )।
  • यह प्रजाके साथ प्रतिकूल बर्ताव नहीं करेगी–ऐसा प्रजाजनोंका विश्वास ( आश्रम० ७ । ४६ ) ! संजायका ऋषियोंसे इसका परिचय देना ( आश्रम० ९ । ११ )।
  • पाण्डवोंके महाप्रस्थानके पश्चात् उलूपीका गङ्गाजीमें प्रवेश ( महाप्र० १ । २० )।

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